एक चिन्तनशील शिक्षक बनने का मेरा सफर
एक प्राथमिक शिक्षक की यह आत्मकथात्मक यात्रा बताती है कि कैसे परम्परागत रटंत शिक्षण से आगे बढ़कर बच्चों की भागीदारी, अनुभव, संवाद और चिंतन पर आधारित शिक्षण दृष्टि विकसित हुई। एकलव्य के साथ जुड़ाव ने उन्हें निरन्तर सीखने वाला और चिंतनशील शिक्षक बनने की दिशा दी।

बात वर्ष 1989 की है। इलेक्ट्रीशियन की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने एक कोलमाइंस में नौकरी करनी शुरू कर दी थी। कुछ महीने बाद रोज़गार नामांकन के आधार पर मुझे एक आदिवासी इलाके के सरकारी स्कूल में प्राथमिक शिक्षक के तौर पर काम करने का मौका मिला। कोलमाइंस के मेरे सभी साथियों ने मुझे शिक्षक की नौकरी के फायदे गिनाए और मैंने शिक्षक बनने का फैसला किया। मैं बिना किसी प्रशिक्षण और अनुभव के शिक्षक बन रहा था। मुझे लगता था कि कक्षा एक से पाँच तक के बच्चों को पढ़ाना आसान काम होगा। उस स्कूल में मेरे अलावा एक और शिक्षक थे, मगर दो माह बाद ही वे रिटायर हो गए। अब पूरा का पूरा स्कूल, जिसमें लगभग 100 बच्चे थे, अकेले मेरे ज़िम्मे था।
शुरुआती दो महीनों में साथी शिक्षक ने मुझे बताया था कि ज़्यादा ध्यान पाँचवीं के बच्चों पर देना होता है। पहली-दूसरी के बच्चों को अक्षर (वर्णमाला) और गिनती बोलकर लिखना सिखाना होता है। वहीं, तीसरी-चौथी में पढ़ना-लिखना एवं जोड़-घटा के सवाल हल करना सिखाना होता है। यही साल भर चलता है। स्कूल इस पाठ्यक्रम के साथ स्वतःस्फूर्त व्यवस्था में चल रहा था कि एक दिन स्कूल में एक साहब आए। उन्होंने मुझसे लगभग डाँटने के अन्दाज़ में कहा कि बच्चे इतना हल्ला क्यों कर रहे हैं, निरीक्षण पंजी लाओ। उन्होंने मुझसे बालक पंजी, शिक्षक पंजी, डायरी, स्टॉक पंजी सब दिखाने को कहा। मैंने एक अलमारी में रखे सारे रजिस्टर उन्हें दिखाए। हर रजिस्टर को देखकर उन्होंने उनमें बहुत-सी कमियाँ गिनाईं। फिर उन्होंने दो-तीन बच्चों को अपने पास बुलाकर किसी को 19 का, तो किसी को 13 का पहाड़ा सुनाने को कहा। बच्चे 19 एकम 19 और 13 एकम 13 से आगे नहीं सुना पाए। फिर उन्होंने बच्चों से पूछा कि नहाया कब से नहीं, शर्ट कब से नहीं धोई? कुछ इसी तरह के कुछ सवाल उन्होंने मुझसे भी किए और फिर नाराज़गी के साथ कुछ देर बाद वे रवाना हो गए।
इस घटना के बाद से मैंने पंजियों में क्या-क्या लिखा जाना चाहिए, इसे समझने पर ध्यान दिया। साथ ही, बच्चों को एक कमरे में बैठाकर उनसे पहाड़े बुलवाना और उन्हें दोहराना शुरू कर दिया। इस तरह, अ से अनार, अ से आम, गिनती और पहाड़ों की वाचनी से मेरा स्कूल गूँजने लगा।
बच्चे स्लेट पर इन्हें बार-बार उतारते भी थे। पाँचवीं के बच्चों को मैं उनके पाठ के प्रश्नों के उत्तर लिखवाता रहता था। इस तरह, तीन-चार महीने बीत गए।
एक दिन शहर से एक सज्जन मेरे स्कूल में आए। वे साइकिल से आए थे। मुझे लगा कि कोई अफसर होंगे और मैं डर गया। उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया और बहुत ही दोस्ताना लहज़े में बताया कि वे एकलव्य नाम की एक स्वैच्छिक संस्था से हैं। सरकार के साथ एक समझौते के तहत यह संस्था 16 प्राथमिक स्कूलों के बच्चों को सिखाने की प्रक्रिया में मदद करने के लिए एक प्रायोगिक कार्यक्रम शुरू कर रही है।
