जंगल और कक्षा
यह लेख कान्हा क्षेत्र के आदिवासी बच्चों के लिए विकसित जैव-विविधता पाठ्यचर्या के माध्यम से संदर्भ-आधारित शिक्षा की शक्ति को रेखांकित करता है। जंगल, स्थानीय ज्ञान, खेल, खेती और सांस्कृतिक अनुभवों को सीखने से जोड़कर यह दिखाता है कि शिक्षा कैसे बच्चों के जीवन से जुड़ते हुए वैज्ञानिक समझ और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को विकसित कर सकती है।

सुगमकर्ता (फ़ैसिलिटेटर) बनने का प्रशिक्षण लेने के मकसद से एक जगह पर जमा हुए लोगों के एक समूह से कहा गया कि वे किसी ऐसे यादगार लम्हे को साझा करें और उस पर सोच-विचार करें जब उन्हें कुछ सीखने का अनुभव हुआ। लोगों द्वारा साझा किए गए भाँति-भाँति के अनुभवों में, कुछ इस तरह की परिस्थितियाँ शामिल थीं: आंटी के साथ केक बनाने का अनुभव, जब किसी बर्ड वॉक के दौरान किसी पक्षी की पहचान उसकी किसी खासियत से की गई, तैराकी सीखने के दौरान प्रशिक्षक (कोच) से प्रशिक्षण लेने का अनुभव, माता-पिता के साथ खरीदारी करने का अनुभव वगैरह।
इस बात पर सभी ने गौर किया कि इनमें से किसी भी उदाहरण का सरोकार कक्षा के माहौल से नहीं था। ज़ाहिर है, इस छोटे से समूह के अनुभव के आधार पर कक्षा के माहौल को लेकर कोई पक्का नतीजा तो नहीं ही निकाला जा सकता था। मगर इन अनुभवों से यह समझने में मदद ज़रूर मिलती थी कि सीखने को किन परिस्थितियों में बढ़ावा मिलता है।
अगर किसी अनुभव से दुनिया के बारे में या खुद के बारे में हमारी समझ को विस्तार मिलता है, तो उससे कुछ सीखने की गुंजाइश होती है। इसके अलावा, जब सीखने का कोई अनुभव सीखने वाले की खुद की ज़िन्दगी से जुड़ा होता है, तो उसका असर कहीं गहरा और लम्बे समय तक रहने वाला होता है। वहीं, जब सीखना किसी ऐसे माहौल में होता है जो सीखने वाले की ज़िन्दगी से पूरी तरह कटा हुआ हो, तो उसका उतना असर नहीं होता।
किसी ऐसे पक्षी के बारे में सीखने से, जो कि व्यक्ति के आसपास के परिवेश में नज़र आता हो और जिसकी आवाज़ सुनाई देती हो, पक्षियों के विशाल संसार के बारे में जानने की दिलचस्पी और खोज-बीन के नए रास्ते खुल सकते हैं। यह अनुभव किताब में दिए गए दूर-दराज़ के पक्षियों के बारे में पढ़ने से कहीं अधिक गहराई वाला होता है।
हम समूची पाठ्यचर्या को एक ऐसे नज़रिए से कैसे देख सकते हैं कि सीखने की शुरुआत विद्यार्थियों के जीवन्त अनुभवों से हो? इस प्रक्रिया के दौरान हमें यह भी समझना होगा कि हमारे स्थानीय परिवेश से बाहर की दुनिया को जानने-समझने का सफर किस तरह का होगा।
इसी सोच के साथ हमने अर्थ फोकस फाउंडेशन के साथ अपने काम के तहत मध्य प्रदेश के कान्हा क्षेत्र के गाँवों के शिक्षकों की टीम के साथ जैव-विविधता पर एक पाठ्यचर्या तैयार की। जिन बच्चों के लिए हम इस पाठ्यचर्या को डिज़ाइन कर रहे थे वे गोंड और बैगा जैसे आदिवासी समुदायों से आते थे।
