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‘टर्निंग द पॉट, टिलिंग द लैंड: डिग्निटी ऑफ़ लेबर इन अवर टाइम्स’ किताब की समीक्षा

प्रकाशित तिथि : १५ अप्रैल २०२६
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Turning the Pot Tilling the Land Cover

पत्रिका के ‘संसाधन और समीक्षाएँ’ अनुभाग में हम कांचा आइलैया द्वारा लिखित बच्चों की किताब टर्निंग द पॉट, टिलिंग द लैंड: डिग्निटी ऑफ़ लेबर इन अवर टाइम्स की समीक्षा साझा कर रहे हैं। यह किताब उत्पादक श्रम, सीखने और जाति व्यवस्था जैसे विषयों पर चर्चा करती है।

बच्चों की किताबों के बारे में बात करते समय ज़मीन से जुड़े सामाजिक-आर्थिक और कानूनी सम्बन्ध, जाति व्यवस्था, जेंडर और सामाजिक न्याय जैसे विषय तुरन्त हमारे ध्यान में नहीं आते। जबकि ये ऐसे मुद्दे हैं जिनसे देश भर के लाखों बच्चे जूझते हैं। उनकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी इन संघर्षों की, और कुछ मामलों में इन संघर्षों पर विजय की कहानियाँ हैं।

इन कहानियों से कई किताबें भर सकती हैं। इसके बावजूद, इन मुद्दों को आम तौर पर बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता है। यही वजह है कि ये बाल साहित्य में अपनी जगह नहीं बना पाते। सीखने की जगहों पर भी इनके बारे में ज़्यादा बात नहीं होती।

आकर्षक चित्रों से सुसज्जित किताब ‘टर्निंग द पॉट, टिलिंग द लैंड’ इन्हीं संवेदनशील मुद्दों पर केन्द्रित है। इसे कांचा आइलैया ने लिखा है, जो कि भारत के जाने-माने विद्वान, लेखक और जाति व्यवस्था के खिलाफ काम करने वाले कार्यकर्ता हैं। इसे नवयान द्वारा प्रकाशित किया गया है और गोंड जनजाति से तालुक रखने वाली कलाकार दुर्गाबाई व्याम ने इसके चित्र बनाए हैं।

किताब की प्रस्तावना में आइलैया ने केन्द्रीय शिक्षण संस्थानों में सीटों के जाति-आधारित आरक्षण के खिलाफ 2006 में मेडिकल छात्रों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन का ज़िक्र किया है।

इन विरोध प्रदर्शनों के कुछ तरीकों ने लेखक को हैरत में डाल दिया। इनमें विद्यार्थियों द्वारा सड़कों पर उतरकर सड़कों की सफाई करना, जूते पॉलिश करना वगैरह शामिल थे। उन्होंने ऐसा इन कामों की ‘नीच’ प्रकृति को दिखाने के लिए किया और यह बताने के लिए किया कि अगर विद्यार्थियों को सीट नहीं मिली तो उन्हें क्या करना पड़ेगा।

इलैय्या बताते हैं कि जाति से जुड़ी धारणाएँ और तथाकथित निचली जाति के लोगों द्वारा किए जाने वाले काम या श्रम को सम्मान न देना हमारे समाज में कितनी गहराई से पैठा हुआ है।

टर्निंग द पॉट, टिलिंग द लैंड ऐसे ढाँचे प्रस्तुत करने का प्रयास करती है जो श्रम की गरिमा को समझने में बच्चों की मदद करें। यह उन्हें यह भी समझने में मदद करती है कि उत्पादक काम को करते समय किसी व्यक्ति को अनुभव से किस तरह का ज्ञान हासिल होता है और यह ज्ञान समय के साथ कैसे विकसित हुआ। यह किताब यह भी दिखाती है कि भारत में ये प्रक्रियाएँ जेंडर और लिंग जैसी सामाजिक संरचनाओं से कैसे जुड़ी हुई हैं।

किताब का हरेक अध्याय अलग-अलग समुदायों और उनके अलग-अलग व्यवसायों के बारे में है। इसके सभी ग्यारह अध्यायों में इलैय्या बताते हैं कि किस तरह से भारत में जाति व्यवस्था ने ज़मीन की जुताई, चमड़े का काम, मिट्टी के बर्तन बनाना, खेती जैसे जीवन निर्वाह के कार्यों में लगे समुदायों को निम्न जातियों के रूप में हाशिए पर धकेल दिया है। इसके उलट, तथाकथित ‘उच्च जातियों’ में जन्मे और इज़्ज़तदार लोग अकसर अनुत्पादक व्यवसायों में लगे होते हैं।

उदाहरण के लिए, किताब का अध्याय 7 धोबियों (कपड़े धोने वाला समुदाय) की विडम्बना पर केन्द्रित है। साबुन की खोज करने वाले, कपड़े साफ करने वाले और साफ-सफाई बनाए रखने में मदद करने वाले इन समुदायों को देश के विभिन्न राज्यों में पिछड़ी/अन्य पिछड़ी जाति समूहों के तहत इन पर ‘अशुद्ध” जाति होने का ठप्पा लगा दिया गया है।

