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क्षमता वर्धन से जुड़े सबक

प्रकाशित तिथि : ६ मई २०२६
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फोटो साभार: शिक्षामित्र

सामूहिक पहल टीम: क्या आप बता सकती हैं कि क्षमता वर्धन के क्षेत्र में आपके सफर की शुरुआत कैसे हुई?

सुदेष्णा सिन्हा: मैंने अपने काम की शुरुआत एक स्पेशल एजुकेटर के तौर पर की। मैं कई तरह की अक्षमताओं वाले बच्चों, खासकर सेरेब्रल पाल्सी वाले बच्चों के साथ काम करती थी। उस शुरुआती अनुभव से मुझे सीखने को सभी की पहुँच में और समावेशी बनाने की बुनियाद मिली। यह अनुभव आगे चलकर मेरे करियर में बहुत महत्वपूर्ण साबित हुआ।

1992 में, मैंने कोलकाता के एक स्कूल में काम करना शुरू किया, जो आर्थिक तौर पर वंचित एंग्लो-इंडियन बच्चों को शिक्षा प्रदान करता था। उस समय, स्कूल जाने वाले छोटे बच्चों के बड़े भाई-बहन शिक्षा से वंचित रह जाते थे। कोई भी स्कूल उन्हें दाखिला नहीं देता था।

1994 में, मुझसे 8 से 16 साल के बच्चों के लिए तीन घण्टे का आशीर्वाद विद्यालय स्थापित करने को कहा गया। इस मौके की बदौलत मैं भाषा से जुड़ी बाधाओं से जूझ रहे प्रवासी परिवारों के बच्चों के साथ काम करने के लिए अपने कौशलों को ढाल पाई।

उन दस सालों में मैंने बहुत कुछ सीखा। ऐसे उत्साही शिक्षार्थियों के साथ काम करके मुझे पारम्परिक शिक्षा और वंचित समुदायों के विद्यार्थियों की ज़रूरतों के बीच के फासले का पता चला। इनमें से कई बच्चे मुझे अब तक मिले सबसे समर्पित शिक्षार्थियों में से थे। फिर भी, अक्सर वे ऐसे विषयों को खारिज कर देते थे जिनका उनकी ज़िन्दगियों से कोई लेना-देना नहीं था, जैसे कि राजाओं और साम्राज्यों क ऐतिहासिक वर्णन। यह साफ हो गया था कि मेरी भूमिका केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि सीखने को उनके अनुभवों के अनुकूल बनाना थी।

इसके लिए समुदाय में भरोसा पैदा करना ज़रूरी था। उनकी ज़िन्दगियों को बेहतर तरीके से समझने के लिए शिक्षक और मैं अक्सर उनके घर जाकर उनके परिवार के लोगों से मिलते थे। इस प्रक्रिया में मेरी अपनी पुरानी धारणाओं को छोड़ना, बच्चों की विशिष्ट ज़रूरतों के मुताबिक खुद को ढालना, और ऐसे बच्चों से जुड़ने में शिक्षकों की मदद करना शामिल था जिनकी पृष्ठभूमि शिक्षकों की पृष्ठभूमि से अलग थी। लगातार होने वाले अन्दरूनी प्रशिक्षण हमारी क्षमता निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा थे।

सामूहिक पहल टीम: आपको शिक्षामित्र स्थापित करने की प्रेरणा कहाँ से मिली?

सुदेष्णा सिन्हा: 2004 में, मैंने और मेरे पति सुजीत ने शिक्षामित्र की कल्पना एक स्कूल और एक संसाधन केन्द्र के तौर पर की। हमारे लक्ष्य के दो हिस्से थे: सीखने के लिए एक समावेशी स्थान बनाना, हमारे प्रभावी अभ्यासों को दूसरों के साथ साझा करना और उन्हें लिखित रूप में दर्ज़ करना। तब तक मुझे मैंने जो कुछ भी सीखा था उसे लागू करने में आत्मविश्वास महसूस होने लगा था, खासकर बुनियादी साक्षरता और अंकगणित के अपने ज्ञान को।