ये बच्चे कान्हा के जंगलों में रहते हैं। जंगल और उसका इकोसिस्टम उनकी रोज़ी-रोटी और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। मगर फिर भी जंगल के साथ उनका रिश्ता धीरे-धीरे कमज़ोर हो रहा है। इसकी वजह यह है कि उनका ज़्यादा वक्त कक्षा की चहारदीवारी में बीत रहा है। नतीज़न, वे रोज़ाना की ऐसी गतिविधियों में कम शामिल हो पाते हैं जो उनको जंगल के करीब ला सकती थीं।
पाठ्यचर्या को बनाने के दौरान हमने परिवारों, गाँव के बुज़ुर्गों और बच्चों से बात की। ऐसा करते हुए हम ऐसे तरीके ढूँढ पाए जिनके ज़रिए जंगल को एक बार फिर से शिक्षा और सीखने के सरोकार से जोड़ा जा सके।
कान्हा के प्राकृतिक परिवेश पर आधारित खेल और सीखने की गतिविधियाँ
भोजन जुटाने की प्रक्रिया और भोजन व पर्यावरण के बीच के सम्बन्ध: कान्हा के आसपास रहने वाले परिवारों के लिए भोजन जुटाना और भोजन व पर्यावरण के बीच का रिश्ता महज़ जीवित रहने के कौशल नहीं हैं। ये उनकी सांस्कृतिक और प्राकृतिक पहचान में गहराई से रचे-बसे हैं। उदाहरण के लिए, मॉनसून के मौसम में परिवार के लोग जंगली मशरूम और भाजी जैसी पत्तेदार सब्ज़ियाँ इकट्ठा करने और मछली पकड़ने जंगल में जाते हैं। इससे न सिर्फ उन्हें बढ़िया पोषण मिलता है, बल्कि यह सीखने का भी एक ज़रिया है।
बाज़ारों में मिलनेवाली एक जैसी और अक्सर बेमौसम फलों-सब्ज़ियों के विपरीत, जंगल में क्या खाने लायक है और क्या नहीं, इसकी बारीकी से समझ होना ज़रूरी होता है। इस बारे में समुदाय में पहले से मौजूद ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहता है। इसमें यह जानना भी शामिल होता है कि कौन-से मशरूम और पत्ते खाने लायक हैं, कौन-सी मछली किस मौसम में खाने के लिए सही है और इन्हें कैसे तैयार किया जाए और कैसे इनका प्रसंस्करण किया जाए।

हमारी पाठ्यचर्या में हम बच्चों को महत्वपूर्ण अवधारणाएँ सिखाने के लिए भोजन जुटाने के इन पारम्परिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। इन गतिविधियों में भागीदारी करके वे आकृतियों, आकारों, पैटर्नों और रंगों की पहचान करना सीखते हैं। इस दौरान वे प्राकृतिक माहौल में रहने का प्रत्यक्ष अनुभव हासिल करते हैं। इस तरीके से बच्चों को मौसम, चीज़ों के सड़ने-गलने और सड़ती-गलती हुई पत्तियों या लकड़ी के नज़दीक उगने वाले पौधों के जीवन-चक्र को समझने का मौका मिलता है।
महिलाएँ और बच्चे अक्सर एक साथ मिलकर भोजन की तलाश करते हैं। वे कीड़े-मकोड़ों, फूलों, छोटे पौधों, चिड़ियों, और कभी-कभी बाघों का अवलोकन करते हैं। ये अनुभव कौतूहल और रचनात्मकता को बढ़ावा देते हैं। ये जंगल को एक जीवन्त कक्षा में बदल देते हैं जहाँ सीखना स्वाभाविक और सार्थक ढंग से होता है।
