मेरी किशोर भारती की यात्रा कैसे शुरू हुई?
इस लेख में, लेखिका एक युवा महिला के तौर पर अपनी उस यात्रा का वर्णन करती हैं, जो एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के विज्ञान कार्यक्रम से शुरू होकर 'किशोर भारती' के साथ ज़मीनी स्तर के शैक्षिक कार्यों तक पहुँचती है। यह लेख इस क्षेत्र में काम करने वालों को असमानता और स्वतंत्रता के बारे में गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है; साथ ही, यह दिखाता है कि किस तरह अनुभव-आधारित शिक्षा ने विज्ञान, स्कूली शिक्षा और सामाजिक दायित्व के प्रति उनके विचारों को एक नया स्वरूप दिया।

Photo credits: Kishore Bharati
बात वर्ष 1974 के मध्य की है शायद, लगभग 52 साल पहले की। दिल्ली के भौतिकी विभाग, जहाँ मैं एम.एस.सी. के दूसरे वर्ष की पढ़ाई कर रही थी, मैं अनिल सद्गोपाल, किशोर भारती (कि.भा.) के संस्थापक, से पहली बार मिली थी। मैंने उनसे पूछा था कि क्या मैं किशोर भारती आ सकती हूँ। उन्होंने कहा ‘जरूर’। अनिल सदगोपाल का उत्तर भौतिकी विभाग के मेरे प्रोफेसर के उत्तर से, जो किशोर भारती होकर आए थे और जिन्होंने किशोर भारती के ग्रामीण स्कूलों में विज्ञान की पढ़ाई और स्कूलों के बेज़ार स्थिति पर एक बहुत ही भावुक और संवेदनशील भाषण दिया था, बहुत अलग था।
भौतिकी विभाग के मेरे प्रोफेसर मेरे इस प्रश्न से बहुत असमंजस में पड़ गए, थोड़े असहज भी लगे। उन्होंने कहा फिलहाल वहाँ लड़कियाँ नहीं हैं, उनके लिए रहने की व्यवस्था भी नहीं है। वहाँ मात्र एक डोरमेट्री है जिसमें सब पुरुष रहते हैं। उन्होंने वहाँ के दो गेस्ट हाउसों के बारे में नहीं बताया जिनमें से एक में अंततः मैं रही।
मेरे प्रोफेसर की चिंताएँ रही होंगी। पर मैं उनके उत्तर से अत्यन्त निराश हुई थी क्योंकि उनके भाषण के बाद मैंने कि.भा. (किशोर भारती) जाकर देखने का फैसला कर लिया था। इसलिए विभाग के बरामदे में तेजी से जाते हुए अनिल सदगोपाल के सकारात्मक उत्तर ने, जिसका भाव शायद यह था कि यह तो रोजमर्रा की बात है, मेरा इरादा और भी पक्का कर दिया था। हालाँकि तब तक न तो मुझे यह मालूम था कि वह गाँव जहाँ कि.भा. स्थित है, कहाँ है, स्टेशन से कितनी दूर है और वहाँ कैसे पहुँचा जाता है।
इसलिए कि.भा. देखने जाने का यह फैसला एक बीस वर्षीय महिला का बिना सोचे-समझे, जोश और भावुकता में लिया फैसला ही कहा जा सकता है। पिछले दशकों में मैंने बहुत सोचा कि मैं कि.भा. क्यों गयी थी परन्तु कोई स्पष्ट उत्तर मुझे मिला नहीं। हालाँकि दो बातें मुझे याद आती हैं: पहली, हमारी कक्षा में अभिजात्य स्कूलों और महाविद्यालयों से आए विद्यार्थियों का अधिपत्य था। मैं एक सरकारी स्कूल में पढ़ी थी जिनका प्रतिशत भौतिकी विभाग में 10 से भी कम था। सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी उस जमाने में भौतिकी जैसे विभागों में चुप और ‘अदृश्य’ हो जाते थे, बावजूद भौतिकी में रुचि के।