वे अपने साथ कुछ शब्द चित्र कार्ड लाए थे। मुझे साथ लेकर वे उस कमरे में गए जहाँ कक्षा पहली-दूसरी के बच्चे बैठे थे। उस कमरे में शिक्षक के लिए एक कुर्सी होने के बावजूद वे बच्चों के बीच टाटपट्टी पर बैठ गए। मैं वहीं खड़ा होकर उन्हें देख रहा था। उन्होंने बच्चों को अपना नाम बताया और उनसे कहा कि मैं एक गीत गाऊँगा, आप मेरे बाद दोहराना। फिर उन्होंने बच्चों के साथ अभिनय करते हुए एक कवितानुमा गीत गाया। गीत कुछ इस प्रकार था: “रज्जो की बेटी ने, मिट्टी के ढेरों में, कद्दू के तीन बीज बोए बोए बोए। रात का अंधेरा था चूहों का डेरा था…”
इस तरह की कविता ओर उनका अभिनय बच्चों को बहुत रास आया। बच्चे खुश थे। एक अजनबी के सामने होने की उनकी झिझक खत्म हो गई थी। फिर उन्होंने बच्चों से कहा कि हम पढ़ने का खेल खेलेंगे। उन्होंने अपने साथ लाए हुए कार्ड बच्चों को बाँट दिए। इन कार्ड पर एक ओर चित्र बना था और दूसरी ओर चित्र का नाम लिखा था। जैसे, एक ओर मछली का चित्र बना था और दूसरी ओर उसका नाम लिखा हुआ था। इसमें आम, गाय, सूरज, गिलास आदि के शब्द चित्र कार्ड शामिल थे। इस गतिविधि में बच्चों को चित्र अपनी तरफ रखते हुए उसके पीछे का हिस्सा सबको दिखाते हुए उसका नाम बताना था। पहले सभी बच्चों ने अपने-अपने कार्ड पढ़े। फिर उन्होंने कार्ड को अपने सामने कुछ इस तरह से रखा कि उसका लिखा हुआ भाग ही दिखाई दे। अब सबको बारी-बारी से यह बताना था कि प्रत्येक बच्चे के सामने रखे कार्ड पर क्या लिखा है। कुछ बच्चों को याद था, कुछ ने अन्दाज़ा लगाया और कुछ थोड़ा भूल गए। पढ़ने के इस खेल में बच्चों को बहुत मज़ा आया।

फोटो साभार: मुकेश मालविया
इसके बाद उन सज्जन ने मुझे अपने साथ लाए हुए सभी कार्ड दे दिए। साथ ही, कुछ पेंसिल, कार्डशीट, स्केच पेन के पैकेट ओर कोरे कागज़ भी दिए। उन्होंने कहा कि हम आपके स्कूल में आते रहेंगे। उनके द्वारा दी गई सामग्री का क्या करना है इस बारे में उन्होंने मुझसे कोई बातचीत नहीं की। वे अपनी साइकिल से वापस चले गए। उस दिन मेरी कक्षा से गिनती और पहाड़े दोहराने की आवाज़ नहीं आ रही थी, बल्कि बच्चे रज्जो की बेटी वाला गीत दोहरा रहे थे।
एक दो सप्ताह बाद वे सज्जन फिर साइकिल से हमारे स्कूल में आए। वे अपने थैले में अक्षरों और गिनती के कार्ड्स और क्रेयॉन्स भी लाए थे। वे मुझे साथ लेकर पहली दूसरी कक्षा में गए। उन्हें देखते ही बच्चे खुशी से भर गए और कहने लगे, “सर! रज्जो की बेटी वाला गीत सुनाओ।” उन्होंने कहा, “पहले मेरा नाम बताओ। पिछली बार मैंने अपना नाम बताया था।” कुछ एक बच्चों को उनका नाम याद था। उन्होंने कहा, “घनश्याम सर, घनश्याम सर।” इस पर उन्होंने कहा, “घनश्याम सर नहीं केवल घनश्याम।” फिर उन्होंने कहा कि आज हम दूसरा गीत गाएँगे। इस गीत में सबको अपनी तरफ से एक लाइन जोड़नी होगी। गीत शुरू हुआ: “मैं तो सो रही थी मुझे मुर्गे ने जगाया बोला कूकड़ू कू कू।” बच्चों ने मज़े से इसे दोहराया। उन्होंने कहा, “अब इसमें दूसरी लाइन तुम्हें अपनी जोड़नी है कि तुम्हें किसने जगाया और उसकी आवाज कैसी थी। बच्चों को बात समझ आ गई। उन्होंने अपनी-अपनी पंक्ति जोड़नी शुरू की, जिसमें कुत्ते, बिल्ली से लेकर शेर, बन्दर, चिड़िया, तोते तक की आवाज़ें थीं। इस गीत के बाद उन्होंने बच्चों से पूछा कि क्या उन्हें पढ़ना आता है? बच्चों ने