प्रकृति से औषधीय जुड़ाव: कान्हा के आसपास रहने वाले समुदाय पारम्परिक औषधीय पौधों के बारे में गहरा ज्ञान रखते हैं। यह एक ऐसी विरासत है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित हो रही है। इस जानकारी की बदौलत वे पेड़ों, पौधों और जड़ी-बूटियों की पहचान कर पाते हैं। साथ ही, उन्हें यह भी पता होता है कि वे किन बीमारियों के उपचार में काम आते हैं। अक्सर उन्हें इसके लिए डॉक्टरों, अस्पतालों और फार्मिस्टों पर निर्भर नहीं होना पड़ता।
जंगल के बारे में उनकी गहरी समझ है। वे आसानी से पेड़ों के नाम बता सकते हैं, उनके फलों को पहचान सकते हैं और बस एक नज़र में बता देते हैं कि वे किस मौसम में मिलते हैं और किस काम आते हैं। उनका यह ज्ञान स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर यह कौतूहल जगाता है, खासकर इस बारे में कि इन समुदायों ने सबसे पहले यह कैसे पता लगाया कि किसी पौधे का कौन सा भाग किस बीमारी को ठीक करने के काम आ सकता है।
इस समृद्ध ज्ञान को अपनी पाठ्यचर्या में शामिल करने के लिए, हमने इसे जीव विज्ञान और वनस्पति विज्ञान से सम्बन्धित पाठों में शामिल किया है। उदाहरण के लिए, एक पाठ महुआ के पेड़ पर केन्द्रित था। इन समुदायों के लिए यह पेड़ खासा अहमियत रखता है। इस पाठ में हमने भोजन के स्रोत, आध्यात्मिक प्रतीक और औषधीय संसाधनों के तौर पर इसके कई तरह के उपयोगों पर चर्चा की। महुआ के पेड़ को पाठ का मुख्य केन्द्र बनाते हुए हमने विद्यार्थियों को किसी पेड़ के अलग-अलग हिस्सों के बारे में और पर्यावरण का सन्तुलन बनाए रखने में पेड़ों की अहम भूमिका के बारे में बताया।
इस चिर-परिचित सन्दर्भ के ज़रिए हमने प्रकाश संश्लेषण और पारिस्थितिक तंत्र के भीतर परस्पर निर्भरता जैसी अवधारणाओं पर भी बात की। इस तरीके को अपनाने से पाठ विद्यार्थियों के लिए ज़्यादा प्रासंगिक और दिलचस्प बन पाए। इससे उन्हें अपने पारम्परिक ज्ञान को व्यवस्थित ढंग से सीखने में इस्तेमाल करने का भी मौका मिल पाया। इस प्रक्रिया की बदौलत उन्हें प्राकृतिक दुनिया और वैज्ञानिक सिद्धान्तों, दोनों के बारे में अपनी समझ को गहरा करने में मदद मिली।
खेल और गतिविधियाँ: बच्चों के द्वारा स्वाभाविक तौर पर खेले जाने वाले खेलों को जैव-विविधता की पाठ्यचर्या का हिस्सा बनाना प्रकृति के साथ उनकी अन्तःक्रियाओं का अवलोकन करने तक ही नहीं सीमित होता। उदाहरण के लिए, हम अक्सर बच्चों को जैट्रोफा की पत्तियों और उनमें पाए जाने वाले अर्क या रस से बुलबुले बनाते हुए देखते हैं। फिर हम उनसे अलग-
अलग तरह के पौधों और उनकी खासियतों की पड़ताल करने को कहते हैं। फिर हम उनके सामने यह सवाल रखते हैं कि क्या बाकी पत्तियों और पौधों के रस से भी बुलबुले बनते हैं? अगर नहीं, तो क्यों?