हमने आसपास की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले बंगाली बोलने वाले बच्चों के साथ काम किया। उनमें से ज़्यादातर का नाम सरकारी स्कूलों में लिखा हुआ था। हालाँकि, उनमें से लगभग सभी बुनियादी कौशलों से जूझ रहे थे। ऐसे में यह ज़रूरी हो गया था कि हम सीखने का एक ऐसा माहौल बनाएँ जिसमें इन कमियों को समझते हुए उन्हें दूर करने पर काम हो।

एक बगीचे में शिक्षामित्र की एक कक्षा
एक बगीचे में शिक्षामित्र की एक कक्षा

आशीर्वाद विद्यालय में हमने जिस मॉडल का इस्तेमाल किया था उसे यहाँ पर दोहराना काफी नहीं था। यहाँ का परिवेश अलग था। इसके लिए सीखने के नए तरीकों की ज़रूरत थी। इसके अलावा, बंगाली भाषा में पढ़ाने के लिए लगभग कोई भी सामग्री उपलब्ध नहीं थी।

शिक्षामित्र के भाषा और गणित के बुनियादी कार्यक्रम शुरुआती सालों में अपनाई गई इन शिक्षाशास्त्रीय पद्धतियों की वजह से ही विकसित हो पाए।

सामूहिक पहल टीम: आप अपने कार्यक्रमों में क्षमता वर्धन के लिए कैसे काम करती हैं?

सुदेष्णा सिन्हा: क्षमता वर्धन एक बार का प्रशिक्षण भर नहीं होता। यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया होती है। इसके लिए आमतौर पर हम किसी संगठन की ज़रूरतों का आकलन करने के लिए सबसे पहले तो वहाँ का दौरा करते हैं। यहाँ हम विद्यार्थियों, शिक्षकों और समुदाय के लोगों के साथ बातचीत करते हैं। इस बातचीत का मकसद उनकी विशिष्ट समस्याओं की पहचान करना होता है।

इसी आधार पर, हम उनकी ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए कार्यशालाएँ तैयार करते हैं। फिर हम नियमित बातचीत के ज़रिए उनसे लगातार सम्पर्क बनाए रखते हैं।

प्रशिक्षण के बाद निरन्तर मार्गदर्शन प्रदान करना हमारे क्षमता वर्धन कार्यक्रम की सबसे प्रभावी विशेषता रही है। इसमें ज़रूरत के मुताबिक कुछ व्यक्तिगत दौरे भी शामिल होते हैं। प्रशिक्षण के बाद दिया जाने वाला परामर्श अधिकतम दो सालों तक प्रदान किया जाता है।

प्रशिक्षण के बाद, हम शिक्षकों को उनके अनुभव कक्षा कार्य और विद्यार्थियों की नोटबुक के वीडियो और तस्वीरों के ज़रिए साझा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इससे हमें दूर रहकर काम करने के बावजूद उनमें से हरेक को अलग से फीडबैक दे सकने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए, शिक्षक अकसर ब्लैकबोर्ड पर किए गए पढ़ाने के काम की या कक्षाएँ लेते हुए वीडियो भेजते हैं। इससे हम उनके पढ़ाने के तरीकों को व्यवहार में देख पाते हैं।

शिक्षकों का मिल-जुलकर काम करना भी बहुत ज़रूरी है। व्हाट्सएप ग्रुप बनाना फायदेमन्द हो सकता है जहाँ शिक्षक अपना काम साझा करें और उस पर चर्चा करें। इससे उनमें अपनेपन और साथ होने की भावना आती है और सामूहिक रूप से सीखने को बढ़ावा मिलता है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू समुदाय को शामिल करना है। कई शिक्षक ऐसे हैं जिन्होंने कॉलेज या यूनिवर्सिटी के स्तर की पढ़ाई की है। उन्हें हाशिए पर रहने वाले बच्चों को समझने और उनसे जुड़ने के लिए मार्गदर्शन की ज़रूरत होती है। समुदाय से जुड़ने और समुदाय के भीतर काम करने की उनकी क्षमता का विकास करना हमारे काम करने के तरीके की बुनियाद रहा है।

सामूहिक पहल टीम: क्या आप सफलता की कुछ ऐसी कहानियाँ या मिलकर काम करने के कुछ अनुभव साझा कर सकती हैं जो आपको खास लगती हैं?

