फंडरेज़िंग की चुनौतियों पर एक नज़रिया
अपने इस लेख में, राजुल भारती आज के परिदृश्य में फंड जुटाने की चुनौतियों पर अपने विचार रख रही हैं। वह कहती हैं कि फंडर्स को उन हालात और सीमाओं के प्रति संवेदनशील होने की ज़रूरत है, जिनमें गैर-लाभकारी संस्थाएँ काम करती हैं।

कुछ हफ्ते पहले मैं छोटी और बड़ी गैर-लाभकारी संस्थाओं के साथ एक कार्यशाला में शामिल हुई। हम सभी ने अपनी-अपनी संस्थाओं के अब तक के सफर पर सोच-विचार किया और इस ज़रूरी विषय पर भी चर्चा की कि ‘हालात कितने बदल गए हैं’। समर्थ चैरिटेबल ट्रस्ट (एससीटी) 2000 के शुरुआती वर्षों से सक्रियता से काम कर रहा है, हालाँकि इसका पंजीकरण 1992 में हुआ। मैं एससीटी से 2009 से किसी न किसी तरह से जुड़ी रही हूँ। कुछ अन्य भूमिकाओं के साथ, फंड जुटाना और दानदाताओं से बातचीत करना यहाँ मेरी प्रमुख ज़िम्मेदारी रही है।
कार्यशाला के दौरान, फंडरेज़िंग हमारे काम के सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण पहलुओं में से एक के तौर पर सामने आई। यह एक ऐसा क्षेत्र था, जिसमें हर किसी को मदद की ज़रूरत थी। विचार-विमर्श में शामिल हरेक संगठन ने फंडरेज़िंग को एक ऐसे क्षेत्र के तौर पर चुना, जिसमें वे अपनी विशेषज्ञता बढ़ाना चाहते थे। मौजूदा माहौल को देखते हुए हम सभी के पास इसे लेकर एक स्पष्ट रणनीति का अभाव था।
चाहे वे कॉर्पोरेट हों, व्यक्ति हों या फिर अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियाँ, सभी डोनर्स अब उस पहल की लम्बे समय तक चलने की क्षमता पर ध्यान देती हैं, जिसका वे समर्थन कर रहे होते हैं।
नई संस्थाओं को समझ में नहीं आ रहा था कि दोस्तों और परिवार के लोगों से मिलने वाले दान के अलावा बाकी स्रोतों से फंडिंग पाने के लिए ड्यू-डिलिजेंस या जाँच-पड़ताल की प्रक्रिया कैसे पूरी की जाए। समर्थ जैसी संस्थाएँ, जो पिछले कुछ सालों से काम कर रही थीं, उनके सामने अपनी अलग तरह की चुनौतियाँ थीं। इसलिए, जब मुझसे फंडरेज़िंग से जुड़ी हमारी चुनौतियों के बारे में लिखने को कहा गया, तो हमने अपनी ज़रूरतों, हम क्या कर रहे थे और किस दिशा में आगे बढ़ रहे थे, इस सब पर गहराई से विचार किया और इन विषयों पर अपनी सोच को स्पष्ट रूप देने की कोशिश की।
ड्यू डिलिजेंस और अपनी बात स्पष्ट रूप से कहने की ज़रूरत
गैर-सरकारी स्रोतों से फंडिंग हासिल करने के लिए आजकल अँग्रेज़ी में खास तरह की कुशलता और अपनी बात को स्पष्ट ढंग से व्यक्त कर सकने की काबिलियत चाहिए होती है। आम तौर पर, फ़ॉर्म ऑनलाइन भरने होते हैं और उनमें तार्किक सोच और विचारों की स्पष्टता की अपेक्षा भी होती है। ऐसी बहुत कम ही डोनर एजेंसियाँ हैं, जो ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली छोटी संस्थाओं को फंड देने को
तैयार होती हैं। इसकी वजह यह है कि उनका ध्यान इस पर रहता है कि संस्था अपने काम को किस तरह से प्रस्तुत करती है।
