रचनात्मकता और आत्मचिन्तन: शिक्षा के लिए आवश्यक गुण
“रचनात्मकता और आत्मचिन्तन: शिक्षा के लिए आवश्यक गुण” में सागरिका चटर्जी और निशा नायर संसाधन उपलब्ध कराने वाले एक संगठन के परिप्रेक्ष्य से ‘कला और शिक्षा’ के क्षेत्र में क्षमता संवर्धन का अपना अनुभव साझा कर रही हैं।

शिक्षा में रचनात्मकता की अहमियत
हमारे देश के बच्चों को शिक्षित करने और उन्हें इक्कीसवीं सदी के लिए तैयार करने की निरन्तर चल रही कोशिशों में इस बात को लेकर व्यापक सहमति है कि इक्कीसवीं सदी के बाकी कई कौशलों के साथ-साथ, रचनात्मकता भी एक बेहद ज़रूरी कौशल और नज़रिया है, जिसे सभी विद्यार्थियों में विकसित किया जाना चाहिए।
नीतिगत विमर्श रचनात्मकता के ऐसे सन्दर्भों से भरे पड़े हैं। विश्व बैंक (2019) के अनुसार, “भविष्य की नौकरियों के लिए किस तरह के कौशलों की ज़रूरत होगी, इसे लेकर अनिश्चितता को देखते हुए स्कूलों और शिक्षकों को छात्रों को केवल पढ़ने और लिखने के बुनियादी कौशलों की बजाए उन्हें अन्य महत्वपूर्ण कौशलों से लैस करना होगा। छात्रों में जानकारी को समझने, राय बनाने, रचनात्मक होने, अपनी बात प्रभावी ढंग से कहने, दूसरों के साथ मिलकर काम करने और कठिन परिस्थितियों में भी मज़बूत बने रहने की क्षमता होनी चाहिए। संक्षेप में कहें तो उन्हें उन कौशलों से लैस होना चाहिए जो लगातार ज़्यादा चुनौतीपूर्ण होती जा रही और अनिश्चित दुनिया में कामयाब होने के लिए उनके लिए ज़रूरी हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लक्ष्यों और प्रतिबद्धताओं में भी “…हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था के सामने मौजूद वास्तविक चुनौतियों के समाधान पर ध्यान देने की बात कही गई है। खासकर साक्षरता और अंक ज्ञान, रटकर याद करने की प्रवृत्ति, शिक्षा के संकीर्ण लक्ष्यों और सीमित संसाधनों से जुड़ी चुनौतियाँ” (एनसीएफ 2023)।
शिक्षा में रचनात्मकता के मौजूदा हालात
एक तरफ तो रचनात्मकता के लिए ज़ोर-शोर से आह्वान किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर, भारत की शिक्षा प्रणाली आज भी जानकारी देने के उसी मॉडल को कायम रख रही है, जो रटकर याद करने को बढ़ावा देता है। यही नहीं, यह पाठ्यपुस्तकों और वर्कशीट्स पर भी ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर है। ये सभी रचनात्मकता के विकास में बाधा बनती हैं।
इसके अलावा, रचनात्मकता को विलासिता मानने की सोच भी बहुत आम है। ऐसी सोच रखने वाले लोग रचनात्मकता को एक ऐसी चीज़ मानते हैं जिसे तब तक एक ओर रखा जा सकता है जब तक कि बुनियादी साक्षरता और अंक ज्ञान जैसे ज़्यादा ज़रूरी कौशलों पर ध्यान न दे दिया जाए। इस वजह से शिक्षा के सन्दर्भ में रचनात्मकता पर या तो बहुत कम ध्यान दिया जाता है या फिर वह पूरी तरह उपेक्षित रह जाती है।

फोटो साभार: आर्टस्पार्क्स फाउंडेशन
जब भी और जहाँ भी रचनात्मकता की अवधारणाओं पर बात होती है, तो वैचारिक समझ और व्यावहारिक समझ के बीच तालमेल की कमी साफ दिखाई देती है। दूसरे शब्दों में, लोगों में इस समझ की कमी है कि रचनात्मकता असल में है क्या और इसमें क्या-क्या शामिल है।
इस बारे में भी स्पष्टता की कमी है कि रचनात्मकता जैसी अवधारणाओं को स्कूली शिक्षा में कैसे शामिल किया जाए। आम तौर पर लोगों को ऐसी व्यावहारिक शिक्षण पद्धतियों की जानकारी नहीं है और वे इस्तेमाल में भी कम हैं जो सभी विद्यार्थियों की रचनात्मक भागीदारी और उनके रचनात्मक विकास को सम्भव बना सकें।