सुदेष्णा सिन्हा: पिछले कुछ सालों में, मिलकर काम करने के बहुत से अनुभव खास तौर पर फायदेमन्द रहे हैं। मैं यहाँ क्लोरोफील फाउंडेशन के बारे में बताना चाहूँगी। जब पहली बार हमने उनसे सम्पर्क किया, तो समन्वयक और शिक्षक दोनों ने ही सक्रिय होकर भाग लिया। यहाँ तक की आधिकारिक तौर पर कार्यक्रम शुरू करने से पहले ही, ज़रूरतों का आकलन करने के दौरान ही उन्होंने कार्यक्रम के बारे में बहुत विस्तार से और बहुत ध्यान से सवाल पूछे। यह सिर्फ बुनियादी बातों को दोहराने भर तक सीमित नहीं था। वे हमारा आकलन भी कर रहे थे। मुझे लगा कि यह दरअसल एक सकारात्मक संकेत था।

सत्र दो चरणों में विभाजित थे। हरेक पाँच दिनों का था, और अँग्रेज़ी पर केन्द्रित था। जब वे सत्रों में शामिल हुए, तो गलतियाँ करने के बावजूद मुझे उनमें सत्रों में पूरी तरह से शामिल होने की आतुरता दिखी। वे नए विचारों को आज़माने के लिए उत्सुक थे और दिए गए असाइनमेंट्स से परे भी लगातार और सवाल पूछकर स्पष्टता हासिल करने की कोशिश करते थे।

कुछ लोगों को लग सकता है कि इससे प्रक्रिया धीमी हो जाएगी। हालाँकि, मैंने इसे जिन आदिवासी बच्चों के साथ वे काम कर रहे थे उनकी ज़रूरतों को सम्बोधित करने की उनकी गहरी प्रतिबद्धता के तौर पर देखा।

एक बगीचे में शिक्षामित्र की एक कक्षा
चिनार इन्टरनेशनल में अँग्रेज़ी की एक कक्षा

उनका यह उत्साह प्रदर्शन के सत्रों में भी नज़र आता था। गलतियाँ होने की सम्भावना के बावजूद भी उन्होंने हिम्मत के साथ प्रतिभागिता की। उन्होंने इन अनुभवों का इस्तेमाल खुद में सुधार लाने के लिए किया। प्रशिक्षण के बाद, वे कई महीनों तक सम्पर्क में बने रहे और लगातार अपनी प्रगति के बारे में अपडेट्स देते रहे।

एक बात जिसकी मैंने सचमुच में सराहना की, वह यह थी कि उन्होंने जो सीखा उसे अपने संगठन के अन्य शिक्षकों के साथ साझा करने की आदत और फिर सावधानी के साथ उन शिक्षकों को चुनना जो पढ़ाने में कुशल हों। वे इन सबकी फोटो और वीडियो भेजते थे। इससे हम यह देख पाते थे कि हमारी पद्धतियों को कैसे लागू किया जा रहा है। हालाँकि, यह बात कई अन्य संगठनों के लिए भी सच साबित हुई!

देखभाल और बारीकियों पर ध्यान देने का यह स्तर सराहनीय था। उन्होंने कार्य की विस्तृत योजनाएँ भी तैयार कीं। निश्चित समय-सीमाओं के भीतर वे क्या हासिल करना चाहते थे इसके लिए उन्होंने स्पष्ट लक्ष्य तय किए। अप्रत्याशित चुनौतियों की वजह से वे इन समय-सीमाओं को हमेशा पूरा नहीं कर सके। हालाँकि, उन्होंने धीमी गति से लगातार प्रगति बनाए रखी और इस पूरी प्रक्रिया के दौरान हमें सूचित करते रहे।

वे इस बात को लेकर भी पूरी तरह समर्पित थे कि कक्षा के हरेक सत्र की योजना सावधानी से बनाई गई हो और उसका सावधानी के साथ कार्यान्वयन हो। वे अक्सर ऐसे वीडियो और ऐसी तस्वीरें साझा करते थे जो सिखाने के उनके सोचे-समझे तरीके को दर्शाते थे। सबसे खास बात यह थी कि उन्हें जो भी फीडबैक दिया जाता था, वे उस पर लगातार सोच-विचार करते थे और जहाँ ज़रूरत होती थी बदलावों को लागू करते थे। इस समर्पण में उनकी कठिन मेहनत झलकती थी। इससे यह भी पता चलता था कि वे बेहतर नतीजों के लिए अपने तरीकों को बदलने और उन्हें सुधारने के इच्छुक थे।