कहा, “नहीं।” उन्होंने कहा, “आता है सबको पढ़ना! मै बोर्ड पर आपके नाम लिख रहा हूँ, हम इनको पढ़ेंगे।” वे बच्चों से उनके नाम पूछकर बोर्ड पर लिखते गए। करीब 10 बच्चों के नामों को उन्होंने बोर्ड पर इधर-उधर लिख दिया। अब उन्होंने उंगली रखकर इन नामों को दो-तीन बार पढ़ा। फिर बच्चों से बोर्ड के पास आकर उंगली रखकर यह बताने को कहा कि उनका नाम कहाँ लिखा है। बच्चों ने अपने-अपने नाम पहचान लिए। इसके बाद, उन्होंने बच्चों से उनके नाम के पास लिखे नाम पढ़ने को कहा। अधिकतर बच्चों ने ये नाम भी पढ़ दिए। इससे मुझे समझ आया कि पढ़ने में अनुमान लगाने की भूमिका होती है।
मुझे यह भी समझ आया कि मैं अभी तक अपनी कक्षा में जो कुछ भी कर रहा था, बच्चे उसे वैसे का वैसा दोहराते थे। जबकि घनश्याम जी की गतिविधियों में दोहराना नहीं था, बल्कि बच्चों को खुद सोचना, समझना और बोलना था। खैर, उनके जाने के बाद मैंने भी नाम वाली गतिविधि
बच्चों के साथ की। एक दिन मैंने कुछ दूसरे नाम बोर्ड पर लिखे और उन्हें दो-तीन बार उंगली रखकर बच्चों को पढ़कर सुनाया। फिर बच्चों से सबसे पहला नाम पढ़ने को कहा। सभी बच्चों ने उसे पढ़ लिया। यही प्रक्रिया सबसे आखिरी में लिखे गए नाम के साथ दोहराई गई। उसे भी बच्चों ने पढ़ लिया। बच्चों को बीच के नाम पढ़ने में मुश्किल हो रही थी।
लगभग तीन वर्षों तक एकलव्य के साथियों का महीने में दो-तीन बार स्कूल में आकर बच्चों के साथ गतिविधि करना, बुनियादी शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराना और मुझे व बच्चों को सम्मान देना जारी रहा। यह सब मुझे प्रेरित करता रहा। धीरे-धीरे मैं स्वयं भी बच्चों के साथ खेल एवं सीखने की गतिविधियों में शामिल होने लगा। मेरे अध्यापन के तौर-तरीकों में एक बड़ा बदलाव यह आ रहा था कि मैं इसमें बच्चों की भागीदारी और समझ को उपयोगी मानने लगा था।
एकलव्य के साथियों के इस तरह के फॉलो-अप के अलावा गर्मियों की छुट्टियों में हमारे प्रशिक्षण भी आयोजित किए जाते थे। ये बहुत खास और अलग तरह के प्रशिक्षण होते थे। इनमें उन 16 स्कूलों के लगभग 40 शिक्षक-शिक्षकाएँ शामिल होते थे, जिनके साथ एकलव्य का काम चल रहा था। इनमें एकलव्य के वे साथी भी होते थे, जो हमारे स्कूलों में आते थे। साथ ही, दिल्ली-बम्बई के किसी बड़े कॉलेज के शिक्षक होते थे।
प्रशिक्षण एक हॉल में ज़मीन पर बिछी दरी पर गोल घेरे में बैठकर होता था। इसमें पहला सत्र परिचय का होता, जिसमें नाम के साथ अपनी रुचियाँ या अपने बारे में थोड़ा विस्तार से बताने का आग्रह होता था। सभी प्रतिभागियों को एक कार्ड या शीट के टुकड़े से अपनी-अपनी नेम प्लेट बनाकर उसे अपनी शर्ट या साड़ी पर लगाकर रखना होता था। सभी को उनके पहले नाम से सम्बोधित किया जाता था। इसमें सम्मान ओर अपनापन दोनों शामिल था। हरेक सत्र एक घण्टे का होता था जिसकी शुरुआत किसी बाल-गीत, किसी कविता या किसी जन-गीत से होती थी। इनमें से कुछ को हाव-भाव और अभिनय के साथ गाने का आग्रह होता था। हमने इन्हें सरलता और मज़े से किया और ये बाल-गीत, कविताएँ और खेल-गीत ही सबसे पहले हमारे साथ हमारे स्कूल तक आए। जैसे, बोलो भाई कितने नाम के खेल में एक गोले में घूमते हुए इस गीत को दोहराना होता था। फिर जितनी संख्या बोली जाती थी उतने लोगों का समूह बनाना होता था। एक और खेल था — क्या है लम्बा क्या गोल? जल्दी बोल, जल्दी बोल। इसमें गोले में बैठे साथी एक
