बाल साहित्य में कठिन विषय: ज़मीनी अनुभवों से मिली सीख
जाति और लिंग जैसे मुश्किल विषयों पर लिखी किताबें बच्चों को सोचने और सवाल करने में मदद करती हैं । यह लेख छोटे बच्चों को संवेदनशील तरीके से बदलाव लाने वाली बातचीत में शामिल करने के लिए ज़मीनी अनुभवों, चुनौतियों और रणनीतियों को साझा करता है।

खोने के अनुभव, जाति और जेंडर जैसे कठिन विषयों पर लिखी गई किताबें बच्चों को इन विषयों पर सोचने-विचारने और सवाल पूछने में मदद करती हैं। यह लेख छोटे बच्चों को इन विषयों पर उनके नज़रिए में बदलाव लाने वाली बातचीत में संवेदनशीलता के साथ शामिल करने से जुड़े ज़मीनी अनुभवों, चुनौतियों और तरीकों को साझा करता है।
बच्चों के साथ किताबों के सत्र कभी भी पूरी तरह खत्म नहीं होते। वे अपने पीछे कुछ अनुभव छोड़ जाते हैं। जैसे, बच्चों द्वारा कही गई, न कही गई, अवलोकन की गई या चित्रों में व्यक्त की गई अनुभवों की कड़ियाँ। ये कड़ियाँ तब और मज़बूत हो जाती हैं जब बच्चों के साथ साझा की गई किताबें ऐसे विषयों पर होती हैं जिन पर अक्सर चर्चा नहीं होती, जैसे कि खोने का अनुभव, जेंडर, अकेलापन, डर और नफरत।
बच्चों के साथ कई वर्षों तक कहानी के सत्र आयोजित करने के बाद भी, संवेदनशील विषयों पर आधारित किताबें चुनना हममें से कुछ लोगों के लिए अभी भी एक सोचा-समझा प्रयास होता है। क्या यह किताब बच्चों पर भावनात्मक रूप से बहुत ज़्यादा असर डाल देगी? क्या मैं किताब के विचार और भावना के साथ न्याय कर पाऊँगी? क्या इस विषय को लेकर मेरी चिन्ताएँ या डर मुझे आगे बढ़ने से रोक रहे हैं? ऐसे सवाल मन में आते रहते हैं। हालाँकि हम जवाब पक्के तौर पर नहीं दे सकते, लेकिन कुछ विचार ऐसे ही सवालों से जूझ रहे किसी व्यक्ति के लिए मददगार साबित हो सकते हैं।
कोई विषय तय करना
जब हम ध्यान से सुनते हैं तभी अक्सर विषय मिल पाता हैं। जो विषय चुना जाता है वह बच्चों के साथ वक्त बिताने, उनसे थोड़ी बातचीत करने और काफी लम्बे समय तक उनकी बात सुनने के बाद ही उभरकर सामने आता है। वह विषय अक्सर हमारी पसन्द का नहीं होता, बल्कि बच्चों के साथ तालमेल और जुड़ाव के ज़रिए हम उस तक पहुँचते हैं। विषय कक्षा में बच्चों के आपसी व्यवहार और बातचीत या चित्रों और किस्सों के ज़रिए उनके द्वारा साझा की गई व्यक्तिगत कहानियों से उभर सकता है। दिलचस्प घटनाओं पर चर्चा से विषय सामने आते हैं।

फोटो साभार : पालकनीति खेलघर
हालाँकि, यह याद रखना मददगार हो सकता है कि अगर किताब पढ़ने का मकसद किसी के व्यवहार में बदलाव लाना हो या कोई खास नतीजा निकालना हो, जैसे, ‘किसी को उसका गम भुलाने में मदद करना’, तो हो सकता है यह हमेशा कारगर न हो। किसी विषय को चुनने की असल वजह महज़ यही हो सकती है कि बच्चे उस पर बात करना चाहते हों।
मानसी याद करती हैं कि 12 साल के कुछ बच्चों के बीच इस बात पर बहस छिड़ने, कि क्या हर देश के पास परमाणु शस्त्रागार होना चाहिए, के बाद उन्होंने सडाको और कागज़ के पक्षी किताब पढ़नी शुरू की थी। इसी तरह, चीचीबाबा के भाई को पढ़ना तब शुरू हुआ जब कक्षा की चर्चाएँ अकसर ‘हम’ और ‘वे’ के इर्द-गिर्द घूमने लगीं।
किताबें चुनना — या उन्हें आपको ढूँढने देना
हमारा यह अनुभव है कि किताबें हमें ढूँढ़ लेती हैं। किसी दोस्त या मार्गदर्शक की सलाह से, जिनकी बच्चों की किताबों की पसन्द पर हमें भरोसा हो, किसी लेख में दिए गए एक फ़ुटनोट से, या यहाँ तक कि ऑनलाइन ई-कॉमर्स साइट्स की सिफ़ारिश से (जो कभी-कभी बिलकुल सटीक बैठती हैं!)। ऐसी किताबें जो जवाब पेश करने की जल्दबाज़ी में नहीं होतीं, जो ऐसे सवाल पूछती हैं जिनका जवाब देने के लिए हम तैयार नहीं होते, काफी कारगर साबित होती हैं। माइकल रोसेन की सैड बुक जैसी किताबें पढ़नेवाले को ठहरकर सोचने, महसूस करने और यहाँ तक कि असहज होने के मौके भी देती हैं। ऐसी किताबें जो किसी किरदार को तुरन्त हमारी उम्मीदों के मुताबिक ढालने की जल्दबाज़ी नहीं दिखातीं, जैसे ग्लेन रिंगट्वेड की क्राई हार्ट बट नेवर ब्रेक, मुश्किल चीज़ों को अलग नज़रिए से देखने के मौके देती हैं। जब कोई नया विषय सामने आता है तो विविध, संवेदनशील विषयों पर किताबों का संग्रह बहुत उपयोगी साबित होता है।