कश्मीर में, एक और समूह (चिनार इंटेरनेशनल) कुछ अनोखी चुनौतियों का सामना कर रहा है। उदाहरण के लिए, समन्वयक सक्रियता से जुड़े हुए हैं। तीस पर भी अतिरिक्त शिक्षकों को लाने में उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बहुत से परिवार—खासकर वे परिवार जिनमें महिलाएँ होती हैं—उन्हें भागीदारी की अनुमति देने में हिचकिचाते हैं। इससे उनकी भागीदारी में एक बड़ी रुकावट आती है।

क्लोरोफील के दौरे के दौरान शिक्षकों के लिए एक डेमो कक्षा

इस समस्या का समाधान करने के लिए, समन्वयक वर्चुअल बैठकों के ज़रिए उनका निरन्तर जुड़ाव बनाए रखता है। इन सत्रों में कक्षा में आमने-सामने होनेवाली बातचीत शामिल होती है। वे कक्षा की गतिविधियों के वीडियो साझा करते हैं और पढ़ाने के तरीकों पर चर्चा करते हैं।

उन्हें नियमित रूप से असाइनमेंट भेजे जाते हैं। आगे बढ़ने में उनका मार्गदर्शन करने के लिए मैं उनकी गलतियों को सुधारती हूँ और उन्हें फीडबैक देती हूँ। अभी उनका सफर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। हालाँकि, वे लगातार मेहनत करते हुए इस प्रक्रिया में आगे बढ़ रहे हैं और सार्थक प्रगति कर रहे हैं।

बिहार में स्थित अरिपना फाउंडेशन में दो युवा शिक्षक थे जिनका समर्पण सराहनीय था। उन्होंने हमारे तरीकों को न सिर्फ अपने केन्द्र में, बल्कि नज़दीक के सरकारी स्कूलों में भी अपनाया। मार्गदर्शन एक साल तक चलता रहा। उनके समर्पण का दूरगामी प्रभाव हुआ। उस समय (यानी 2022 में), इससे शिक्षार्थियों के एक बड़े नेटवर्क को फायदा पहुँचा।

दो और सफलता की सम्भावना वाली पहलें जो अच्छे से विकसित हो रही हैं और जिनका उल्लेख किया जाना ज़रूरी है गुब्बाची लर्निंग कम्यूनिटी और प्रगत शिक्षण संस्थान हैं।

शिक्षामित्र द्वारा संचालित एक प्रशिक्षण सत्र
शिक्षामित्र द्वारा संचालित एक प्रशिक्षण सत्र

आखिर में, मैं हमारी सबसे पहली संलग्नता के बारे में बात करना चाहती हूँ, जो कि नॉर्थ ईस्टर्न एजुकेशन ट्रस्ट (नीट) के साथ थी। यह दो साल से भी ज़्यादा लम्बे समय तक चली। उनका कार्यक्रम मुख्य रूप से एक शिक्षिका की कोशिशों की बदौलत विकसित हुआ, जो कि पूरे प्रशिक्षण के कार्यक्रम के दौरान लगातार प्रयास करनेवाली और लगन के पक्की शिक्षार्थी थीं।

जल्द ही वे नीट के अँग्रेज़ी कार्यक्रम की ज़्यादातर ज़िम्मेदारियों को सम्भालने में सक्षम हो गईं। वे मुख्य प्रशिक्षक बन गईं और संस्थापक के साथ मिलकर अपनी टीम का गठन किया।

संस्था ने स्थानीय प्रशिक्षण समूह के तौर पर प्रशिक्षण देना शुरू किया। उनके द्वारा शिक्षकों के अन्य समूहों को प्रशिक्षण देना शुरू करने से पहले हमने समूह का मार्गदर्शन किया और उनके पाठों का आकलन और निगरानी की।

यह शिक्षिका अब दूसरी जगह चली गई हैं। वे स्थानीय स्तर की एक प्रतिभाशाली संसाधन शिक्षिका हैं। ज़रूरत पड़ने पर उनकी विशेषज्ञता का लाभ लिया जा सकता है।

