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भारत में बच्चों के लिए लेखन: बदलता हुआ परिदृश्य

यह लेख भारत में बाल साहित्य के विकास का एक ऐतिहासिक अवलोकन प्रस्तुत करता है, जिसमें स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के काल पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है। इसमें विभिन्न विधाओं में प्रचलित समकालीन प्रवृत्तियों, तथा गुणवत्ता एवं प्रामाणिकता से जुड़े प्रश्नों पर चर्चा की गई है।

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प्रकाशित तिथि : १६ अप्रैल २०२६
Modified On : 16 April 2026
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यह लेख आज़ादी के बाद के दौर पर खास तौर पर ध्यान केन्द्रित करते हुए भारत में बाल साहित्य के बदलते हुए स्वरूप का इतिहास बताता है। यह लेख विभिन्न साहित्यिक विधाओं में मौजूदा रुझानों की बात करता है और रचनाओं की गुणवत्ता और प्रामाणिकता से जुड़े सवालों को भी उठाता है।

बहुत से लोगों का यह मानना है कि भारत में बाल साहित्य में आई तेज़ी हाल की घटना है। लेकिन वास्तव में जितना आम तौर पर माना या स्वीकार किया जाता है इसकी जड़ें उससे कहीं ज़्यादा गहरी और कहीं ज्यादा जटिल हैं। यह सच है कि भारत में बच्चों के लिए किताबें लिखने की परम्परा उतनी पुरानी नहीं है जितनी दुनिया के बाकी देशों की है। लेकिन, इसकी जड़ें मौखिक और प्रदर्शनकारी परम्पराओं से गहराई से जुड़ी हैं, जो लगभग 5000 साल पुरानी हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप सदियों से कहानियों का भण्डार रहा है। कथासरित्सागर, पंचतंत्र, जातक कथाएँ इसके उदाहरण हैं। हमें रामायण और महाभारत जैसे काव्यों और मुल्ला नसीरुद्दीन, शेख चिली, बीरबल और तेनालीराम जैसे प्रतिष्ठित पात्रों वाली कहानियों पर भी विचार करना चाहिए।

कहानी सुनानेवाले बच्चों और बड़ों के बीच कोई फर्क नहीं करते थे। उनकी कहानियाँ सभी के लिए होती थीं। सिर्फ कुछ खास तरह की रचनाएँ (जैसे कि लोरियाँ और पहेलियाँ) और संकलन (जैसे पंचतंत्र) ऐसे थे, जो पूरी तरह से बच्चों के लिए ही बनाए गए थे। इसके साथ-साथ, बच्चों को कहानियाँ सुनाने का रिवाज, खास कर खाना खाने के दौरान, आम तौर पर प्रचलित था। सांस्कृतिक ज्ञान, पौराणिक कथाएँ और लोककथाएँ गीत कला, नृत्य, और नाटक जैसे प्रदर्शनकारी माध्यमों के ज़रिए अलग-अलग क्षेत्रों और पीढ़ियों तक पहुँचाई जाती थीं।

औपनिवेशिक काल में बाल साहित्य

भारत में बाल साहित्य पर उपनिवेशवाद का गहरा असर पड़ा। इसने बाल साहित्य को एक ऐसे लिखित रूप के तौर पर स्थापित किया, जिसे खास कर बच्चों के लिए तैयार किया गया था। उन्नीसवीं सदी के दौरान, ब्रिटिश राज द्वारा विभिन्न प्रेसिडेंसियों में स्थापित स्कूल बुक सोसायटीज़ ने कई भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अँग्रेज़ी में भी नैतिक और पौराणिक कहानियों, और विज्ञान, भूगोल जैसे विषयों पर किताबों का एक बड़ा संग्रह प्रकाशित किया। देश के अलग-अलग हिस्सों में मिशनरियों के प्रयासों के तहत बाइबिल के बच्चों के लिए बनाए गए संस्करणों का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया।

बच्चों की पत्रिकाएँ कई भारतीय भाषाओं में भी प्रकाशित होती थीं (जैसे कि हिन्दी में बालक, खिलौना और कन्या मनोरंजन; बंगाली में सन्देश, सखा, बालक बन्धु वगैरह)। ये पत्रिकाएँ विज्ञान, स्वास्थ्य, स्वच्छता आदि के बारे में जानकारी का एक समृद्ध स्रोत होने के साथ-साथ बच्चों के लिए मनोरंजनक पठन सामग्री भी थीं।