गेंद को किसी के पास फेंकते थे, जिसके पास गेंद जाती थी उसे एक लम्बी ओर एक गोल वस्तु का नाम बोलना होता था। इसका नियम यह था कि बोली जा चुकी वस्तु को दोहराना नहीं था। इसी तरह, शब्द अन्ताक्षरी का खेल, जिसमें किसी अक्षर विशेष से शुरू होने वाले गाँव या शहर का नाम बोलना होता था या किसी रंग विशेष की वस्तु का नाम बताना होता था। इन खेलों में बदलाव की सम्भावना भी थी। जैसे, लम्बा और गोल वाले खेल को काला-सफेद में या दूर-पास में बदला जा सकता था। ये खेल ऐसे थे जिनमें विषयों की बातें शामिल थीं। मैं लगभग 50 के आसपास ऐसे खेल जानता हूँ, जिनका मकसद मैं शुरू में केवल आनन्द ही समझ पाया। मगर बाद में उनमें छिपे गणित, भाषा या पर्यावरण के ज्ञान को भी समझ पाया। गीत-कविताओं के बाद मेरे स्कूल ने इन खेलों को जल्दी ही अपना लिया गया और अपने कुछ नए खेल भी बनाए।

फोटो साभार: मुकेश मालविया
प्रशिक्षण में ज़्यादातर सत्र गतिविधि के रूप में होते थे, जिसमें हम शिक्षकों को समूह (टोली) में भागीदारी करनी होती थी। समूह बनाने की प्रक्रिया भी रोचक होती थी। कभी गिनती के आधार पर समूह बनाए जाते थे, तो कभी किसी और आधार पर। जैसे, 6 समूह बनाने के लिए सभी को क्रमशः 1 से लेकर 6 तक गिनती बोलनी होती थी। फिर जिन-जिन साथियों ने 1 बोला होता था उनका एक समूह बनता था, 2 बोलने वालों का दूसरा समूह आदि। इस तरह, हर बार नए-नए साथियों का समूह बन पाता था। हमें समूहों में कोई कार्य करने को दिया जाता था। यह एक चुनौती होती थी जिसे अपने समूह में पूरा करके हमें सबके सामने प्रस्तुति देनी होती थी। समूह के साथी दूसरे समूहों से सवाल-जवाब भी कर सकते थे। उदाहरण के लिए, एक गतिविधि में सभी समूहों को अखबारों की अलग-अलग हेडिंग काटकर दी गई। हेडिंग को आधार बनाकर हमें उससे सम्बन्धित रिपोर्ट लिखनी थी। समूह में आपस में चर्चा करके हमने रिपोर्ट बनाई।
समूह में हमने विज्ञान के छोटे-छोटे प्रयोग भी किए। जैसे, पानी में घुलनशील ओर अघुलनशील पदार्थों का पता लगाना, पत्तियों का अवलोकन करना और दो पत्तियों के बीच की समानता और असमानता बताना। प्रयोग करने से पहले हम एक परिकल्पना बनाते थे। जैसे, हमने अनुमान लगाया कि यदि भरे हुए गिलास में एक सिक्का डालेंगे, तो गिलास से थोड़ा पानी बाहर गिर जाएगा या फिर सिक्के के बराबर पानी बाहर निकलेगा। लेकिन जब हमने प्रयोग किया, तो पाया कि भरे हुए गिलास में पाँच से अधिक सिक्के डालने पर भी पानी बाहर नहीं गिरा। ऐसा क्यों हो रहा होगा, इस पर हमने चिन्तन किया और आपस में विमर्श किया।
प्रशिक्षण के दौरान हमने भाषा की, गणित की, विज्ञान की व अभिनय की भी बहुत-सी गतिविधियाँ कीं। जैसे, अधूरी कहानी पूरी करना, कविता की शुरुआती पक्तियों को आधार बनाकर कविता को आगे बढ़ाना, किसी कहानी के पात्र को बदलकर या उसका जेंडर बदलकर कहानी को फिर से लिखना, छोटे-छोटे विज्ञापन बनाना, अभिनय करना, किसी नाटक के डायलॉग बोलना आदि। यह सब हमारी रचनात्मकता ओर कल्पनाशीलता को उभारने वाला होता था। हम सभी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी करते थे।