क्षमता-निर्माण के बारे में दिलचस्प बात यह है कि यह अक्सर असफलताओं से पैदा होती है। ऐसे क्षण भी आते हैं जब आप फँसा हुआ महसूस करते हैं। आपने तो सोचा था कि आपने बहुत बढ़िया काम किया, लेकिन आखिर में सब कुछ आपकी नज़रों के सामने बिखर गया।

यही वह समय होता है जब आप वापस जाते हैं, पुनर्मूल्यांकन करते हैं और अच्छी तरह से तैयारी करते हैं। आप चीज़ों को बदलते हैं, अपने तरीकों में सुधार करते हैं, और फिर हालात के हिसाब से खुद को ढाल लेते हैं।

क्षमता-वर्धन आस-पड़ोस, समुदाय, और बदलती हुई परिस्थितियों से गहराई से जुड़ा होता है। शिक्षकों के जिन भी समूहों के साथ हम काम करते हैं उनमें से हरेक अलग है। प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए लगातार समायोजन करने की ज़रूरत होती है। यहाँ तक कि हमारे लिए भी, इसका सरोकार सिर्फ इससे नहीं होता कि हम बातचीत कैसे करते हैं, बल्कि इससे भी होता है कि इस पूरी प्रक्रिया को हम कैसे समझते हैं और उसे कैसे करते हैं। इससे यह प्रक्रिया रोचक और परिवर्तनकारी बनी रहती है।

नीट द्वारा प्रशिक्षण के लिए तैयार किया गया स्टोरीबोर्ड

सामूहिक पहल टीम: आपके विचार में संसाधन संगठन में परिवर्तित होने के लिए किसी संगठन में कौन-से गुण होने ज़रूरी होते हैं?

सुदेष्णा सिन्हा: किसी संसाधन संगठन में परिवर्तित होने के लिए किसी संगठन को केवल प्रशिक्षण नहीं और भी बहुत कुछ चाहिए होता है। मेरा मानना है कि इसके लिए पढ़ाने का सीधा अनुभव बहुत ज़रूरी होता है। असल कक्षाओं की जटिलताओं पर काम करने के लिए केवल सैद्धान्तिक ज्ञान काफी नहीं होता। किसी संगठन को लचीला होना चाहिए। इसे लगातार दूसरों से सीखते भी रहना चाहिए और उभरती हुई ज़रूरतों के अनुरूप खुद को ढालना चाहिए। टीम को अपने कौशलों को अपडेट करने की ज़रूरत होती है।

चीज़ों को स्थानीय परिस्थितियों और ज़रूरतों के अनुरूप ढालना भी ज़रूरी होता है। असल प्रभाव के लिए, स्थानीय समूहों के क्षमता वर्धन पर काम किया जाना चाहिए। इससे स्थानीय संगठन खुद आगे बढ़कर प्रशिक्षणों का नेतृत्व कर पाएँगे। इस तरह, समाधान टिकाऊ और सन्दर्भ विशिष्ट बन जाते हैं।

कई सालों के अपने काम से मुझे यह समझ आया कि समावेशी शिक्षा केवल पढ़ाने के तरीके तक सीमित नहीं होती। इसका सरोकार शिक्षार्थी की सामाजिक, सांस्कृतिक और सामाजिक वास्तविकताओं को समझने और उन्हें सम्बोधित करने से होता है। क्षमता वर्धन के लिए बदलते हालात के अनुरूप खुद को ढालने और बदलाव को लेकर खुलापन होने की ज़रूरत होती है। शिक्षकों के तौर पर हमें सुनकर, सीखकर और शिक्षण के अपने तरीकों को लगातार विकसित करते हुए सभी विद्यार्थियों के लिए सीखने के सार्थक मौके निर्मित करने का प्रयास करना चाहिए।

Note: This article first appeared in Samuhik Pahal in English with the title ‘Lessons in Capacity Building.’

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Sudeshna Sinha
Sudeshna Sinha is the founder of Shikshamitra (2005), an education resource center for teachers in Kolkata, which formerly also ran a school. Over the years, she has been involved in teachers’ training at the elementary level to primarily motivate, support and create good teachers. Designing methods and materials for effective teaching, especially languages, are her interest areas.