सिस्टम में बदलाव लाने के एक साधन के तौर पर रचनात्मक विकास
जब से इसकी स्थापना हुई है तब से ही आर्टस्पार्क्स फाउंडेशन विद्यार्थियों के रचनात्मक विकास को स्कूली शिक्षा को सशक्त और बेहतर बनाने के किसी भी प्रयास का अत्यन्त ज़रूरी हिस्सा मानता रहा है। अपने काम के ज़रिए आर्टस्पार्क्स लगातार यह उजागर करने की कोशिश करता रहा है कि बच्चों के विकास में कला बहुत अहम भूमिका निभा सकती है।
इन्हीं उद्देश्यों को पूरा करने के लिए, सरकारी स्कूलों में स्थित आर्टस्पार्क्स की ‘क्रिएटिव लर्निंग लैब’ कला-आधारित शिक्षण की सर्वोत्तम प्रथाओं के केन्द्र के तौर पर कार्य करने की कोशिश कर रही हैं। इसके अलावा, ये प्रयोगशालाएँ शिक्षक/फ़ैसिलिटेटर के विकास के ऐसे नए और प्रभावी तरीकों को बढ़ावा देती हैं, जिनसे शिक्षण पद्धति में यह बदलाव आ पाता है।
व्यावसायिक विकास के क्षेत्र में आर्टस्पार्क्स का काम क्रिएटिव लर्निंग लैब्स में किए गए हमारे ही काम का विस्तार रहा है। इसी उद्देश्य से हम एडस्पार्क्स कलेक्टिव नाम का एक कार्यक्रम चलाते हैं। यह कार्यक्रम ऐसे लोगों के पेशेवर विकास के लिए है, जो कला और शिक्षा दोनों को जोड़ते हुए काम करते हैं। इसे उन सभी लोगों के लिए तैयार किया गया है, जो यह समझने में रुचि रखते हैं कि दृश्य कलाएँ (visual arts) छात्रों के सीखने को बेहतर कैसे बना सकती हैं।
इसकी बदौलत हमें विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे कई अलग-अलग जगहों के गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर काम करने का मौका मिला है। साथ ही, इससे हमें साथ मिलकर उनकी क्षमताओं को विकसित करने में भी मदद मिली है। यह प्रक्रिया उन्हें उनके सन्दर्भ के मुताबिक कला का इस्तेमाल करने में सक्षम बना रही है। इसका उद्देश्य उन बच्चों के सीखने और विकास को और बेहतर बनाना है, जिनके लिए वे काम करते हैं।

फोटो साभार: आर्टस्पार्क्स फाउंडेशन
कला और शिक्षा जहाँ मिलते हैं, वहाँ सीखने के तरीके और सिद्धान्त
पेशेवर विकास का हमारा काम सीखने के कुछ सिद्धान्तों और तरीकों पर आधारित है। हम उन्हें यहाँ साझा कर रहे हैं:
स्वयं करके, अनुभव और खोज-आधारित सीखने से हमारे प्रतिभागियों को खुद करके सीखने के कई मौके मिलते हैं। साथ ही, वे नई सीखी बातों को अपने पुराने अनुभवों से जोड़कर अपनी समझ को और ज़्यादा गहरा बना पाते हैं।
काम करते समय आत्म-चिन्तन करने की प्रक्रिया हमारे प्रतिभागियों को उनके द्वारा सीखे गए और अपनाए गए शिक्षण के व्यावहारिक तरीकों के नतीजों और असर का मूल्यांकन करने और समझने के साधन के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करती है।
परिवर्तनकारी सीखने की प्रक्रिया के दौरान सोच में असन्तुलन के ऐसे लम्हे आते हैं, जिनसे हमारे प्रतिभागी सीखने-सिखाने के बारे में अपनी मौजूदा मान्यताओं और तौर-तरीकों पर सवाल उठाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इससे उन्हें शिक्षक की भूमिका, उनकी क्षमताओं, उनके विद्यार्थियों और उनकी क्षमताओं व अन्य कई बातों के बारे में उनकी मौजूदा धारणाओं पर सवाल उठाने और उन्हें परखने में भी मदद मिलती है। सोच में असन्तुलन के ऐसे ही लम्हों में बड़े बदलावों की सम्भावना बन पाती है।
एक्शन लर्निंग से हमारे प्रतिभागी अपनी सीखों को अपने काम के क्षेत्र में लागू कर पाते हैं। इससे उन्हें अपने काम के नतीजों का अवलोकन करने और उन पर विचार करने में भी मदद मिलती है। यह प्रक्रिया उन्हें सीखने के अगले चक्र की कार्य योजना बनाने में मदद करती है।