ड्यू डिलिजेंस की बढ़ती ज़रूरत को देखते हुए फंडिंग के लिए बुनियादी कागज़ी काम के लिए भी अलग से लोगों की ज़रूरत होती है। इसके लिए संस्था के पास आर्थिक स्थिरता भी होनी चाहिए, तभी वह इसके लिए संसाधन लगा पाएगी। पिछले कुछ वर्षों में, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व की वजह से फंडिंग के नए अवसर खुले हैं (जो कम्पनी अधिनियम की धारा 135 के तहत आते हैं)। इसने कॉर्पोरेट कम्पनियों के लिए यह ज़रूरी कर दिया है कि वे अपने मुनाफे का एक निश्चित प्रतिशत सामाजिक कार्यों के लिए खर्च करें। इससे फंडिंग के नए रास्ते खुल गए हैं। लेकिन इन फंड्स को पाने की शर्त बहुत सख्त और वक्त लेने वाली है, जिससे छोटी संस्थाओं के लिए फंड हासिल करना बहुत मुश्किल हो जाता है। नतीजन, हर साल ऐसे ज़मीनी संगठनों की संख्या बढ़ रही है, जो अपना कामकाज बन्द कर रहे हैं। पहले, जब कोई बड़ी संस्था किसी नए और दूरदराज़ के इलाके में जाती थी, तो साझेदारी करने के लिए वह एक मज़बूत और ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली संस्था की तलाश करती थी। ज़मीनी स्तर की संस्था उस क्षेत्र के लोगों की सोच और उनकी ज़रूरतों की समझ लेकर आती थी। वहीं, बड़ी संस्था तकनीकी विशेषज्ञता लेकर आती थी।
हर साल हम ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली संस्थाओं की संख्या घटते हुए देखते हैं, खासकर दूरदराज़ के इलाकों में। वे फंडिंग से जुड़े नए नियमों से तालमेल नहीं बैठा पा रही हैं। इससे कार्यक्रम कम प्रभावी हो जाते हैं। इसकी वजह यह है कि स्थानीय लोगों को बाहर से आई संस्थाओं पर वैसा भरोसा नहीं होता, जैसा ज़मीनी स्तर की संस्थाओं पर होता है। इसके अलावा, बाहर से आई संस्था को लोगों का भरोसा हासिल करने और क्षेत्र को समझने जैसे कई काम फिर से करने पड़ते हैं। इसमें समय और मेहनत की बर्बादी होती है।
शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच का फर्क
जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, विकास का क्षेत्र दिन पर दिन और ज़्यादा पेशेवर और प्रक्रिया पर केन्द्रित होता जा रहा है। नतीजन, शहरी क्षेत्र के संगठनों को ज़्यादा मौके मिलते हैं क्योंकि उनके पास ज़रूरी कौशल होते हैं और अवसरों व साधनों तक उनकी पहुँच होती है। लेकिन, हमारे अनुभव में, अब भी कई दानदाता फंड देने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हैं। मौजूदा रिपोर्टों के मुताबिक, हमारा देश उन देशों में से एक है जो तेज़ी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। मौजूदा समय में देश की 38 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है। खुद के लिए और अपने घर-परिवार के लोगों के लिए बेहतर जीवनशैली की तलाश में अपना घर-बार और अपना सामाजिक ताना-बाना छोड़कर शहरों में आए इन पहली पीढ़ी के प्रवासियों को
समर्थन देने के मामले में अब भी कुछ झिझक दिखाई देती है। ज़्यादातर ग्रामीण परिवारों के लिए खेती अब आमदनी का प्राथमिक ज़रिया नहीं रह गई है। और प्रवासन नकद आमदनी हासिल करने में मदद करता है।
शहरी गरीबी की तस्वीर बेहद भयावह है। विमुक्त समुदायों द्वारा किए जाने वाले पारम्परिक काम कम हो गए हैं। वे रोज़गार की तलाश में शहरों में आ तो जाते हैं, मगर अक्सर उनमें शहरी नौकरियों के लिए ज़रूरी कौशल नदारद होते हैं। मजबूर होकर उन्हें भीख माँगनी पड़ती है, वे छोटी उम्र से ही मज़दूरी करने लगते हैं, और कभी-कधार उन्हें देह-व्यापार में धकेल दिया जाता है। इन प्रवासियों के हक और अधिकार स्पष्ट रूप से तय न होने की वजह से उन्हें छोटे स्तर के उद्यमों के लिए ऋण नहीं मिल पाते। बच्चों का स्कूलों में दाखिला नहीं हो पाता और अन्ततः वे अनौपचारिक क्षेत्र के कामगारों में शामिल हो जाते हैं। ऐसे में वे ट्रैफिक सिग्नल पर गुब्बारे बेचते हैं या भीख माँगते हैं। इस प्रकार, ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ शहरों में रहने वाले हाशिए के समुदायों और उन क्षेत्रों को भी तत्काल वित्तीय सहायता की ज़रूरत है।