यह उनके लिए अलग-अलग तरह के पौधों, पत्तियों, डंठलों की बनावट और यहाँ तक कि उनके विभिन्न जैविक प्रकार्यों को देखने-समझने का एक मौका बन जाता है। हम उनके खेल को सीखने से कुछ इस तरह से जोड़ते हैं कि वह उनके लिए सीखने का एक व्यवस्थित अनुभव बन जाए। इस तरह, हम यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रकृति को लेकर उनमें स्वाभाविक तौर पर मौजूद कौतूहल पौधों और पारिस्थितिक तंत्र की गहरी समझ में बदल जाए।

मिट्टी: एक जीवित चीज़ के रूप में: कान्हा में, मिट्टी वह ज़मीन भर नहीं है, जिस पर हम चलते हैं। यह रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के लिए एक बहुमूल्य संसाधन है। स्थानीय लोग मिट्टी से अपने घर बनाते हैं, चिकने और साफ-सुथरे फर्श बनाते हैं और यहाँ तक कि अपनी छतों के लिए मिट्टी से टाइलें (कावेलु) बनाते हैं।
हमारे पाठ ‘मिट्टी की खोज-बीन’ में हमने बच्चों को मिट्टी, इसके बनने, इसके संघटन, इसमें पाए जाने वाले खनिजों, इसके रंग, वह खुरदुरी है या चिकनी और इसकी अलग-अलग परतों के बारे में बताया। हमने कान्हा के अलग-अलग इलाकों में पाए जाने वाले मिट्टी के विभिन्न प्रकारों पर चर्चा की। फिर हमने मध्य भारत और पूरे देश में पाए जाने वाले मिट्टी के अलग-अलग प्रकारों पर चर्चा की, ताकि बच्चे यह समझ सकें कि किस तरह से अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरह की मिट्टी पाई जाती है।
बच्चों से बातचीत के दौरान, हमारे सामने यह सवाल आया – “मिट्टी सजीव है या निर्जीव?” कुछ का मानना था कि यह सजीव है क्योंकि यह पानी को सोखती है (जैसे बाकी जीव पानी पीते हैं), नई मिट्टी बनती है (वैसे ही जैसे जीवों में प्रजनन होता है), मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए पेड़ों को मज़बूती से थामे रखती है। बाकियों का कहना था कि यह निर्जीव है क्योंकि उनके साथियों की तरह यह उनके साथ खेलती या बातें नहीं करती।
बच्चों ने इस सवाल के जो जवाब दिए उनसे सीखने के नए मौके बने। ये सजीव और निर्जीव वस्तुओं की विशेषताओं, मिट्टी की पानी को रोककर रखने की क्षमता, उसके बनने की प्रक्रिया, मिट्टी के कटाव और उसके रोकने के तरीकों से सम्बन्धित थे। इन सभी बातों की वजह से बच्चे इस पाठ से खुद को जोड़ पाए और पाठ का विस्तार हो पाया।
मौसमी गतिविधियाँ और कक्षाओं में बच्चों की उपस्थिति
रोपा (धान बोने) और महुआ के मौसम में खेती और उससे जुड़ी बाकी गतिविधियों में बच्चों की हिस्सेदारी वाकई काबिले-तारीफ होती है। जहाँ बड़ी उम्र के बच्चे सक्रियता से धान की रोपाई और उसकी देखभाल करते हैं और महुआ के फूल बीनते हैं, वहीं छोटे बच्चे अन्य महत्वपूर्ण तरीकों से योगदान देते हैं। वे घर की सफाई में मदद करते हैं। जब तक उनके माता-पिता खेतों से लौटते हैं, तब तक वे खाना बनाने के लिए बर्तनों को धोकर तैयार कर देते हैं। वे मवेशियों को खुले खेतों में चराने भी ले जाते हैं।
