संगीत की शिक्षा के लिए एक आन्दोलन का निर्माण
बारहवीं कक्षा में 52% अंक लाने के बाद भी कॉलेज में दाखिला न मिलने से अनुराग हून की ज़िंदगी बदल गई। यह उन्हें मंज़िल वेलफेयर सोसाइटी (एक वैकल्पिक शिक्षण संस्थान) ले गया, जहाँ उन्होंने संगीत को न सिर्फ़ एक कला के रूप में, बल्कि जीवन जीने के एक तरीके के रूप में भी जाना। संगीत ही वह आईना बना जिसने उन्हें अपनी आवाज़ खोजने, आत्मविश्वास बढ़ाने और मंज़िल मिस्टिक्स के लिए एक नया दृष्टिकोण गढ़ने में मदद की—एक ऐसा आंदोलन जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत के हर बच्चे को हर हफ़्ते एक घंटे संगीत की शिक्षा मिले।

फोटो साभार: मंज़िल मिस्टिक्स फाउंडेशन
जब मैंने अपनी बारहवीं कक्षा की परीक्षा में 52% अंक हासिल किए, तो स्कूल के बाद की ज़िन्दगी अनिश्चित-सी लगने लगी। कॉलेज के दरवाज़े बन्द थे; कोई भी मुझे दाखिला देने को तैयार नहीं था। मैं खुद को लेकर सन्देह और हताशा से भरा हुआ था, मेरा भविष्य कैसा होने वाला है इसे लेकर मैं असमंजस में था।
इसी दौरान मुझे दिल्ली की मंज़िल वेलफ़ेयर सोसाइटी के बारे में पता चला, जिसकी स्थापना आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र रवि गुलाटी ने की है। पारम्परिक संस्थानों के उलट, मंज़िल ने मुझे मेरे अंकों से नहीं आँका। उन्होंने जो पहला सवाल पूछा, वह था, “तुम क्या सीखना चाहते हो?” इस सवाल ने सब कुछ बदल दिया।
मंज़िल में, मैंने खुद को संगीत की ओर आकर्षित पाया। हालाँकि, मैंने जो खोजा वह सुरों और लय से कहीं बढ़कर था। संगीत ने मुझे धैर्य, अनुशासन और गहराई से सुनना सिखाया। इसने मुझे मिलकर काम करना और चिन्तन करना सिखाया। इसने मुझे दिखाया कि मैं कौन हूँ और क्या बन सकता हूँ।
संगीत के माध्यम से, मैंने अँग्रेज़ी, कम्प्यूटर और लोगों के सामने भाषण देना सीखने का आत्मविश्वास हासिल किया। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि मैंने यह यकीन करना शुरू कर दिया कि मुझमें एक ऐसी प्रतिभा है जो निखारने लायक है। इस यकीन ने मुझे असाधारण अवसर प्रदान किए। मुझे अमरीका में पढ़ने के लिए 100% छात्रवृत्ति मिली, जहाँ मैंने एडमंड्स कम्युनिटी कॉलेज, वाशिंगटन से मार्केटिंग और सेल्स की पढ़ाई की। बाद में, मैंने इग्नू से सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की।
संगीत ने मुझे न सिर्फ़ दिशा दी है, बल्कि ज़िंदगी को समझने का एक ज़रिया भी दिया है। मेरे लिए, संगीत कभी सिर्फ़ एक जुनून नहीं रहा। यह मेरा दिशासूचक यंत्र बन गया है।
इसने मुझे न सिर्फ आवाज़ दी, बल्कि खुद को व्यक्त करने की ताकत भी दी। इसने खुद को अभिव्यक्त करने और अपनी पहचान बनाने में मेरी मदद की है। इसने मुझे दूसरों के साथ मिलकर काम करना भी सिखाया है। इस प्रक्रिया में, मैंने सीखा कि जब हम सचमुच एक-दूसरे की बात ध्यान से सुनते हैं, तभी हमारे बीच सामंजस्य पैदा होता है।

फोटो साभार: मंज़िल मिस्टिक्स फ़ाउंडेशन