इन प्रशिक्षणों में कुछ गतिविधियाँ दो-दो के समूह में करनी होती थीं और कुछ अकेले करनी होती थीं। कुछ सत्र अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा और विमर्श पर केन्द्रित होते थे। जैसे, हम किसी कौशल को कैसे सीखते हैं? साइकिल चलाने या तैरना सीखने में और स्कूल में पढ़ना सीखने या जोड़ना-घटाना सीखने में किस तरह का अन्तर है? बच्चों को खाली घड़ा मानने की सोच के पीछे क्या तर्क है? स्कूल आने से पहले बच्चे क्या-क्या जानते हैं? स्कूलों में बच्चों द्वारा की गई गलतियाँ हमें क्या बताती हैं? इस तरह की चर्चाओं में शिक्षकों को अपने विचारों को व्यक्त करना होता था। इन चर्चाओं से हम शिक्षकों के मन में बच्चों की जो स्थायी छवि बनी थी, उसका स्वरूप थोड़ा बदलने लगता।
इनमें पढ़ाने की परम्परागत शैलियों पर भी विमर्श होते थे। जैसे, इसमें एक महत्वपूर्ण विमर्श यह था कि क्या वर्णमाला सीखने और मात्रा-ज्ञान के बाद ही पढ़ना सीखा जा सकता है? इस बारे में हमारा अनुभव यह कहता था कि इस पद्धति से पढ़ना सीखने वाले बच्चे वाक्यों के अर्थ बनाने में मुश्किलों का सामना करते हैं या अर्थ नहीं बना पाते। वे शब्दों को मात्राओं की गलतियों के साथ पढ़ते हैं। इस सन्दर्भ में इन प्रशिक्षणों में हमें भाषा के जानकारों द्वारा लिखे गए लेख पढ़ने को दिए गए। हमें इन्हें पढ़कर बनी समझ को व्यक्त करना होता था। पढ़ना सीखने के सन्दर्भ में हमें पहली बार यह पता चला कि अक्षरों और मात्राओं को रटे बिना भी शब्दों को तर्क ओर अनुमान के आधार पर पढ़ा जा सकता है और बच्चे सीधे पूरे शब्दों या वाक्यों को पढ़ सकते हैं। हमें यह समझ आया कि पढ़ना सीखने में अक्षरों और शब्दों की ध्वनि से ज़्यादा उनके अर्थ की भूमिका होती है। इस समझ के आधार पर हमने पढ़ना सिखाने की इस पद्धति का अपने स्कूलों में इस्तेमाल किया।
इसके अलावा, इन प्रशिक्षणों में ऐसे सन्दर्भ और परिस्थितियाँ बनाई जाती थीं, जिससे हम प्रतिभागी अपने मौलिक विचार रख सकें। इस दौरान अक्सर यह होता था कि हमारे शब्द हमारे विचारों को ठीक-ठीक व्यक्त नहीं कर पाते थे, परन्तु फिर भी हमारे साथी हमारी कही बात का अभिप्राय समझ लेते थे। इससे हमें यह समझ आया कि अर्थ बनाने की प्रक्रिया में बोलने वाले और सुनने वाले दोनों का सक्रिय होना ज़रूरी है।
इन प्रशिक्षणों में हमने विषय ओर सीखने की प्रक्रियाओं के साथ-साथ हमारी ज़िम्मेदारियों और एक दूसरे की संवेदनाओं को भी समझना सीखा। हमने प्रशिक्षण के कमरे की सफाई से लेकर दरी बिछाने, समय का अनुपालन करने, अपनी खाने की थाली स्वयं साफ करने, खाना बनाने या अन्य कामों में जो लोग मदद कर रहे थे उनके प्रति सम्मान और आदर रखने जैसे मूल्यों को आत्मसात करना सीखा। ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि प्रशिक्षणों के दौरान हमने एकलव्य के साथियों को इस तरह से व्यवहार करते देखा।
कुल मिलाकर, इन प्रशिक्षणों ने हमें एक नई दृष्टि दी। हमने अपने विवेक का इस्तेमाल करना, अपने सीखे हुए पर सवाल उठाना, लिखित ज्ञान का अर्थपूर्ण विवेचन करना, बच्चों को विचारशील एवं समझदार मानना, विषयों को अपने लिए अर्थपूर्ण बनाना, कार्य-कारण सम्बन्धों की विवेचना करना आदि सीखा। ये सभी सीख और अनुभव हमारे लिए निरन्तर सीखने वाला और चिन्तनशील शिक्षक बनने का आधार बने।



No approved comments yet. Be the first to comment!