बैनर्जी (2007) बताते हैं कि जब भारत के राष्ट्रीय पुस्तकालय (ब्रिटिश शासन के दौरान जिसे इम्पीरियल लाइब्रेरी कहा जाता था) ने बंगाली में बच्चों के साहित्य की एक सूची तैयार की, तो उसमें 1818 से लेकर 1962 के दौरान प्रकाशित 5000 से ज़्यादा किताबों और 133 पत्रिकाओं को शामिल किया। औपनिवशिक काल में बच्चों के साहित्य की विभिन्न विधाओं में कहानियाँ, सलाह, विवरण, वैज्ञानिक जानकारी, नैतिकता पर आधारित निबन्ध, जीवनियाँ, कविताएँ, पहेलियाँ, प्रार्थनाएँ, और बहुत कुछ शामिल था।

इसी तरह का साहित्य कई अन्य भारतीय भाषाओं में भी सामने आने लगा। (देखें, चन्द्रा, 2007; निझवान, 2004)। इन्हें भी उन्हीं तरीकों से लोगों तक पहुँचाया गया। इनमें युवाओं को शिक्षित करने के लिए और उनके मनोरंजन के लिए स्कूल बुक सोसाइटियों द्वारा बनाई गई पाठ्यसामग्रियों और पत्रिकाओं का इस्तेमाल किया गया। बैनर्जी का कहना है कि बच्चों के लिए प्रकाशित किताबों की भारी संख्या से साफ तौर पर पता चलता है कि इस अवधि के दौरान बच्चों को शिक्षित करने का वे एक प्रमुख साधन थीं।

बेशक, इन प्रकाशनों को ऐसे बच्चों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया जो पढ़ सकते थे, जिनके पास किताबें उपलब्ध थीं, और जिनके पास पढ़ने का समय था। औपनिवेशिक काल में साक्षरता का स्तर बहुत कम था। बीसवीं सदी की शुरुआत में साक्षरता दर लगभग 6 फीसदी थी और आज़ादी के समय यह 18 फीसदी थी। इसलिए, हम काफी हद तक यकीन के साथ कह सकते हैं कि पढ़ने वाले लोग कुल आबादी का एक छोटा हिस्सा थे, जो पढ़ सकते थे वे अधिकतर विशेषाधिकार वाले लोग थे और ये ज़्यादातर शहरों में रहते थे।

और यही वजह थी कि बच्चों के इस्तेमाल के लिए बनाया गया साहित्य इस छोटे-से समूह के इस्तेमाल के लिए ही तैयार किया गया था। यह (अधिकतर) बच्चों की अलग-अलग दुनियाओं और उनके अलग-अलग बचपन को प्रतिबिम्बित नहीं करता था। बैनर्जी ने बंगाली साहित्य के अपने विश्लेषण में उल्लेख किया है कि इस अवधि के दौरान बच्चों के लिए तैयार की गई पाठ्यसामग्रियाँ मुख्य रूप से ‘सम्मानित मध्यम वर्ग’ के द्वारा निर्मित की गई थीं। इनमें उस वर्ग की उस आकांक्षा को दर्शाया गया जिसके तहत वे एक खास तरह के बच्चे को पैदा करके समाज में सुधार लाना चाहते थे — यानी अगर वह बच्चा लड़का हो तो एक भावी नागरिक और अगर लड़की हो तो एक अच्छी माँ और गृहणी।

इसे पुरानी, मौखिक परम्पराओं के मुकाबले रखकर, जिसमें साहित्य केवल बच्चों के लिए नहीं तैयार किया जाता था, दोनों में फर्क साफ समझा जा सकता है। पुरानी मौखिक परम्पराओं पर वयस्कों का उतना नियंत्रण नहीं रहता था और न ही उनकी इतनी निगरानी ही होती थी। उस समय बच्चे ज़्यादा तरह की सामग्रियाँ पढ़-सुन सकते थे और उनका आनन्द ले सकते थे। दरअसल, सभी लोककथाओं और पौराणिक कथाओं की तरह उपहाद्वीप की ज़्यादातर मौखिक लोककथाओं में हिंसा, यौनिकता वगैरह के स्पष्ट संकेत शामिल थे। वहीं लिखित साहित्यिक परम्पराओं में इन्हें अक्सर बच्चों के लिए अनुचित माना जाता है।