इस सफ़र ने मुझे मुश्किलों का सामना करना भी सिखाया। हर छूटे हुए सुर ने मुझे लगातार प्रयास करने की सीख दी। कबीर दास और गाँधी के गीतों ने मुझे करुणा और सादगी के मूल्यों से जोड़ा है। संगीत ने मुझे सिर्फ़ एक करियर ही नहीं दिया, इसने मुझे एक उद्देश्य, अपनेपन का एहसास और दूसरों की भलाई के लिए कुछ करने का रास्ता भी सुझाया है।
कबीर और गाँधी के गीत गाने वाले युवा स्वप्नदर्शियों के एक समूह के रूप में शुरू हुए इस सिलसिले ने जल्द ही कहीं अधिक गहन रूप ले लिया। अपने साथियों के साथ, मैंने मंज़िल मिस्टिक्स की सह-स्थापना की। हमने महसूस किया कि हमारा संगीत केवल प्रदर्शन नहीं था, उससे बदलाव आ रहा था। 2017 में, हमने मंज़िल मिस्टिक्स फ़ाउंडेशन को इस दृष्टिकोण के साथ पंजीकृत किया कि भारत में हर बच्चे को हर हफ़्ते कम से कम एक घण्टा संगीत की शिक्षा मिले।
आज, लर्निंग थ्रू म्यूज़िक (LTM) कार्यक्रम के माध्यम से, हम सरकारी और निम्न आय वर्ग वाले स्कूलों के हज़ारों बच्चों के साथ काम करते हैं। यहाँ, हम समानुभूति, आत्मविश्वास और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देने के लिए संगीत का उपयोग करते हैं। हमारी संगीत फ़ेलोशिप के तहत वंचित पृष्ठभूमि के युवा संगीतकारों को शिक्षक बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। इससे भारत की मौखिक परम्पराओं को जीवित रखते हुए सम्मान के साथ रोज़गार अर्जित करने को प्रोत्साहन देने में मदद मिलती है।
युवाओं के साथ काम करना मेरे इस सफर के सबसे फलदायी और ज्ञानवर्धक पहलुओं में से एक रहा है। मैंने सीखा है कि स्कूल की पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद का समय या तो दुविधा का समय हो सकता है या फिर परिवर्तन का। कई युवा, खास कर हाशिए की पृष्ठभूमियों के, स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद गहरी अनिश्चितता का सामना करते हैं। उनमें अकसर करियर के सन्दर्भ में मार्गदर्शन और आत्मविश्वास दोनों का अभाव होता है। मंज़िल मिस्टिक्स में, हमने देखा है कि किस तरह से संगीत असमंजस की स्थिति और स्पष्टता के बीच एक पुल बन जाता है।

फोटो साभार: मंज़िल मिस्टिक्स फ़ाउंडेशन
उदाहरण के लिए, राघवेन्द्र को ही लीजिए। संगीत के प्रति उनका जुनून हमेशा से ही था। हालाँकि, अपने परिवार की महज़ 15,000 रुपए की आय और छह लाख रुपए के कर्ज़ की वजह से वह इसे लेकर असमंजस की स्थिति में था कि वह इसे अपना करियर बना भी पाएगा या नहीं। मंज़िल मिस्टिक्स की फ़ेलोशिप में शामिल होकर, उसने शिक्षण, ध्वनि संचालन और कलाकार प्रबन्धन के क्षेत्र में काम किया। नए आत्मविश्वास के साथ, राघवेन्द्र ने दुनिया की सबसे बड़ी संगीत वितरण कम्पनियों में से एक, ट्यूनकोर (TuneCore) में आवेदन किया। आज, एक कंटेंट मैनेजर के रूप में, वह 50,000 रुपए प्रति माह कमाता है। अनिश्चितता से सफलता तक का उसका यह सफ़र सैकड़ों युवा संगीतकारों को प्रेरित कर रहा है, जो अब, उसकी तरह, मंज़िल मिस्टिक्स में शिक्षा और सामुदायिक सहयोग के माध्यम से ऊँचे सपने देखने का साहस कर रहे हैं।