मेरे स्कूली समय के शिक्षक बहुत अच्छे और विषय के जानकार थे, उनसे संवाद का रिश्ता था। भौतिकी विभाग के हमारे प्राध्यापकों को सरकारी स्कूलों से आए, फर्राटे से अंग्रेजी न बोल पाने वाले विद्यार्थियों से न तो संवाद करना आता था न शायद इसकी उनको जरूरत ही महसूस होती थी। इसलिए मैं विभाग में बहुत अलग-थलग और निराश थी और घुटन महसूस करती थी। पूरी तरह से ‘मिसफिट’ थी। दूसरा, इस प्रकार शिक्षा में घोर असमानता का अहसास मुझे साफ़ दिखने लगा था। इसलिए शायद किशोर भारती के ग्रामीण और वंचित स्रोतों वाले स्कूलों के काम ने मुझे आकर्षित किया था।
बहरहाल, मैंने अपने घर में फैसला सुना दिया कि मैं एक महीने के लिए कि.भा. जाऊँगी। यह बात वर्ष 1974 के दिसम्बर महीने की है। घर में सब उम्मीद लगाकर बैठे थे (खास तौर से माँ-बाप) कि उनकी लड़की भौतिकी में एम.एससी. करेगी या बी.एड. या पी.एच.डी. या आई.ए.एस. या बैंक की परीक्षा देगी। ऑफिसर या वैज्ञानिक बनेगी। वे एक अनजान गाँव में जाने के मेरे फैसले से हक्के-बक्के रह गए। परेशान भी हो गए। बात केवल एक महीने की थी पर शायद उन्हें कुछ और ही समझ में आने लगा था। उन्होंने मुझे रोकने की कोशिश की, पर असफल रहे। जाहिर है कि वे मेरी सुरक्षा और भविष्य को लेकर अत्यन्त फिक्रमन्द थे। पर इससे भी बड़ा बोझ इस बात का था कि लोगों को क्या जवाब देंगे कि 20-21 साल की जवान लड़की को कहाँ भेज दिया। पर मुझे न तो माँ की चिंता थी न पिता की अस्वीकृति की और न ही छोटी बहनों की उदासी की। मैं तो अपनी धुन में एक अनजान रास्ते पर निकल पड़ी थी, शायद समानता की उम्मीद में।
आर्थिक अभावों के बावजूद कैसे दिल्ली-इटारसी यात्रा का रेल टिकट खरीदा गया यह मुझे याद नहीं। मैं बहुत सालों से घर से वि.वि. (विश्वविद्यालय) के अलावा दिल्ली में या दिल्ली से बाहर कहीं गयी ही नहीं थी। पिता नाराज और शायद बहुत हताश और उदास थे। माँ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन छोड़ने आयीं। उनकी आँखों में क्या था; डर, फ़िक्र या उदासी मुझे याद नहीं। हम स्टेशन कैसे पहुँचे; बस से या ऑटो से यह भी नहीं याद। माँ वापस कैसे गयीं, उनके पास कितने पैसे बचे थे, उनके जीते जी मैंने यह कभी नहीं पूछा। आज मैं यह सब जानने को बहुत व्याकुल हूँ, पर अब वे हैं नहीं।
मैं अभ्यस्त यात्री नहीं थी और इसलिए हम स्टेशन करीब दो घण्टे पहले पहुँच गए थे। ट्रेन के खुलने / छूटने के करीब 10 मिनट पहले अनिल सदगोपाल और उनकी पत्नी मीरा, ढेरों लोगों के साथ, लगभग दौड़ते हुए पहुँचे। अपने साथ आए लोगों को वे लगातार, ट्रेन छूटने तक, निर्देश दे रहे थे। ट्रेन में बैठने के बाद ही उन्हें मेरी उपस्थिति का अहसास हुआ और वे मुस्कुराए। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं लगभग 2 घण्टे पहले पहुँच गयी थी तो विस्मय से, शायद कुछ हिकारत से बोले, “आपके पास बहुत समय है”। मुझे याद है कि इस टिप्पणी का मुझ पर बहुत असर हुआ, मैंने अपने आपको बहुत छोटा महसूस किया। वे एक अत्यन्त व्यस्त व्यक्ति दिखे जिनके पास रेल यात्रा में भी ढेरों काम थे।
मैं कुछ सहमी और कुछ उत्सुकता से चुपचाप इस व्यक्ति को देखती रही। मीरा मुझसे बहुत प्यार और संवेदनशील तरह से बात करती रहीं जिससे मेरी असहजता कुछ कम हुई थी, शायद कुछ सुकून मिला था। अनिल सदगोपाल की ‘व्यस्तता’ का यह आलम किशोर भारती के माहौल पर हमेशा हावी रहा।
और इस तरह शुरू हुई मेरी किशोर भारती की पहली यात्रा!!