यह विचारोत्तेजक किताब अलग-अलग ‘श्रमिक जाति समूहों’ और ‘अनुत्पादक उच्च जाति के समूहों’ (जैसा कि इलैय्या उन्हें कहते हैं) की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रदान करती है। उनका कहना है कि आज के समय में भारतीय समाज की संरचना ऐसी है कि जाति व्यवस्था ज़िन्दगी के हरेक पहलू में गहराई से समाई हुई है। यह शिक्षा से लेकर अर्थशास्त्र, राजनीति से लेकर धर्म सभी की संरचना पर प्रभाव डालती है। इलैय्या चर्चा करते हैं कि किस तरह से श्रमिक जातियों को शिक्षा से वंचित रखने की वजह से इस देश में वैसी वैज्ञानिक प्रगति नहीं हो पाई जैसी होनी चाहिए थी। वे जाति व्यवस्था को चुनौती देने के महत्व पर और भोजन व श्रम की एक ऐसी अधिक न्यायसंगत प्रणाली को बढ़ावा देने पर भी ज़ोर देते हैं जो सभी व्यक्तियों के योगदान को महत्व देती हो, चाहे उनकी जाति या सामाजिक पहचान कुछ भी हो।

जो बच्चे अब तक इन मुद्दों से अनजान हैं यह किताब उन्हें इन विचारों को गहराई से समझने का एक मौका देती है। यह उन्हें अलग-अलग अध्यायों में दिए गए विचारों के बीच की कड़ियों को समझने का मौका भी देती है। यह सरल भाषा में लिखी गई है। अध्यायों के भीतर दिए गए अलग-अलग खण्डों में थोड़ी-थोड़ी लेकिन काम की जानकारियाँ और सवाल दिए गए हैं, जिनकी आगे और छान-बीन की जा सकती है। हालाँकि इसमें ऐसी बातों को उजागर किया गया है जो इतनी सरल और सीधी-साधी नहीं हैं। इन पर चर्चा के लिए शिक्षकों, अभिभावकों और सहजकर्ताओं की तरफ से उचित मार्गदर्शन और सहयोग की ज़रूरत पड़ेगी। इससे छोटे बच्चों को किताब में दी गई बातों को समझने और उन पर आलोचनात्मक ढंग से सोचने में मदद मिलेगी।

उदाहरण के लिए, किसानों पर दिए गए अध्याय को लेते हैं। इसमें दो खण्ड दिए गए हैं जिनके बारे में बच्चे आगे और खोज-बीन कर सकते हैं। इनमें से एक मौसम के मुताबिक खेती में होनेवाले बदलाव और जुताई पर केन्द्रित है। इसमें बहुत सारे सवाल दिए गए हैं जिनके ज़रिए फ़ैसिलिटेटर बच्चों को विभिन्न अवधारणाओं से परिचित करा सकते हैं। इसमें मौसम के मुताबिक खेती में होनेवाले बदलाव और जलवायु परिवर्तन, खेती से जुड़े राजनीतिक पहलू जिसमें जाति और जाति पर मालिकाना हक जैसे एक या एक से ज़्यादा विषय, नकदी फसलों पर ध्यान, एक से ज़्यादा फसल उगाने की ज़रूरत जैसी बातें शामिल हैं।

हालाँकि इन पर गहरी चर्चा शुरू करने से पहले फ़ैसिलिटेटर को बच्चों को इनकी पृष्ठभूमि के बारे में सही से जानकारी देनी होगी। बच्चे इन चर्चाओं में सार्थक ढंग से शामिल हो सकें इसके लिए सहजकर्ता को उन्हें अन्य संसाधनों जैसे अतिरिक्त किताबें, वीडियो, लेख वगैरह उपलब्ध कराने होंगे। साथ ही, उसे बच्चों को सीखने की अनुभव पर आधारित प्रक्रियाओं में भी शामिल करना होगा। हरेक अध्याय के साथ दिए गए खूबसूरत चित्र भी जाति, श्रम और जेंडर आदि के आपसी सम्बन्धों को समझने में मदद करते हैं। उदाहरण के लिए, कुम्हारों पर आधारित अध्याय में दिए गए कुछ चित्र मिट्टी के बर्तन बनाने की अलग-अलग प्रक्रियाओं में लगे हुए पुरुषों और महिलाओं को दिखाते हैं। सहजकर्ता इस अध्याय के माध्यम से आगे के अध्ययन के लिए लैंगिक भूमिकाओं पर ध्यान केन्द्रित करने का फैसला ले सकता है।

विद्यार्थी आगे की खोज के तौर पर कला के विभिन्न रूपों को समझने की कोशिश भी कर सकते हैं। वे गोंड जनजातियों, देशभर में उनके विस्तार के बारे में और जानकारी एकत्र कर सकते हैं। साथ ही, वे गोंडी कला के रूपों के विकास और उद्विकास, उनके अधिकतर चित्रों में प्रकृति पर दिए गए ध्यान, चित्रों में डैश और डॉट्स के इस्तेमाल के अनूठेपन वगैरह को भी समझने की कोशिश कर सकते हैं।

इन विचारों को बच्चों के समक्ष उचित मार्गदर्शन और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करना और उन्हें सफाई, बागवानी, मिट्टी की चीज़ें बनाने के कामों में शामिल होने और उन्हें अनुभव करने व भोजन, श्रम और जेंडर के बीच के आपसी सम्बन्धों पर आलोचनात्मक ढंग से चर्चा करने और इन पर सवाल उठाने के मौके देना भी ज़रूरी है। इससे वे इस बात की बेहतर समझ हासिल कर पाएँगे कि किस तरह से देश में दमन के तरीके जीवन के हरेक पहलू में व्याप्त हैं। इससे हमारे बच्चों को यह समझने में भी मदद मिल सकती है कि समाज में न्याय को बढ़ावा देने के लिए एक ऐसे समग्र दृष्टिकोण की ज़रूरत होती है, जो इन परस्पर जुड़ी हुई असमानताओं को दूर करने की कोशिश करे।

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सुप्रिया मेनन
सुप्रिया आर मेनन विप्रो फाउंडेशन में प्रोग्राम मैनेजर के रूप में काम करती हैं।