फिर एक युवा लड़की अलकामा है, जो अनिच्छा से हमारे Gully Choir बैच में शामिल हुई। समय के साथ, उसने अपने समाज, अपने सफ़र के बारे में गाने लिखने शुरू किए और अपने व्यक्तिगत संघर्षों को ज़बरदस्त रैप में बदल डाला। आज, वह सोशल मीडिया पर एक लोकप्रिय रैपर है, जो अपनी आवाज़ का इस्तेमाल रूढ़िवादिता को चुनौती देने और दूसरी युवतियों को उनकी सच्चाई बयाँ करने के लिए प्रेरित करने के लिए करती हैं।
इन यात्राओं के दौरान, मुझे एहसास हुआ है कि हमारी भूमिका युवाओं को ‘ठीक’ करना नहीं, बल्कि उन पर भरोसा करना, उन्हें खोज-बीन करने, गलती करने और आगे बढ़ने के लिए सुरक्षित मौके प्रदान करना है। जब युवाओं की बात सुनी जाती है और उन्हें महत्व दिया जाता है, तो अक्सर वे ऐसे रास्ते बना लेते हैं, जिनकी कल्पना उन्होंने खुद भी नहीं की होती।
मंज़िल मिस्टिक्स में, हम युवाओं को लाभार्थी के तौर पर नहीं, बल्कि सह-निर्माता के तौर पर देखते हैं। हमारा लक्ष्य एक ऐसे समुदाय को तैयार करना है, जो व्यक्तिगत और सामूहिक सद्भाव दोनों को महत्व देता हो। संगीत की ताकत केवल सुर में ही नहीं, बल्कि सुनने में भी निहित है, और युवाओं के साथ हमारा काम इसी का प्रतीक है।
स्कूल के बाद जो मुझे एक बन्द रास्ता जैसा लगता था वही मेरे लिए लय, सुर और अर्थ का एक खुला मैदान बन गया। मेरी कहानी, और उन सैकड़ों युवाओं की कहानी जिनके साथ मैं अब काम करता हूँ, दिखाती है कि किस्मत अंकों से नहीं, बल्कि मौकों और रिश्तों से तय होती है।
स्कूल की पढ़ाई खत्म हो जाने के बाद के दौर में युवाओं के साथ काम करना खुशी और चुनौतियाँ दोनों लेकर आता है। कई युवाओं को आर्थिक अस्थिरता, सीमित एक्सपोज़र और ‘जल्दी सफल होने’ के सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ता है। उनके लिए दिशा या उम्मीद खो देना आसान होता है। मेन्टरस्, मार्गदर्शन और मानसिक स्वास्थ्य सहायता के अभाव में वे अक्सर महत्वाकांक्षा और व्यग्रता के बीच उलझ जाते हैं।
लेकिन ये चुनौतियाँ इस बात की भी पुष्टि करती हैं कि हमारा काम क्यों महत्वपूर्ण है। सुरक्षित, रचनात्मक और मूल्य-आधारित स्थान बनाना, जहाँ युवा भावनात्मक और कलात्मक रूप से विकसित हो सकें, वैकल्पिक नहीं, बल्कि आवश्यक है। हमारा सबसे बड़ा काम ऐसे परिवेश का निर्माण करना है जो उन्हें जोखिम उठाने, खुद को खोजने और सफलता के मायने को नए सिरे से परिभाषित करने का अवसर प्रदान करे।
मंजिल मिस्टिक्स फाउंडेशन के माध्यम से, मैं इस दृष्टिकोण की दिशा में काम करना जारी रख रहा हूँ कि भारत का प्रत्येक युवा, चाहे उसकी पृष्ठभूमि कुछ भी हो, संगीत में वह सब पा सके जो मुझे कभी मिला था: खुद की समझ, अपनेपन की भावना और एक ऐसा गीत जो जीवन को अर्थ देता है।



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