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फंडरेज़िंग: एक कला, विज्ञान या फिर खेल?

अपने लेख “फंडरेज़िंग: कला, विज्ञान या खेल?” में स्नेहा अरोड़ा फंडरेज़िंग पर असर डालने वाले बाहरी कारकों पर चर्चा कर रही हैं। साथ ही, वे प्रभावी फंडरेज़िंग के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हुए फंड जुटाने के कुछ ठोस और व्यावहारिक तरीके भी सुझाती हैं।

By Sneha Arora
१२ मिनट पढ़ें
Published on : अक्टूबर १४, २०२६
Modified On : October 15, 2026
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आइए सबसे पहले उस मुद्दे पर बात करते हैं जिससे परिचित तो सभी हैं, मगर जिस पर बात करने से सभी हिचकिचाते हैं। भारत में ज़्यादातर छोटे या मध्यम आकार के गैर- सरकारी संगठनों के लिए फंड जुटाना कठिनाइयों से भरी प्रक्रिया होती है। अक्सर लोग इस सोच के साथ विकास के क्षेत्र में कदम रखते हैं कि अगर किसी कार्यक्रम को प्रभावशाली ढंग से लागू किया जाए और उस कार्यक्रम का असर दिखे तो ज़ाहिर है फंडिंग भी मिल ही जाएगी। मगर ऐसा हमेशा होता नहीं है। हमने ऐसे गैर सरकारी संगठन देखे हैं जो बहुत ही अच्छे कार्यक्रम चला रहे हैं, मगर फिर भी संगठन या व्यवस्था से जुड़ी खामियों के चलते फंड जुटाने में कठिनाइयों का सामना करते हैं। सफल फंडरेज़िंग के लिए तीन चीज़ों की ज़रूरत होती है: कार्यक्रमों के ठोस नतीजे, संगठनात्मक क्षमताएँ और अनुकूल माहौल।

संगठनात्मक क्षमताओं का मतलब गैर सरकारी संगठन के प्रबन्धन से जुड़े उन अन्दरूनी पहलुओं से है, जिन पर आमतौर पर संस्थापक/सीईओ का पूरा नियंत्रण होता है। जब आत्मा संस्था गैर-सरकारी संगठनों की फंड जुटाने की क्षमताओं को मज़बूत करने के लिए उनके साथ काम करती है, तो हम संगठन के तीन अहम पहलुओं पर खास ध्यान देते हैं। किसी भी संगठन को इन पहलुओं के आधार पर अपनी खूबियों और खामियों को समझने और उन पर सोच-विचार करने में समय लगाना चाहिए। हम अक्सर देखते हैं कि संस्थापक/सीईओ फंड जुटाने से जुड़ी उनकी समस्याओं के समाधान के लिए संगठन के बाहर समाधान तलाशते हैं, जबकि उन्हें पहले थोड़ा ठिठककर अपने भीतर झाँकने की कोशिश करनी चाहिए और यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि फंड जुटाने की उनकी क्षमता में कहाँ कमी रह गई।

चाहे हम इसे पसन्द करें या नापसन्द, मगर फंड जुटाना कला और विज्ञान दोनों ही है। और अगर मैं इसमें कुछ और जोड़ूँ, तो यह असल में एक खेल जैसा ज़्यादा है। खेलों पर हुए शोध से यह उजागर हुआ है कि खेलों में किसी खिलाड़ी के सफल होने के पीछे इन सात खूबियों का हाथ होता है – एकाग्रता, बेहतरीन प्रदर्शन करने का संकल्प, इच्छा और प्रेरणा, लक्ष्य तय करना, आशावाद, आत्मविश्वास और अच्छे और मज़बूत रिश्ते व सहयोग। अगर आप फंडरेज़िंग का काम करते हैं, तो मुझे पक्का यकीन है कि आप इनमें से ज़्यादातर खासियतों से खुद को जोड़ पाएँगे और कभी आपको अपनी ये खासियतें आपकी ताकत लगी होंगी, तो कभी कमज़ोरी।