आज़ादी के बाद के दौर का बाल-साहित्य

आज़ादी के बाद राष्ट्र-निर्माण एक अहम विषय के तौर पर उभरा। चन्दामामा जैसी पत्रिका (जो 1947 में तमिल और तेलुगु में प्रकाशित होना शुरू हुई), साथ ही राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी) और चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट जैसे प्रकाशन गृहों (दोनों की ही स्थापना 1957 में हुई थी) ने नए आज़ाद भारत के बच्चों के लिए साहित्य तैयार करना शुरू किया। आगे चलकर चन्दामामा अँग्रेज़ी सहित 12 और भाषाओं में प्रकाशित होने लगी। इसमें ज़्यादातर पौराणिक कथाओं और लोककथाओं को दोहराते हुए मगर एक नए रूप में प्रकाशित किया गया।

दूसरी तरफ, एनबीटी और सीबीटी ने पाठकों के सामने और भी ज़्यादा समकालीन कहानियाँ पेश कीं जो भारत के लोकाचार और संस्कृति को दर्शाती थीं। इस दौरान पुलक बिस्वास, बदरी नारायण और शंकर जैसे उल्लेखनीय लेखकों और चित्रकारों ने बच्चों के लिए ऐसी किताबें रचीं जिनका आकर्षण लम्बे समय तक बना रहा। साथ ही, अँग्रेज़ी साहित्य के रूपान्तरण और अनुवाद, रूसी और चीनी साहित्य के अनुवाद विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रकाशित हुए।

मीना खुराना की 1991 में प्रकाशित किताब इंडियन सबकॉन्टीनेंट इन लिटरेचर फ़ॉर चिल्ड्रन एण्ड एडल्ट्स में आज़ादी के बाद से लेकर 1980 के दशक के आखिर तक अँग्रेज़ी भाषा में बच्चों और किशोरों के लिए प्रकाशित की गई 900 से ज़्यादा किताबों की सूची उनके संक्षिप्त विवरण सहित दी गई है। इस सूची में दर्ज़ किताबें विभिन्न प्रकार की साहित्यिक विधाओं की मौजूदगी को प्रमाणित करती हैं, जैसे कि पारम्परिक साहित्य (पौराणिक कथाएँ और लोककथाएँ), कथा साहित्य (ऐतिहासिक, यथार्थवादी और काल्पनिक), कविता, नाटक, जीवनी और आत्मकथा, और सूचनात्मक किताबें।

इस अवधि के दौरान उपलब्ध किताबों की विविधता और संख्या के बावजूद, कुछ को छोड़ दें तो भारत के ज़्यादातर प्रकाशन कम लागत वाले थे। यह काम ज़्यादातर मामलों में चित्रों की संख्या कम रखकर और डिज़ाइन पर ज़्यादा खर्च न करके किया गया। इन किताबों की कीमत इस तरह तय की गई ताकि वे ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों तक पहुँच सकें।

विभिन्न साहित्यिक विधाओं में वर्तमान रुझान

1990 के दशक की शुरुआत में उदारीकरण और अर्थव्यवस्था के खुलने के बाद, शहरी, मध्यम वर्गीय बच्चों और उनके सुशिक्षित, किताबों की अहमियत समझने वाले माता-पिता और स्कूलों को किताबें बेचने के लिए एक नया बाज़ार सामने आया। 1990 के दशक की शुरुआत में छोटे, स्वतंत्र प्रकाशन गृह उभरने लगे और इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

इन प्रकाशनों ने चित्रों, उत्पादन और डिज़ाइन, और किताबों को पाठकों तक पहुँचाने के रचनात्मक तरीकों पर ध्यान देते हुए कम संख्या में लेकिन लगातार और संकल्पबद्ध ढंग से किताबों का प्रकाशन शुरू किया। पिछले तीन दशकों में विशेष तौर पर तीन विधाओं — पिक्चर बुक्स, किशोर युवाओं के लिए उपन्यासों और साहित्यिक शैली में लिखे गए कथेतर साहित्य (लिटरेरी नॉन फिक्शन) में — काफी विस्तार हुआ है।