सन्दर्भ-आधारित और परिस्थिति-आधारित सीखने से अलग-अलग सन्दर्भों की विशिष्ट जरूरतों को पहचानने में मदद मिलती है। इससे हमारे प्रतिभागी अपनी सीख को इन विविध सन्दर्भों और परिस्थितियों के अनुरूप ढाल पाते हैं।
सामाजिक सीख को एडस्पार्क्स की ‘कम्युनिटीज़ ऑफ़ प्रैक्टिस’ और क्षेत्रीय बैठकों के ज़रिए बढ़ावा दिया जाता है। इन दोनों ही मंचों पर, लोग अपनी सीख और कार्य करने के तौर-तरीकों को एक दूसरे से नियमित तौर पर साझा करते हैं। ये प्रक्रियाएँ प्रतिभागियों और साझेदार संगठनों के बीच अच्छे सम्बन्धों और एक-दूसरे से सीखने-सिखाने की अहमियत को समझते हुए उन्हें बढ़ावा देती हैं।
कम्यूनिटीज़ ऑफ़ प्रैक्टिस वे माध्यम हैं जिनकी मदद से व्यावसायिक विकास के कार्यक्रमों के नतीजों पर नज़र रखी जा सकती है। ये मंच किसी व्यक्ति या समूह की ज़रूरत के मुताबिक सहायता देने की योजनाएँ बनाने में भी मदद कर सकते हैं। लोगों की प्रतिक्रियाओं पर ध्यान देकर हम व्यावसायिक विकास के अपने कार्यक्रमों को परिस्थितियों के अनुसार लगातार बदलते रहते हैं, उन्हें आकार देते रहते हैं और सुधारते रहते हैं।
काम का असर दिखाने वाली कहानियाँ
शलाका देशमुख पिछले 30 वर्षों से महाराष्ट्र और उसके आसपास के क्षेत्रों में स्कूलों और नागरिक समाज संगठनों के साथ एक शिक्षक और शिक्षक प्रशिक्षक के तौर पर काम कर रही हैं। और बेंगलूरू स्थित साथ फाउंडेशन की ब्रिज स्कूल शिक्षक ज्योति आर्टस्पार्क्स द्वारा आयोजित किए गए विभिन्न व्यावसायिक विकास कार्यक्रमों का हिस्सा रही हैं। वे क्षमता निर्माण के अपने सफर के बारे में बताती हैं। आर्टस्पार्क्स के पेशेवर विकास के कार्यक्रमों में शलाका और ज्योति को खुद करके सीखने का मौका मिला। इससे उन्हें शिक्षा के कुछ विशिष्ट तरीकों पर विचार करने और उन्हें चुनौती देने का मौका मिला।
शिक्षण के अपने पिछले अनुभवों की तुलना में, ज्योति को शिक्षण का यह नया तरीका पसन्द आया जिसमें शिक्षक बच्चों को सारी जानकारी नहीं देते, बल्कि कला के ज़रिए बच्चे खुद सीखते हैं। ज्योति कहती हैं, “इस तरीके को खुद आज़माकर मुझे एहसास हुआ कि मैं कला की मदद से अवधारणाएँ कैसे पढ़ा सकती हूँ, जो पहले कभी मेरे दिमाग में नहीं आया था। असल में, कला बच्चों के लिए सीखने की प्रक्रिया को और ज़्यादा दिलचस्प बना देती है।”
एक शिक्षक प्रशिक्षक होने के नाते शलाका अनुभव आधारित शिक्षण के असर को देख पाईं। वह बताती हैं, “इससे प्रतिभागियों को यह समझने में मदद मिली कि शिक्षण के क्षेत्र में कला का इस्तेमाल कितनी तरह से किया जा सकता है। इससे उन्हें सीखने-सिखाने के ऐसे असरदार तरीकों की पहचान करने में भी मदद मिली, जो विद्यार्थियों के सीखने में ज़्यादा मददगार साबित हों।” एडस्पार्क्स कलेक्टिव के प्रतिभागी यह भी देख पाए कि किस तरह से अलग-अलग जगहों और सन्दर्भों में कला शिक्षा को फिर से जीवन्त और रोचक बना देती है। शलाका ने पाया कि वह आर्टस्पार्क्स के कला-आधारित सीखने के तरीके में शिक्षकों के खुद के अनुभवों को शामिल कर सकीं। फिर उन्होंने हरेक शिक्षक से अलग-अलग बातचीत करके उनके इन अनुभवों को शिक्षकों के विषय विशेष से जोड़ दिया। वह उदाहरण देते हुए बताती हैं, “प्रशिक्षण के बाद मैंने गणित के शिक्षकों से इस बारे में चर्चा की कि वे छात्रों में गणित की किसी अवधारणा की समझ को मजबूत करने के लिए कला का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं।” और विज्ञान के शिक्षकों से इस पर चर्चा की कि वे सीखने-सिखाने के इन तरीकों को विज्ञान की अपनी प्रयोगशालाओं में कैसे शामिल कर सकते हैं।”