फंडरेज़िंग पर असर डालनेवाले बाहरी कारक

भले ही फंड जुटाने में गैर-सरकारी संगठनों की सफलता में संगठन से जुड़े कारकों की काफी अहम भूमिका होती है, मगर अक्सर बाहरी कारक भी इसमें अड़चन डालते हैं। बाहरी कारकों की पहचान करना, ये फंडरेज़िंग पर कब और कैसे असर डालते हैं इसे समझना मुश्किल हो सकता है। मगर वह गैर-सरकारी संगठन किस क्षेत्र में कार्यरत है, उसका आकार क्या है और वह कहाँ काम करता है जैसे बाहरी कारकों के आधार पर उसको फंडिंग मिलने की सम्भावनाओं पर काफी गहरा असर पड़ता है। संगठनात्मक क्षमताओं के विपरीत, ये कारक अक्सर संस्थापक/सीईओ के नियंत्रण में नहीं होते। मेरे विचार में, भारत में गैर-सरकारी संगठनों की फंडिंग को पाँच बाहरी कारक प्रभावित करते हैं।

  • गैर-सरकारी संगठन के उद्देश्य और फंडर की अपेक्षाओं के बीच मेल न होना: आज के समय की डेटिंग की तरह ही मध्यम आकार के गैर-सरकारी संगठनों के नेतृत्वकर्ता भी सबसे उपयुक्त डोनर की तलाश में रहते हैं। वे शुरुआत में ही कुछ चीज़ों के बीच मेल देखने की कोशिश करते हैं। जैसे, संस्था के कार्य-क्षेत्र और डोनर के प्राथमिकता के क्षेत्र के बीच मेल (जैसे कि शिक्षा), वह संस्था जिस उपक्षेत्र में कार्य करती है उसका डोनर की प्राथमिकताओं से मेल (जैसे कि जीवन कौशल), संस्था जो कार्यक्रम चला रही है उसका डोनर की रुचि से मेल (जैसे कि शिक्षक प्रशिक्षण या विद्यार्थियों के साथ सीधे तौर पर किया जाने वाला काम), संस्था का साल भर का बजट (जैसे कि 5 करोड़ से कम), अनुदान की अवधि (एक वर्ष के लिए दिया जानेवाला अनुदान या एक से ज़्यादा वर्षों के लिए दिया जानेवाला अनुदान) वगैरह। भारत के 31 लाख गैर-सरकारी संगठनों को कुछ हज़ार संस्थागत डोनर्स के द्वारा निर्धारित किए गए इन मानदण्डों को पूरा करना होता है। किसी गैर-सरकारी संगठन के नेतृत्वकर्ता के लिए इन कामों को सम्भालना ही अपनेआप में काफी मुश्किल काम होता है।
  • समान स्तर की जानकारी का अभाव होना: इसी से सम्बन्धित एक दूसरी चुनौती जानकारी के स्तर में गैर-बराबरी का होना है। गैर-सरकारी संगठन और डोनर के पास एक दूसरे के बारे में समान स्तर की जानकारी नहीं होती। इसकी वजह से भी डोनर की अपेक्षाओं और गैर-सरकारी संगठन के उद्देश्यों के बीच का फासला और ज़्यादा बढ़ जाता है। अकसर गैर-सरकारी संगठन तो डोनर के बारे में जानकारी जुटाने में समय और संसाधन लगाते हैं, मगर बहुत कम ही डोनर ऐसे हैं जो गैर- सरकारी संगठन के बारे में जानकारी जुटाने में समय और संसाधन लगाते हैं। फंडिंग के क्षेत्र में देनेवाले यानी डोनर और लेनेवाले यानी गैर-सरकारी संगठन दोनों ही के बारे में जानकारी के हालात काफी खराब हैं। डेटाबेस पर निर्भरता कुछ हद तक मददगार साबित हो सकती है। लेकिन अकसर हमने यह देखा है कि गैर सरकारी संगठनों के पास ऐसी जानकारी के स्रोतों तक पहुँचने के लिए ज़रूरी संसाधन नहीं होते जिनसे उन्हें डोनर की अपेक्षाओं और अपने काम के उद्देश्यों के बीच के फासले को कम करने में मदद मिल सके। इन दोनों चुनौतियों की वजह से गैर-सरकारी संगठनों के लीडर्स एक ऐसे दुष्चक्र में फँस जाते हैं जिससे बाहर निकलना उनके लिए मुश्किल हो जाता है।