किशोर भारती में मुझे फाइलें व्यवस्थित करने , विज्ञान शिक्षण के स्कूलों में भेजे जाने वाले सामान की सूचियाँ बनाने और रात में कि.भा. के गेहूं के खेतों में सिंचाई के काम में लगाया गया। कि.भा. ने शायद गाँधी के बुनियादी शिक्षा के स्वावलम्बन के सिद्धांत से प्रेरणा लेकर खेती, दुग्ध बिक्री और लघु उद्योगों के द्वारा आर्थिक आत्मनिर्भरता और स्वायत्तता का उद्देश्य रखा था। हालाँकि रेतीली जमीन के विकास, भवन निर्माण, कुएं खोदने जैसे कामों के लिए जरूरी निवेश टाटा ट्रस्ट के पाँच वर्षीय अनुदान से हुआ था। रेतीली जमीन को गेहूं की कृषि योग्य बनाना, वह भी संकर जाति की गेहूं की खेती योग्य बनाना, एक टेढ़ी खीर थी। निवेश भी बहुत था और कृषि जानने वालों के बीच रेतीली जमीन पर गेहूं की खेती की सफलता को लेकर मतभेद थे।
पर वैज्ञानिक अनिल सदगोपाल हरित क्रान्ति की सफलता के घोड़े पर सवार थे। संकर जाति के गेहूं के लिए सात सिंचाई चाहिये होती थीं। जमीन रेतीली पानी सोख लेती थी और दिन में पानी धूप में उड़ जाता था। इसलिए रात को सिंचाई करना जरूरी था। इस प्रकार मैंने अपने जीवन में पहली बार खेत देखे और दिसम्बर की रात में उनमें सिंचाई करना सीखा। शायद यह भौतिकी की कक्षाओं से ज्यादा रोमांचक लगा।
एक महीने कि.भा. में रहने के बाद मैंने वहाँ एक वर्ष बिताने का फैसला किया। मुझे वहाँ मिली आजादी और कि.भा. आने वाले ढेरों लोगों, वैज्ञानिकों समेत, से मिलना और बातचीत करना अच्छा लगा, शायद। मैंने तय किया कि मैं विज्ञान शिक्षण (जो बाद में होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम के रूप में जाना गया) और स्कूल न जाने वाले बच्चों के कार्यक्रमों में काम करूँगी। जब मैंने घर में बताया तो जाहिर है कि मेरे माता-पिता सन्न रह गए। घर में छोटा-मोटा कोहराम-सा मच गया। पर वे मुझे रोक नहीं पाए। मेरी यह दूसरी यात्रा अप्रैल 1975 में मेरी एम.एससी. के दूसरे वर्ष की परीक्षा के बाद हुई, परीक्षा का रिजल्ट आने से पहले। मेरे सभी सहपाठियों से मेरा संपर्क टूट गया। कुछ से, जो कि.भा. और बाद में एकलव्य में आए, उनसे संपर्क पुनः स्थापित हुआ। मेरी दुनिया बदल गयी थी, गाँव, गाँव के स्कूल, खेती, किसानी और सामंती शोषण में डूबी सामान्य गाँव वालों की ज़िन्दगी। मैं दिल्ली वि.वि. या और कहीं से पी.एच.डी. करने से बहुत दूर जा चुकी थी। मेरी कक्षा के अधिकतर विद्यार्थी बैंक की नौकरी या पी.एच.डी. या विदेशी वि.वि. में आगे की पढ़ाई करने निकल चुके थे।
किशोर भारती के परिसर में जहाँ मुझे घर मिला वह मुख्य परिसर से करीब 700-800 मीटर दूर था और तब तक वहाँ बिजली नहीं थी और इस तरह शुरू हुआ मेरा दूसरा सफर, लालटेन की रोशनी में ।