बच्चों के लिए चित्रों वाली किताबें औपनिवेशिक काल से ही बनाई जा रही हैं। 1960 और 1970 के दशकों के दौरान भारत के बाज़ार में बच्चों के लिए खूबसूरत और बहुत सारे चित्रों वाली रूसी और चीनी किताबों की बाढ़ आई हुई थी। लेकिन ‘पिक्चर बुक’ इन किताबों से कुछ अलग होती है। पिक्चर बुक भारत के बाज़ार में साहित्य की दुनिया में हाल ही में दाखिल हुई है। तो सवाल यह है कि पिक्चर बुक चित्रों वाली किताबों से किन मायनों में अलग है?

Kerala State Institute of Children’s Literature (KSICL), Thiruvananthapuram

केरला स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ़ चिल्ड्रन्स लिटरेचर (केएसआईसीएल), तिरुअनन्तपुरम के लॉरेन्स सिप (2010) इसका इस तरह से उल्लेख करते हैं, “शब्द और चित्र दोनों बराबर की अहमियत रखते हैं और उनके बीच जटिल रिश्ते होते हैं, और चित्र लिखे गए शब्दों में जो पहले ही व्यक्त किया जा चुका होता है महज़ उसे ही चित्र के रूप में नहीं दिखाते, बल्कि उसमें कुछ अलग और नया जोड़ते हैं जिससे शब्द और चित्र मिलकर कुछ ऐसा अर्थ रचते हैं जो शब्दों और चित्रों को अलग-अलग देखने की बनिस्बत कहीं अधिक गहरा और समृद्ध होता है। (सिप, 2010, पृ. 238).

दूसरे शब्दों में, कहानी को पूरा करने के लिए शब्द चित्रों पर निर्भर होते हैं और कहानी की निरन्तरता बनाए रखने के लिए चित्र शब्दों पर निर्भर होते हैं। पिछले कुछ दशकों में भारत में स्वतंत्र प्रकाशन गृहों ने खूबसूरत पिक्चर बुक्स को बनाने में काफी ऊर्जा, ध्यान और संसाधन लगाए हैं।

किशोर युवाओं के लिए साहित्य एक और श्रेणी है जिसका हाल के सालों में विस्तार हुआ है। परम्परागत रूप से किशोरावस्था को बचपन से तेज़ी से युवावस्था में जाने का दौर माना जाता था। लेकिन, आधुनिक समाजों में शिक्षा की अवधि लम्बी होने, शादी और रोज़गार के बाज़ार में देरी होने के कारण, खास तौर पर मध्यम वर्ग के बीच, विकास का एक नया चरण बन गया है जिसमें किशोरावस्था की अवधि लम्बी हो गई है। इस नए विकासात्मक चरण की ज़रूरतें और इसकी खरीदने की क्षमता किशोर युवाओं के लिए लिखे गए साहित्य से पूरी होती हैं। किशोर युवाओं की समस्याओं और कठिनाइयों पर आधारित उपन्यास इस विधा का विशिष्ट उदाहरण हैं। ये ऐसे विषयों पर चर्चा करते हैं जो असहज होते हैं, लेकिन किशोर युवाओं के लिए ज़रूरी या प्रासंगिक माने जाते हैं।

गुणात्मक बदलाव का तीसरा क्षेत्र कथेतर साहित्य के उत्पादन में देखा गया है। सचित्र विश्वकोश, जीवनियाँ और कथेतर साहित्य की शृंखला की किताबें (जैसे कि हाउ एण्ड व्हाई वंडर बुक सीरीज़) लम्बे समय से भारत के बाज़ार में मौजूद रही हैं। हालाँकि वर्तमान में प्रकाशित हो रहे कथेतर साहित्य में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि उन्हें उच्च गुणवत्ता वाला साहित्य माना जाए। जैसा कि कीफर और विल्सन पश्चिम में साहित्यिक कथेतर साहित्य की अपनी चर्चा में कहते हैं: “कथा साहित्य की तरह ही अच्छा कथेतर साहित्य कला का एक रूप है जिसे आनन्द, ज्ञान प्रदान करने, विस्मय उत्पन्न करने और खुद के बारे में जागरूकता और समझ की हमारी क्षमता को प्रकट करने के लिए तैयार किया जाता है” (कीफर और विल्सन, 2010, पृ. 291)। हाल के सालों में कथेतर साहित्य के लेखकों और प्रकाशकों ने भारत में रचनात्मक या साहित्यिक कथेतर साहित्य का एक नया समूह तैयार करने के मामले में काफी नए प्रयोग किए हैं।