  • सरकारी नियम-कायदों से जुड़ी चुनौतियाँ: ये चुनौतियाँ हाल ही में उन व्यापक-आर्थिक चुनौतियों में शामिल हो गई हैं, जो कि किसी गैर-सरकारी संस्थान के फंडरेज़िंग के प्रयासों की कोशिशों में मुश्किलें पैदा करती हैं। पिछले 1-2 वर्षों में विदेशी फंड तक कम पहुँच और एफसीआरए के तहत लाइसेंस के नवीनीकरण की ज़रूरतों की वजह से गैर-सरकारी संगठनों की वित्तीय टीमें और काफी व्यस्त रही हैं। इन टीमों की निगरानी का काम अकसर गैर-सरकारी संगठनों के सीईओ करते हैं। इससे छोटे और मध्यम आकार के गैर-सरकारी संगठनों के लिए फंड हासिल कर पाना और फंडरेज़िंग की कोशिशों में संसाधन और समय लगाना दोनों ही मुश्किल हो जाता है।
  • डोमिनो एफ़ेक्ट या एक की वजह से दूसरी समस्या पैदा होना: चौथा कारक, जिसकी ओर मैं खास तौर से ध्यान दिलाना चाहूँगा, वह है ‘डोमिनो प्रभाव’। सभी गैर-सरकारी संगठन इसका अनुभव नहीं करते हैं, मगर जो इसका सामना करते हैं, वे घण्टी के आकार के वक्र के आखिरी सिरों पर पहुँच जाते हैं। कई वजहों से जो गैर-सरकारी संगठन बड़ी मात्रा में फंड जुटाने में कामयाब रहे हैं, वे अपनी कामयाबी को बुनियाद बनाकर अपने काम का विस्तार करते हैं। बेशक, उनकी इस कामयाबी के पीछे उनके कार्यक्रम के शानदार प्रदर्शन का हाथ होता है। हालाँकि, मैंने इसका उल्टा भी होते देखा है। कभी-कभी छोटे गैर-सरकारी संगठनों को ऐसे कारणों से फंडिंग मिलनी बन्द हो जाती है, जो उनके नियंत्रण में ही नहीं होते। नतीजन, उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ता है, जिसमें एक के बाद एक फंडर अपने हाथ खींच लेते हैं और उनका वज़ूद ही खतरे में पड़ जाता है।
  • आकस्मिकता: फंडरेज़िंग में किस्मत या बेतरतीबी की भूमिका पर चर्चा के बगैर फंडरेज़िंग पर बाहरी कारकों के असर पर मेरे विचार अधूरे ही रहेंगे। मुझे यकीन है कि हम सभी ने इस विरोधाभास का सामना किया होगा कि सालों की कड़ी मेहनत के बावजूद किसी डोनर ने फंड देने से मना कर दिया होगा। वहीं, किसी ने अचानक फोन करके हमें बताया होगा कि वे हमारे मकसद के लिए हमें दान देना चाहते हैं, यह सब एक सुखद संयोग जैसा लगता है। हो सकता है कि फंडरेज़र के तौर पर हमारे लिए इस आकस्मिकता को ध्यान में रखते हुए ‘योजना’ बनाना मुश्किल हो, मगर हमारी संस्था में फंडरेज़िंग में कामयाबी या नाकामयाबी पर इसके असर को हम नज़रअन्दाज़ नहीं कर सकते।

फंडरेज़िंग में क्या कारगर साबित होता है

हमेशा आशावादी रहने के नाते, भले ही इस लेख की शुरुआत मैंने फंडरेज़िंग की चुनौतियों से की है, मगर मैं इसका अन्त उन सुझावों और सिफारिशों के साथ करना चाहूँगी, जिन्हें मैंने आत्मा एसीलिरेटर के साथ अपने काम के दौरान ऐसे गैर सरकारी संगठनों के लिए कारगर साबित होते देखा है, जो कुछ वर्षों से काम कर रहे हैं और कुछ हद तक स्थापित हो चुके हैं।