आज भी मैं बार-बार अपने आप से पूछती हूँ कि ऊपर लिखे कारण क्या इतना बड़ा फैसला लेने के लिए काफी थे? शायद ये दिल्ली के भौतिकी विभाग के मेरे जैसे विद्यार्थी के प्रति उपेक्षा के कारण भी था। उस समय स्वच्छन्दता का अहसास, करियर और भविष्य के बारे में सोचने से मुक्ति भी कारण रहे होंगे। या गाँवों की विपन्नता, अशिक्षा, स्कूलों की हालत सुधारने के लिए कुछ करने का जज्बा… या ये सब? दिल्ली में गरीबी तब भी थी पर मैं तो दिल्ली वि.वि. के प्रसिद्ध कॉलेज और प्रसिद्ध विभाग की विद्यार्थी थी और उसमें मगन थी। उपेक्षा के कारण दिल्ली में गरीबी और विपन्नता को उतनी निकटता से नहीं देखा था। कि.भा. से निकटतम कसबा, बनखेड़ी, कि.भा. से 7 कि.मी. दूर था जहाँ शुक्रवार बाजार लगता था। कई लोगों ने बताया था कि वे शुक्रवार के बाजार पैदल जाते हैं आधा लीटर तेल, नमक और कभी-कभी कुछ सब्जी लेने। 14 कि.मी. चलना सिर्फ इतना सौदा लेने क्योंकि पैसे इतने ही होते थे। ये मेरे लिए हिला देने वाला था।
कि.भा. में मेरी ‘ब्रांड वैल्यू’ या मेरी सामाजिक पूँजी (सोशल कैपिटल) दिल्ली में हुई मेरी विज्ञान की उच्च शिक्षा थी। मुझे स्वतंत्र रूप से विज्ञान शिक्षण के कई काम सौंपे गए जिसके लिए मैंने होशंगाबाद जिले और भोपाल तक की यात्राएँ अकेले कीं। गाँव में भी काम शुरू किया वहाँ काम करते-करते ग्रामीण समाज की असमानताएँ, द्वन्द्व, टकराव और सामंती जकड़न की परतें खुलने लगीं। विज्ञान शिक्षण यानी शिक्षकों और शिक्षा अधिकारियों (लगभग सभी उच्च जाति से थे) के साथ काम करने से शिक्षा का सामंतवाद और हायरायर्की समझ में आयी।
पर साथ ही विज्ञान शिक्षण के प्रशिक्षण शिविरों के दौरान सामान्य शिक्षकों की क्षमता और सृजनात्मकता के उभरने को देखा। यह सब बहुत जबरदस्त था। अपने दिल्ली के प्राध्यापकों, जो इन शिविरों में आते थे, से दोस्ताना और संवाद के सम्बन्ध बने। उनसे नए सिरे से विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति सीखी, शैक्षिक व्यवस्था को समझा. विज्ञान और समाज की सामाजिक मान्यताओं, जो गैर-वैज्ञानिक थीं, दोनों का सहअस्तित्व देखा। पर साथ ही समझा कि भूमिहीन कौन होता है, वह भूमिहीन कैसे हो जाता है, कुछ गिने-चुने परिवारों के पास अधिकतर जमीनें क्यों होती हैं और सामंती जकड़न कैसे टिकी रहती है।
इस प्रकार एक महीने से शुरू हुआ मेरा कि.भा. का यह सफर करीब डेढ़ दशक तक जारी रहा। इस सफर ने मुझे समाज और विज्ञान के रिश्तों; समाज के द्वन्द्व, टकराव और असमानताओं, जमीनी हकीकत को जानने की जरूरत और तरीकों का नया नजरिया दिया।
होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम
किशोर भारती और होशंगाबाद के पास रसूलिया गाँव में स्थित संस्था, ‘फ्रेंड्स रूरल सेंटर’ ने मिलकर 1972 में 16 सरकारी स्कूलों में कक्षा 6-8 तक विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम शुरू किया। इसके तहत सरकारी स्कूलों में विज्ञान पढ़ाने के तरीके, विज्ञान की नयी किताबें बनाने और शिक्षकों का प्रशिक्षण अपने तरीके से करने की पूरी आज़ादी इन समूहों ने सरकार से प्राप्त की। बाहरी लोगों को सरकारी स्कूलों में इस तरह की पूरी आज़ादी के साथ काम करने की अनुमति मिलना अपने आप में एकमात्र एतिहासिक घटना रही है। यह फैसला उस समय के एक नौकरशाह और तत्कालीन शिक्षा मंत्री की समझ और दूरदर्शिता का नतीज़ा था। विड़म्बना यह है कि ढ़ाई दशक बाद नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों के ऐसे ही एक अन्य गठबंधन में इसी दूरदर्शिता की कमी और संकीर्ण निहित राजनीतिक स्वार्थों के कारण यह कार्यक्रम बंद कर दिया गया। उस समय एकलव्य संस्थान के द्वारा यह कार्यक्रम मध्यप्रदेश के 13 जिलों के एक हज़ार से ज्यादा स्कूलों में चल रहा था!
इस कार्यक्रम के तहत भारत के शीर्ष अनुसंधान संस्थानों के वैज्ञानिकों ने स्कूली शिक्षा में रूचि ली। रटन्त पद्दति से अलग, गाँव के स्कूलों में, कक्षा 6-8 तक प्रयोग आधारित विज्ञान पढ़ाने की शुरूआत करी। इसके लिए विद्यार्थियों द्वारा कक्षा में किए जाने वाले प्रयोग रचे गए और वे सब किताबों का हिस्सा बने। प्रयोग करवाने, अवलोकन करने और अवलोकन के आधार पर निष्कर्ष निकालने की समझ शिक्षकों में विकसित करनी भी जरूरी थी। उनके प्रशिक्षण हुए जिसमें शिक्षक उसी वैज्ञानिक पद्धति से गुजरते थे जिससे उन्हें अपने विद्यार्थियों को गुजारना था। यानी एक तरफा भाषण आधारित शिक्षण पद्धति में भी बुनियादी परिवर्तन किया गया। इससे प्रशिक्षण व कक्षाएं ज़्यादा संवाद आधारित व प्रजातांत्रिक बनी। मूल्यांकन और परीक्षा के आधार भी बदल गए इसमें सोचने और तार्किकता के इस्तेमाल करने वाले प्रश्नों को जगह मिली बजाए रटे-रटाए उत्तरों के। वर्षों से बहुत आसानी से रटन्त पद्धति के प्रश्न बनाने में माहिर शिक्षकों को नये ढ़ंग के व्यक्ति बनाने के लिए प्रोत्साहित और प्रशिक्षित करना आसान काम नहीं था।
1977-78 के दौरान इस कार्यक्रम को होशंगाबाद जिले के सभी सरकारी और निजी माध्यमिक विद्यालयों में फैलाया गया। इन स्कूलों की संख्या 400 से अधिक थी। तभी से इसे होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम या हो वि शि का कहा जाने लगा। उस दौरान किशोर भारती के कुल 3-4 सदस्य पूर्णकालिक रूप से इसमें काम करते थे जिसमें एक मैं थी। कार्यक्रम को इस स्टेज तक पहुँचाना, उसकी अनेक प्रशासनिक और अकादमिक जिम्मेदारियों को पूरा करना एक अथक श्रम और ढेरों अलग-अलग विश्वविद्यालयों के शिक्षकों और विद्यार्थियों के मेहनत और प्रयासों का इतिहास है। इस कार्यक्रम के अनेकानेक शैक्षिक और प्रशासनिक पहलूओं की बारिकियों और बंद होने को समझना एक पूरी किताब का मसाला है।



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