तुलना करने पर हम पाते हैं कि रचनाओं की गुणवत्ता और उनकी संख्या के मामले में कविता और नाटक की विधाएँ अन्य विधाओं से पीछे हैं। यह रुझान सम्भवतः पूरे बाज़ार की स्थिति को दर्शाता है। यहाँ तक कि वयस्कों के सन्दर्भ में भी कथा साहित्य और कथेतर साहित्य की किताबों की तुलना में कविता और नाटक को उनके लिखित रूप में कम पढ़ा जाता है।

गुणवत्ता, प्रामाणिकता और कल्पित पाठक

हाल के समय में, ज़्यादातर प्रगतिशील प्रकाशकों ने विविध सामाजिक सच्चाइयों को दर्शाने वाले साहित्य को तैयार करने के प्रति हैरतअंगेज़ संवेदनशीलता दिखाई है। आज आपको हरेक विषय, थीम और सामाजिक मुद्दे पर, अलग-अलग सामाजिक समूहों को दर्शाने वाली रचनाएँ मिल जाएँगी। यह सही है कि एक उपलब्धि मानते हुए हमें इसका जश्न मनाना चाहिए, मगर कई बातों को लेकर सावधानी बरतनी भी ज़रूरी है।

पहली यह कि आज भारत में प्रकाशित होने वाले ज़्यादातर बाल साहित्य में यह मानकर चला जाता है कि उसे पढ़ने वाला एक मध्यम वर्ग का, शहरी बच्चा है। किताबों में अलग-अलग सामाजिक सच्चाइयों को शामिल करना भी अक्सर इस उद्देश्य से किया जाता है कि मध्यमवर्गीय बच्चे को उसके देश के बाकी बच्चों के अलग-अलग अनुभवों से परिचित कराया जा सके। या फिर, ऐसा उन्हें असमानता, अन्याय, देशज कला रूपों से जुड़े मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाने की कोशिश के तहत किया जाता है।

ऐसा बहुत कम ही होता है कि बच्चों की किताबें सीधे तौर पर हाशिए के समूहों के पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई हों। हाशिए के बच्चों को सीधे तौर पर सम्बोधित करने वाली किताबें अपेक्षाकृत दुर्लभ हैं। यहाँ हमें मछुआरा समुदाय के एक बच्चे का उदाहरण याद आता है। जब उसे माई फ्रेंड माई सी किताब का तमिल संस्करण पढ़ने को दिया गया तो उसने कहा कि हमेशा दूसरे बच्चों के बारे में ही पढ़ने के बाद अब जाकर वह और उसके जैसे बाकी बच्चे अपने जैसे बच्चों के बारे में पढ़ेंगे।

दूसरी बात, क्या लेखकों को किताबें इसलिए लिखनी चाहिए क्योंकि बच्चों को उनकी ज़रूरत है या फिर किताबें इसलिए लिखी जानी चाहिए क्योंकि लेखक किसी खास किताब को लिखने की ज़रूरत महसूस करते हैं? क्या ‘माँग’ के आधार पर अच्छी गुणवत्ता वाली किताबें लिखी जा सकती हैं? क्या साहित्य को रचना केवल कंटेन्ट बनाने जैसा है, या फिर यह एक कलात्मक प्रयास है?