फोटो साभार: आर्टस्पार्क्स फाउंडेशन
ज्योति की बात करें तो ज़मीन पर काम करने वाली शिक्षिका होने के नाते उन्हें यह निर्णय लेने का अधिकार नहीं है कि वे जिन बच्चों के साथ काम करती हैं उनके लिए अच्छी गुणवत्ता की कला सामग्री खरीदने के लिए धन आवंटित कर सकें। एडस्पार्क्स के ज़रिए, उन्हें यह जानकर बहुत ही खुशी हुई कि दृश्य कला की सामग्री कितनी विविध और व्यापक हो सकती है। ज्योति कहती हैं, “मुझे समझ आया कि हम अखबार, कार्डबोर्ड और बाकी दोबारा इस्तेमाल की जा सकने वाली चीज़ों का इस्तेमाल कर सकते हैं। यहाँ तक कि पत्तियों और सब्ज़ियों जैसी प्राकृतिक सामग्रियों को भी बच्चों को सिखाने के एक साधन के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। जब से मैंने इन सामग्रियों को अपनी कक्षा में इस्तेमाल करना शुरू किया है मैं देख पा रही हूँ कि मेरी कक्षा के बच्चे उपलब्ध संसाधनों का बेहतर तरीके से इस्तेमाल करना सीख पा रहे हैं। अब वे किसी भी चीज़ को ‘बेकार’ सामग्री नहीं मानते।”
एक शिक्षक के तौर पर ज्योति के सोचने के तरीके में भी बदलाव आया है। वह कहती हैं, “मुझे लगता है कि मैं अपने लेसन प्लान ज़्यादा रचनात्मक तरीके से बना पा रही हूँ। मैं अपने आसपास मौजूद संसाधनों को लेकर ज़्यादा जागरूक हूँ। मैं लगातार इन संसाधनों का इस्तेमाल अपने द्वारा पढ़ाए जाने वाले विषयों में करती हूँ।” एडस्पार्क्स का कम्यूनिटीज़ ऑफ़ प्रैक्टिस मॉडल सीखने को एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया बनाने में मदद करता है। इसके ज़रिए विभिन्न प्रतिभागी एक दूसरे से बातचीत करते हैं, अपने अनुभव साझा करते हैं और एक दूसरे से सीखते हैं। इससे वे अपने ज्ञान और कौशल में बेहतरी ला पाते हैं।
इन फायदों पर बात करते हुए ज्योति कहती हैं, “कम्यूनिटीज़ ऑफ़ प्रैक्टिस से मुझे यह समझने का मौका मिलता है कि बाकी प्रतिभागी जो कुछ सीख रहे हैं उसे कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं। इनसे मुझे बहुत-से नए विचार मिलते हैं। इनसे मुझे अपने कार्यक्षेत्र में कोशिश करते रहने का प्रोत्साहन भी मिलता है।”
एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए शलाका कहती हैं, “कम्यूनिटीज़ ऑफ प्रैक्टिस से लगातार नए अवसरों के सृजन में मदद मिलती है। इससे विभिन्न दृष्टिकोणों से गहरी समझ हासिल करने और किसी अवधारणा को अलग-अलग नज़रियों से देखने में मदद मिलती है।”
आखिर में
शिक्षा का कायाकल्प करने के लिए ऐसी व्यावहारिक रणनीतियों का प्रसार ज़रूरी है, जिनमें सीखने-सिखाने के रोचक तरीके शामिल हों। शिक्षकों के व्यावसायिक विकास के ऐसे तरीके जो उन्हें अपने शिक्षण के तरीकों पर सोचने-विचारने और उनमें बदलाव करने का मौका देते हों, इस पूरी प्रक्रिया का बहुत ज़रूरी हिस्सा हैं। हमें यह समझना चाहिए कि लोगों की ज़रूरत के मुताबिक उन्हें समर्थन प्रदान करना और लगातार सीखते रहना बहुत महत्वपूर्ण होता है। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हरेक सन्दर्भ और उसकी चुनौतियाँ अलग होती हैं।
सीखने-सिखाने में हो रहे इस बदलाव को आगे बढ़ाने के लिए यह ज़रूरी है। दूसरों की क्षमता निर्माण का कार्य करने वाली संस्था होने के नाते, हमें लगातार सीखते रहना चाहिए, नई परिस्थितियों के मुताबिक खुद को ढालना चाहिए और खुद में बदलाव करते रहना चाहिए।
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