  • लगातार मेहनत करते रहें: मेरे मुताबिक, फंडरेज़िंग में मेहनत की भूमिका 80 फीसदी और किस्मत की भूमिका 20 फीसदी होती है। दूसरे शब्दों में कहें, तो संगठन से जुड़े कारक इस बात पर काफी असर डाल सकते हैं कि फंडरेज़िंग में सफलता मिलेगी या नहीं। चूँकि ये बातें काफी हद तक संस्थापक/सीईओ के नियंत्रण में होती हैं, इसलिए उनके लिए यह समझना और स्वीकार करना ज़रूरी है कि फंडरेज़िंग में मेहनत करने पर ही अच्छे नतीजे मिलते हैं। आत्मा में, हम गैर-सरकारी संगठनों को यही सलाह देते हैं और इसमें उनकी मदद करते हैं कि फंडरेज़िंग के नतीजों की उम्मीद करने से पहले वे फंडरेज़िंग के अपने प्रयासों पर नज़र रखने के लिए कुछ मानदण्ड तय करें। इसका मतलब यह है कि लक्ष्य केवल इसके लिए न तय किए जाएँ कि कितनी राशि जुटाई जानी है, बल्कि आयोजित की गई बैठकों की संख्या, भेजे गए प्रस्तावों और सम्भावित नए डोनर्स और फंडिंग के स्रोतों के लिए भी लक्ष्य तय किए जाने चाहिए। फंडरेज़र के पास मज़बूत शोध करने और योजना को प्रभावी ढंग से अमल में लाने की क्षमता होना बेहद ज़रूरी है।

    संसाधन के लिए सुझाव: फंडिंग के सम्भावित स्रोतों की सूची को व्यवस्थित ढंग से सम्भालने के लिए Streak एक बढ़िया सॉफ्टवेर है। यह फंडरेज़िंग की टीम को फंडिंग के सम्भावित स्रोतों से व्यवस्थित ढंग से सम्पर्क करने और आगे बढ़ने में मदद करता है।
  • अपने डोनर्स में विवधता लाएँ: कभी भी अपने सभी अण्डों को एक ही टोकरी में न रखें, या यूँ कहें कि एक ही तरह की टोकरी में भी न रखें। विविधता के दो आयाम हैं: एक तो उन डोनर्स की संख्या, जो आपकी संस्था के वार्षिक बजट में योगदान देते हैं, और दूसरा इन डोनर्स की प्रकृति। डोनर्स की संख्या ज़्यादा रखें। बेशक, इससे उन्हें सम्भालने में मुश्किलें आएँगी, मगर फंडरेज़िंग के जोखिम को कम करने के लिहाज़ से इसके फायदे इसकी लागत से कहीं ज़्यादा हैं।

    दूसरी बात यह सुनिश्चित करना है कि आपके डोनर्स अलग-अलग तरह के हों। इसका मतलब यह है कि आपके डोनर्स में कॉर्पोरेट्स, फाउंडेशन, भारतीय और अन्तरराष्ट्रीय फंडिंग के स्रोत, हाई नेट वर्थ वाले लोग और आम लोग, बार-बार और एक बार दान देनेवाले लोग, एक वर्ष के लिए दान देनवाले लोग और कई वर्षों तक दान देनेवाले लोग सभी शामिल होने चाहिए। इससे संगठन की वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलती है।