बेशक हम पक्के तौर पर यह साबित नहीं कर सकते कि मुद्दों पर लिखने से भारत में बच्चों की किताबों की गुणवत्ता में गिरावट आई है। लेकिन हम पाठकों को आगाह करना चाहेंगे कि यह एक दोधारी तलवार है। एक तरफ यह इन किताबों को पढ़ने वाले बच्चों को महत्वपूर्ण मुद्दों के बारे में संवेदनशील बनाने में मददगार हो सकता है। और दूसरी तरफ, इससे केवल किसी मुद्दे पर केवल ऊपरी-ऊपरी बातें करने वाली और प्रामाणिकता की कमी वाली किताबें बन सकती हैं।

मशहूर नार्निया शृंखला के लेखक सी. एस. लुईस का मत है कि “…मेरे लिए लेखन का एकमात्र तरीका बच्चों की कहानी लिखना है क्योंकि बच्चों की कहानी ही कला का वह सर्वश्रेष्ठ रूप है जिसके ज़रिए आप जो कहना चाहते हैं वो कह सकते हैं।” (लुईस, 1952, पृ. 1)।

साहित्य में गुणवत्ता को लेकर लुईस के इस मज़बूत रुख और एक कई परतों में बँटे हुए व सांस्कृतिक रूप से विविध देश के लिए एक अधिक विविध और समाज के विविध वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले साहित्य की ज़रूरत के बीच हम सन्तुलन कैसे बनाएँ?

तीसरी बात, अँग्रेज़ी में किताबें तैयार करने वाले ज़्यादातर वयस्क ऐसी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमियों से आते हैं जहाँ उन्हें कुछ विशेष वर्गीय विशेषाधिकार हासिल हैं। ऐसे में वे जिन हाशिए के बच्चों के बचपन को दर्शा रहे हैं उनकी वास्तविकताओं और सरोकारों को वे कितनी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत कर पाएँगे? वयस्कों के लिए उपलब्ध उल्लेखनीय साहित्यिक रचनाओं के समूह के विपरीत जो दलितों की आवाज़ों, अनुभवों और सौंदर्यबोध को दर्शाता है बच्चों का ऐसा साहित्य जो वंचित समूहों के सदस्यों द्वारा लिखा गया है मुख्यधारा के साहित्य में उसकी मौजूदगी अभी भी बहुत कम है साथ ही वह बहुत सीमित संख्या में भी है। यहाँ तक कि भारत में बच्चों के लिए लेखन में इस बात की जागरूकता भी पूरी तरह विकसित नहीं हुई है कि जब विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों के लोग अन्य समूहों और वर्गों के लोगों के लिए इस रवैये के साथ लिखते हैं मानों वे उनकी ‘बच्चों की तरह देखभाल’ कर रहे हों तो यह रवैया समस्याजनक हो सकता है (पूरी चर्चा के लिए देखें शर्मा और बत्रा)।

पश्चिमी देशों में ‘लिखने का अधिकार’ एक पूर्ण विकसित चर्चा और बहस का विषय है (देखें वुल्फ, बैलेंटाइन और हिल, 1999) जहाँ अश्वेत लेखक यह सवाल उठाते हैं कि क्या श्वेत लोगों को उनकी (अर्थात हाशिए के समुदायों) की वास्तविकताओं को प्रस्तुत करने का अधिकार है। यह भारत के प्रकाशकों, लेखकों और चित्रकारों के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है जिसे उन्हें ध्यान में रखना चाहिए क्योंकि वे विभिन्न समुदायों की वास्तविकताओं को प्रस्तुत करने और बहुसांस्कृतिक साहित्य प्रकाशित करने में जल्दबाज़ी कर रहे हैं। इन किताबों को बनानेवाले कौन हैं? ये किन कल्पित पाठकों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं? पुस्तक की समग्र साहित्यिक गुणवत्ता कैसी है?

अन्त में, पिछली दो सदियों में भारत में बाल साहित्य ने काफी प्रगति की है। इसने अपनी मौखिक परम्पराओं से प्रेरणा ली है। हालाँकि, समय के साथ इसकी रचना शैली, इसके पाठक, इसकी विधाओं, और शैलियों में भी काफी अहम बदलाव आए हैं। साथ ही, यह ध्यान देने की बात है कि भारत में प्रकाशित होने वाली लगभग 50 प्रतिशत किताबें या तो अँग्रेज़ी में हैं या हिन्दी में (नीव साहित्य महोत्सव, 2023)। क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशन के बारे में पर्याप्त जानकारी के अभाव के बावजूद यह कहना गलत नहीं होगा कि कुल मिलाकर, क्षेत्रीय भाषाओं में बच्चों का प्रकाशन विधाओं, चित्रों और डिज़ाइन के साथ प्रयोग के मामले में अँग्रेज़ी भाषा में बच्चों के प्रकाशन में हुई प्रगति के साथ तालमेल नहीं बिठा पाया है।