बड़े बच्चों की यह हिस्सेदारी महज़ रोज़मर्रा के छोटे-मोटे कामों से कहीं बढ़कर होती है। यह उनके परिवार की खेती-बाड़ी वाली जीवनशैली का एक ज़रूरी हिस्सा है। इससे उन्हें सीखने के अनेकों महत्वपूर्ण अवसर मिलते हैं। अपने कार्यों के ज़रिए, छोटे बच्चों में ज़िम्मेदारी का भाव आता है। वे अपने समुदाय के तौर-तरीकों और प्राकृतिक परिवेश से जुड़ाव भी महसूस करते हैं। इन मौसमी गतिविधियों में शामिल होकर बच्चे पौधों से मिलने वाली उपज को संग्रह करने और उसका प्रसंस्करण करने, पौधों के जीवन-चक्र, पानी के प्रबन्धन और मिट्टी की गुणवत्ता के बारे में सीखते हैं। वे खेती के टिकाऊ तौर-तरीकों की अहमियत से भी वाकिफ हो पाते हैं।
तो, सन्दर्भ-आधारित शिक्षा का मतलब यह भी है कि इन मौसमों में स्कूलों से बच्चों के अनुपस्थित रहने की बात को ध्यान में रखा जाए। ऐसा नहीं हैं कि अगर बच्चा स्कूल नहीं आ रहा तो वह कुछ सीख नहीं रहा। हालाँकि, इस दृष्टिकोण के सफल होने में अभी काफी समय और प्रयास लगेंगे।
सन्दर्भ-आधारित पाठ्यचर्या बनाने की चुनौतियाँ
स्थानीय भाषाओं में ज्ञान को लिखित रूप में दर्ज करने का काम बहुत कम हुआ है, जो एक चुनौती है। इंटरनेट पर उच्च गुणवत्ता वाले संसाधन मौजूद हैं। ये ऑडियो और वीडियो दोनों ही रूपों में हैं। ये संसाधन जंगल के उस इकोसिस्टम के लिए प्रासंगिक हैं जिसमें हम काम कर रहे हैं। हालाँकि, ये अधिकतर अँग्रेज़ी में हैं। जिन समुदायों के साथ हम काम करते हैं यह उनकी तीसरी भाषा है और अधिकतर उनकी समझ से परे होती है।
ये संसाधन इस क्षेत्र के प्राकृतिक परिवेश को समझने के लिए उपयोगी हैं। हालाँकि, इन्हें यहाँ पर बनाया नहीं गया है। इसलिए, इनमें पेश किया गया नज़रिया और दिखाए गए दृश्य हमारे सन्दर्भ से अलग हो सकते हैं। हम राउंडग्लास सस्टेन जैसे संगठनों के द्वारा तैयार की गई सामग्री के ज़रिए इस फासले को पाटने की कोशिश कर रहे हैं। संसाधनों की इस कमी को दूर करने के लिए एक बहुत बड़ी लाइब्रेरी की ज़रूरत है, जो यहाँ की स्थानीय भाषाओं में हो।
लोककथाओं, मिथकों और विज्ञान पर चर्चा बहुत संवेदनशीलता के साथ की जानी चाहिए। हमें जो कहानियाँ सुनने को मिलीं, उनमें से एक गूलर के पेड़ के फूल के बारे में थी। यहाँ ऐसा माना जाता है कि गूलर के पेड़ का फूल असलियत में किसी ने नहीं देखा है। बहुत ही दुर्लभ मौके पर, जब अँधेरे में बिजली चमकती है, तब गूलर का फूल पेड़ से गिरता है। और उस समय अगर आप उस पेड़ के नीचे मौजूद हों, तो आपको उसे देखने का सौभाग्य हासिल होगा।
लेकिन जब लोगों ने गूलर के फल को काटकर उसके अन्दर के फूलों को देखा तो पाया कि वे आमतौर पर दिखने वाले फूलों जैसे थे ही नहीं। वे आसानी से इस बात पर यकीन करने को तैयार नहीं थे कि गूलर के अन्दर नज़र आ रहे फूल सच में उसके फूल थे। इससे उनकी जिज्ञासा और बढ़ गई और इस पर काफी बातचीत हुई कि असल में एक फूल कैसा होता है और उसकी बनावट कैसी होती है।