    संसाधन के लिए सुझाव: डोनर्स की विभिन्न श्रेणियों को समझने के लिए आईडीआर पर प्रकाशित यह लेख पढ़ें और यह आकलन करें कि वर्तमान में आपके डोनर्स का मिश्रण किस तरह का है।
  • डोनर के साथ रिश्तों को बेहतर करने में समय और संसाधन लगाएँ: मैंने पाया है कि किसी नेतृत्वकर्ता के लिए फंडरेज़िंग सबसे ज़्यादा सोच-समझकर और योजनाबद्ध ढंग से किए जानेवाले कामों में से एक हो सकती है, पर यह किसी बड़े लक्ष्य को ध्यान में रखकर किए गए कामों में से भी एक हो सकती है। संस्था के सीईओ/संस्थापक द्वारा किसी डोनर के साथ इस तरह के रिश्ते को विकसित करने और उसे मज़बूत करने में समय और संसाधन लगाना जो केवल फंडिंग तक सीमित न हो संगठन के लिए तेज़ी से आगे बढ़ने का ज़रिया बन सकता है। आपने आखिरी बार कब किसी ऐसे डोनर से बात की या उनके साथ कॉफी पी, जिन्होंने 5 वर्ष पहले आपके संगठन को सहयोग किया था? हो सकता है कि यह आपके संस्थान की सबसे तात्कालिक ज़रूरत न लगे, मगर यह भविष्य के लिए किया गया एक निवेश है। डोनर के साथ रिश्ते मज़बूत करने के लिए समय और संसाधन लगाएँ।
  • भविष्य के लिए कुछ फंड बचाकर रखें: यह एक ऐसी सीख है जो हमें हाल ही में मिली है और महामारी के बाद से हम इस पर पूरी दृढ़ता के साथ ज़ोर देते हैं। मुश्किल समय के लिए बचत करना तब तक ज़रूरी नहीं लगता जब तक कि वह मुश्किल समय आ न जाए। वर्ष 2020 से अगर हमने कुछ सीखा है, तो वह है हमारे समय की अनिश्चितता। अगर आप चाहते हैं कि अपने साझेदारों के साथ मिलकर आपका संगठन भविष्य में कोई बदलाव ला सके, तो इसके लिए धन सुरक्षित करने के लिए समय और ऊर्जा लगाएँ और एक ठोस योजना बनाएँ।

    संसाधन के लिए सुझाव: CAP एक ऐसी संस्था है जहाँ किसी गैर सरकारी संस्था को नियमों के अनुरूप काम करने, वित्त और फंडरेज़िंग को बेहतर बनाने सम्बन्धी मदद एक ही जगह पर मिल सकती है।
  • अपने लिए समर्थन का एक तंत्र तैयार करें: जी बिल्कुल, आपके लिए। फंडरेज़िंग मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण खेल लग सकता है क्योंकि अधिकतर इसे या तो अकेले खेला जाता है या फिर एक ऐसी टीम के साथ खेला जाता है जो लगातार बदलती रहती है। गैर सरकारी संगठनों को हमारी सलाह यह है कि वे अपने समर्थकों का एक मज़बूत नेटवर्क बनाने में समय और संसाधन लगाएँ। इसमें दोस्त, परिवार के सदस्य, बोर्ड सदस्य, सलाहकार और मार्गदर्शक शामिल होने चाहिए जो फंडरेज़िंग के दौरान आने वाले उतार-चढ़ाव भरे दौर में उनका मार्गदर्शन कर सकें। जैसा कि खेल में होता है वैसे ही फंडरेज़िंग में भी हो सकता है कि सब कुछ करने के बावजूद आपको विफलता हासिल हो। ऐसे क्षणों में, मैं जॉन वुडन द्वारा दी गई सफलता की परिभाषा को फिर से पढ़ता हूँ जिस पर मैं पिछले दस वर्षों से अमल करता आया हूँ  – “सफलता मन की शान्ति है, जो तभी हासिल होती है जब आपको यह आत्म-सन्तुष्टि होती है कि आपने अपनी क्षमता के मुताबिक अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश की।”

    संसाधन के लिए सुझाव: किसी फंडरेज़र की ज़िन्दगी का कोई दिन कैसा होता है यह जानने के लिए आत्मा के फंडरेज़िंग एसोसिएट का यह लेख पढ़ें।
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Sneha Arora
Sneha Arora
Sneha Arora joined Atma in 2018 and served as its Chief Programs Officer for 3 years before transitioning into the CEO role in 2021. An MBA from Indian School of Business in Strategy and Finance, she is passionate about applying her skills to enable education NGOs to accelerate their impact.
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