हमें यह समझ आया है कि फंड जुटाने के तरीकों और फंडिंग के सम्भावित स्रोतों व फंडर्स की सूची बनाना बहुत ज़रूरी होता है। अपनी खूबियों को पहचानना और सिर्फ डोनर्स की बजाए सही साझेदारों की तलाश करने की दिशा में काम करना भी बहुत ज़रूरी है।
सशक्तीकरण और जागरूकता बढ़ाने से जुड़े मुद्दे
मेरा अनुभव यह कहता है कि सशक्तीकरण और जागरूकता बढ़ाने से जुड़े कामों के लिए फंडिंग मिलनी ज़्यादा मुश्किल होती है। इस सोच की वजह से कभी-कभी कुछ विशेष क्षेत्रों में काम करने वाली संस्थाओं के लिए उनका आकार बढ़ने के बाद फंडिंग हासिल करना मुश्किल हो जाता है। सीएसआर के तहत दी जानेवाली फंडिंग के मामले में यह बात खास तौर पर सच है। सशक्तीकरण और जागरूकता बढ़ाने वाले कार्यक्रमों का असर कम समय में दिखाना कभी-कभी मुश्किल होता है। इससे अक्सर सीएसआर के तहत फंड देने वाले दानदाता पीछे हट जाते हैं। नतीजन, सीएसआर के तहत किया जाने वाला काम समस्या की जड़ तक नहीं पहुँच पाता और केवल सतही समाधान कर पाता है।
प्रभाव पर ज़ोर
मैं यह कहकर शुरुआत करना चाहूँगी कि डोनर्स की तरफ से काम के नतीजों को मापने और जवाबदेही की माँग की वजह से संस्थाएँ अब ज़्यादा मज़बूत रणनीतियाँ बनाने लगी हैं। इससे कार्यक्रमों की निगरानी और देखरेख करनेवाली टीमों को ज़्यादा टिकाऊ और असरदार कार्यक्रम डिज़ाइन करने में मदद मिली है। मगर कभी-कभी मात्रात्मक प्रभाव, यानी कई गतिविधियों के ज़रिए ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचने पर ज़ोर की वजह से कार्यक्रम का असल मकसद पीछे छूट जाता है। प्रभाव की अपेक्षा कभी-कभी तुरन्त सन्तुष्टि पाने की ज़रूरत जैसी लगती है, यानी एक ऐसे क्षेत्र में तुरन्त नतीजों की उम्मीद करना, जो इस बात को लेकर खुद पर गर्व महसूस करता है कि उसके इरादे नेक हैं। किसी कार्यक्रम का नतीजा लम्बे समय में दिखाई देता है। डोनर्स को सब्र रखना होगा और नागरिक समाज संगठनों के साथ लम्बे समय की साझेदारी के लिए समय और संसाधनों का निवेश करना होगा। जब तक किसी मुद्दे पर काम करने का तरीका समस्या की जड़ को सम्बोधित नहीं करता, तब तक उसका असर सतही ही रहता है।
बाहरी परिवेश
पहले के समय में, गैर-लाभकारी गैर सरकारी संस्थाओं को ज़मीनी स्तर के और अन्य स्तरों के उनके काम के लिए एक तरह का सम्मान हासिल था। उन्हें सरकार को जवाबदेह बनाने वाले एक सेतु और सहायता के एक तंत्र के तौर पर देखा जाता था। अब हम गैर-लाभकारी संस्थाओं को देखने के लोगों के नज़रिए में एक बड़ा बदलाव देखते हैं। आज उन्हें राष्ट्र-विरोधी माना जाता है और यह भी माना जाता है कि वे बेईमानी भरे लेन-देन करती हैं। इसका असर न सिर्फ गैर-लाभकारी संगठनों से जुड़े लोगों के मनोबल पर पड़ता है, बल्कि संगठन के बाहर के प्रतिभाशाली और कुशल लोग भी गैर-सरकारी संगठनों की मदद करने से पीछे हटने लगते हैं।