कुछ ऐसी ही स्थिति तब सामने आई जब साँपों, उनके ज़हर, साँप के काटने और इसके उपचार पर चर्चा हो रही थी। ज़्यादातर लोगों का यह मानना था कि कई गैर-विषैले साँप भी विषैले होते हैं। उन्होंने ब्रोन्ज़ बैक ट्री स्नेक को भी विषैला माना। इसका सीधा-सा मतलब यह था कि जब भी कोई साँप उनके सामने आता, वे उसे मार देते थे। इसके अलावा, साँप के काटने पर सबसे पहले स्थानीय ओझा से इलाज करवाया जाता था और कई मामलों में तो उसी से इलाज करवाया जाता था। ओझा मंत्र पढ़ते हुए, रोगी को हिलने-डुलने से मना करके साँप के काटे गए स्थान से चूसकर ज़हर निकालते थे। आज भी साँप काटने के इलाज के नए वैज्ञानिक तरीकों और पुराने तरीकों पर बातचीत जारी है।
आमतौर पर लोग सन्दर्भ-आधारित शिक्षा को ‘केवल स्थानीय’ शिक्षा मानने की भूल कर बैठते हैं। जब हम अपनी शिक्षण सामग्री और पद्धति को सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए तैयार करते हैं, तो हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हम कक्षा में जिस सामग्री का इस्तेमाल करें, वो सीखने वालों को उनकी ज़िन्दगी से कटी हुई न लगे। यह उनकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी, उनकी संस्कृति और उनकी ज्ञान की परम्पराओं से सम्बन्धित होती है। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि हम कक्षा में बच्चे के सन्दर्भ के बाहर की चीज़ें बिल्कुल ले ही ना जाएँ।
बेशक, हम ‘क’ से कंगारू ना पढ़ाएँ। मगर जब भी ऐसा मौका आए, हम कंगारू के बारे में बात ज़रूर करें। ऐसा करना भी ज़रूरी है। इससे हमें यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि बच्चे केवल अपने आसपास तक ही सीमित न रहें, बल्कि वे व्यापक दुनिया के ज्ञान से परिचित हो सकें।
शिक्षा में स्थानीय परिवेश को शामिल करने का मकसद केवल सीखने को प्रासंगिक बनाना नहीं है। इसका उद्देश्य शिक्षा को बच्चों के रोज़मर्रा के अनुभवों से जोड़ना है। इसके साथ ही शिक्षा के दायरे को व्यापक बनाते हुए उसमें दुनिया भर के ज्ञान को शामिल किया जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण शिक्षा को ज़्यादा सार्थक बनाता है और बच्चों में अपने समुदाय और पर्यावरण को लेकर गहरा जुड़ाव और अपनानपन विकसित करता है। यह उन्हें उनके स्थानीय परिवेश से बाहर की दुनिया से जुड़ने और उसमें हिस्सेदारी के लिए भी तैयार करता है।
इस पाठ्यचर्या को तैयार करते हुए और इसे बेहतर बनाते हुए हम कक्षा और जंगल के बीच के फासले को पाटने के अपने संकल्प पर कायम हैं। हम यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं कि सीखना बच्चे की ज़िन्दगी का स्वाभाविक और अनिवार्य हिस्सा बना रहे।
भले ही हमने अपनी इस पाठ्यचर्या को कान्हा के प्राकृतिक परिवेश को ध्यान में रखते हुए तैयार किया है, मगर इसे अन्य वन क्षेत्रों के लिए भी सार्थक बनाया जा सकता है। इसके लिए इसमें उस स्थानीय परिवेश की कुछ बातों को इस पाठ्यचर्या में शामिल करना होगा। उम्मीद यह है कि प्राकृतिक दुनिया के साथ बच्चों के सहज जुड़ाव को और मजबूती दी जाएगी और उसे बढ़ावा दिया जाएगा। साथ ही, आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे बचाने और संरक्षित रखने के उन्हें लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा।
No approved comments yet. Be the first to comment!