बेशक, इसमें कुछ अपवाद भी हैं। मसलन हिन्दी में इकतारा जैसे प्रकाशन गृह बच्चों के लिए प्रासंगिक और पुराने ढर्रे से हटकर किताबें और पत्रिकाएँ प्रकाशित कर रहे हैं। युवा चित्रकारों के लिए रियाज़ एक करके सीखने पर आधारित अकादमी है जो बच्चों की किताबों में चित्रों की गुणवत्ता में सुधार लाने की दिशा में काम कर रही है। लेकिन, ज़्यादातर बच्चों के लिए रचनात्मक और अलग तरह की किताबें प्रकाशित कर सकने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं के प्रकाशनों के पास संसाधनों (और शायद प्रेरणा) की कमी रही है।

यह भी ध्यान देने की बात है कि छपी हुई सभी किताबों में से लगभग 71 फीसदी किताबें स्कूली किताबें होती हैं। कुल छपी किताबों (वयस्कों और बच्चों के लिए) में से महज़ 4 फीसदी मनोरंजन और आनन्द के लिए लिखी किताबें होती हैं (जिन्हें ‘व्यापारिक किताबें’) कहा जाता है। भारत में प्रकाशित व्यापारिक किताबों में से 25 फीसदी बच्चों और किशोर युवाओं के लिए होती हैं। इसका मतलब यह है कि बच्चों के लिए व्यापारिक किताबें कुल छपी हुई किताबों का महज़ 1 प्रतिशत ही हैं।

इसके अलावा, पेंगुइन रैंडम हाउस, हार्परकॉलिन्स और हैचेट जैसे अन्तरराष्ट्रीय प्रकाशन गृह और स्कॉलास्टिक, ड्रीमलैंड और ओम बुक्स जैसे बड़ी संख्या में किताबें छापने वाले प्रकाशक अभी भी बाज़ार के बड़े हिस्से पर अपना दबदबा बनाए हुए हैं। एक और पहलू जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए यह है कि पुस्तकालय के लिए एक सशक्त और सक्रिय आन्दोलन का अभाव है, चाहे वे स्कूल आधारित पुस्तकालय हों या निशुल्क सार्वजनिक पुस्तकालय। ऐसे पुस्तकालय इस प्रकार से विकसित किए जा सकते हैं कि वे किताबों तक सभी की बराबर की पहुँच और उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें।

इसका अर्थ यह है कि शिक्षक बच्चों की पुस्तकों के प्रकाशन में हाल ही में आए विस्तार और आजकल उपलब्ध विविध रोचक और उच्च गुणवत्ता वाली बच्चों की किताबों का पूरी तरह से सही और जायज़ तरीके से जश्न मना सकते हैं। हालाँकि इस क्षेत्र में अभी और भी काफी काम किया जाना बाकी है।

सन्दर्भ

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नोट: यह लेख एस. मेनन और एस. राव (सम्पा.), (2024), चिल्ड्रन्स बुक्स: एन इंडियन स्टोरी (पृ. 7-30), भोपाल: एकलव्य से लिया गया है।

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Shailaja Menon
Shailaja Menon
Shailaja Menon is the Lead for the Center of Excellence in Early Literacy, Tata Trusts. Prior to this, she has taught at various universities in India and the US, and most recently at Azim Premji University, Bengaluru, India. She has led research projects and authored numerous articles in the domain of early literacy.
Sandhya Rao
Sandhya Rao
Sandhya Rao worked for many years in mainstream print media as an editor and writer before she seamlessly slipped into the world of children’s publishing. She is the author of several books and has translated Astrid Lindgren’s Pippi Långstrump into Hindi. Based in Chennai, she works freelance and enjoys the challenge of new discoveries. She believes that when we share food and stories, we give ourselves a better chance. She is also the co-editor of the volume “Children’s books: an Indian story” (Eklavya, 2024).
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