नागरिक समाज संगठनों के प्रति अविश्वास के माहौल को बदले जाने की ज़रूरत है। इन संस्थाओं को एकदम दूरदराज़ के इलाकों तक पहुँचने का फायदा मिला है। इन्होंने इन दूर-दराज़ के इलाकों में मज़बूत रिश्ते बनाए हैं और वहाँ के लोगों के साथ अच्छा तालमेल बनाया है। आम तौर पर, आपदाओं और आपातकालीन स्थितियों में ये संगठन ही सबसे पहले इन इलाकों तक पहुँचते हैं। इसे भले ही सराहना की नज़र से न देखा जाए, मगर सम्मान की नज़र से तो देखा ही जाना चाहिए। फंडिंग के और मज़बूत और टिकाऊ तंत्र बनाने के साथ-साथ दानदाता अपनी अपेक्षाओं को और अधिक स्पष्टता के साथ गैर-सरकारी संगठनों के सामने रख सकते हैं।
फंडिंग की सीमाएँ
चाहे वे कॉर्पोरेट हों, व्यक्ति हों या फिर अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियाँ, सभी डोनर्स अब उस पहल की लम्बे समय तक चलने की क्षमता पर ध्यान देती हैं, जिसका वे समर्थन कर रहे हैं। फिर भी, ज़्यादातर फंडिंग ज़मीनी स्तर की गतिविधियों, यानी सीधे सेवा प्रदान करने वाले मॉडल्स पर ही केन्द्रित होती है। संगठनों की क्षमता संवर्धन (कैपेसिटी बिल्डिंग) के लिए बहुत कम या लगभग न के बराबर राशि निर्धारित की जाती है। यही नहीं, इन सेवाओं को सीधे लोगों तक पहुँचाने वाले लोगों के वेतन और उनके प्रशिक्षण वगैरह के लिए भी बहुत कम राशि निर्धारित की जाती है।
इससे कर्मचारियों के क्षमता संवर्धन से जुड़ी गतिविधियों और उन्हें अन्य सुविधाएँ मुहैया कराने की बहुत कम गुंजाइश बचती है। ज़्यादातर डोनर्स संस्थाओं को कॉर्पस फंड (ऐसा फंड जिसे संगठन लम्बे समय के लिए सुरक्षित रख सके) बनाने की इजाज़त नहीं देते। इससे आर्थिक तंगी के दौर में गुज़ारा चलाना संगठन के लिए मुश्किल हो जाता है। इस वजह से संगठन की भविष्य की योजनाओं या लम्बे समय तक असरदार काम कर सकने के लिए उसकी बुनियाद को मज़बूत करने की दिशा में बहुत कम निवेश हो पाता है।
सीखे गए सबक
इन सब चुनौतियों के बावजूद, जिन समुदायों के साथ हम काम करते हैं, इस क्षेत्र के हमारे साथी, और हमारे डोनर भी आगे बढ़ने में और इस क्षेत्र को सक्रिय बनाए रखने में हमारी मदद करते हैं। कभी-कभार तो इन दोनों दुनियाओं (नागरिक समाज संगठनों और फंडर्स) के बीच एक फासला-सा महसूस होता है। यानी, ये दोनों काम तो एक ही मकसद के लिए कर रहे हैं, मगर दोनों एकदम अलग तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इस फासले को पाटने और एक आम सहमति तक पहुँचने से ही बदलाव आएगा और हमें अपने मकसद को हासिल करने के लिए बेहतर तरीके से काम करने में मदद मिलेगी। हमें यह समझ में आया है कि फंड जुटाने के तरीके और फंडिंग के सम्भावित अवसरों की योजना बनाना ज़रूरी है। अपनी खूबियों को पहचानना और सिर्फ डोनर्स की बजाए सही साझेदारों को तलाशने की दिशा में काम करना ज़रूरी है। आज के समय में, मज़बूत और सुव्यवस्थित वित्तीय व्यवस्था बनाने के लिए संगठन की शुरुआत से ही उसके सभी ज़रूरी दस्तावेज़ों को व्यवस्थित रखना अनिवार्य होता है। आखिर में, टीम की क्षमता बढ़ाने पर और कार्यक्रमों के स्थायित्व (सस्टेनेबिलिटी) और उनके दीर्घकालिक असर पर ध्यान देना ज़रूरी है।



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