फोटो साभार : सजग
यह देखकर कि कक्षा में अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए छह साल के बच्चों में ‘हम’ और ‘वे’ की भावना थी, सजिता को सागर कोलवणकर की किताब माई नेम इज़ गुलाब याद आई। यह एक छोटी बच्ची की कहानी है जिसके पिता गटर की सफाई करते हैं और इस वजह से स्कूल में उसके साथ भेदभाव भरा सलूक किया जाता है। जब उसने अपने विद्यार्थियों को यह किताब पढ़कर सुनाई, तो उन पर इसका बहुत गहरा असर हुआ। एक ऐसे व्यक्ति की कहानी के ज़रिए, जिसने भेदभाव का सामना किया और जिसने मज़बूती से इसका विरोध किया, बच्चों को यह बात सिर्फ हिदायत देने की तुलना में कहीं ज़्यादा बेहतर तरीके से समझ आ सकी कि – पृष्ठभूमि मायने नहीं रखती और हम किसी के साथ भेदभाव भरा व्यवहार करने से बच सकते हैं।
पढ़ने से पहले
किसी किताब को बच्चों तक ले जाने से पहले, यह समझना ज़रूरी है कि हम उसे कैसे देखते हैं। क्या आप उस विषय पर ईमानदारी से बात कर सकते हैं? क्या आप किताब के बारे में सवाल पूछने में सहज महसूस करते हैं? क्या आपको यह कहना ठीक लगता है कि आपको जवाब नहीं पता? क्या आप इस पर बच्चों की प्रतिक्रियाओं के जवाब दे सकेंगे? अगर आप इसे पढ़ेंगे तो क्या वे आहत होंगे? इससे भी ज़रूरी बात यह है कि पढ़ना शुरू करने से पहले बेचैन महसूस करना ठीक है।
एक विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि से होने के नाते सजिता इस बात को लेकर पशोपेश में थी कि जाति के विषय पर बातचीत शुरू करने के लिए वह सही व्यक्ति है या नहीं। लेकिन इस विषय पर समानुभूति के साथ और इस समझ के साथ बात किया जाना ज़रूरी था कि विशेषाधिकार या तो ‘मिल’ जाते हैं या फिर ‘अर्जित’ किए जा सकते हैं। सजिता ने इस किताब के साथ ‘रीड अलाउड’ करने का फैसला इस स्पष्ट उद्देश्य के साथ किया कि पढ़ने के दौरान किताब में मौजूद किरदारों के व्यवहार और कहानी के अन्त पर खास तौर पर ध्यान दिया जाएगा।

फोटो साभार : पालकनीति खेलघर
हमने एक और उपयोगी तरीका सीखा है, वह है किताब में हमारे मन में चल रहे विचारों के निशान छोड़ना। जैसे-जैसे हम पढ़ते हैं हमारी अन्तरात्मा की आवाज़ हमसे बात करती है। यह अक्सर ऐसे अनुभवों और सम्बन्धों को सामने लाती है जो किताब को लेकर हमारी समझ और उससे हमारा जुड़ाव बढ़ाते हैं। किताबों के पन्नों पर चिपकाए गए छोटे-छोटे नोट्स से किताब को पढ़ते समय हमारे मन में आए इन विचारों को ध्यान में रखने में मदद मिलती है। इससे अक्सर पढ़ना एक व्यक्तिगत अनुभव बन जाता है। ये किताब के साथ हमारे जुड़ाव को भी दर्शाते हैं।
किताब पढ़ते समय
किसी किताब को पढ़ना हमेशा सिर्फ किताब से कहीं बढ़कर होता है। यह एक साझा लम्हा होता है, जिसमें पढ़नेवाला और सुननेवाले दोनों ही पढ़ने में कुछ न कुछ जोड़ते हैं। ‘शेयर्ड रीडिंग कैसे करें’’ या ‘रीड अलाउड कैसे करें’ जैसे किसी तयशुदा दिशा-निर्देश का पालन करने के जाल में फँसना आकर्षक लग सकता है, जो बच्चे की भागीदारी से ज़्यादा पढ़ने के तकनीकी पहलुओं पर केन्द्रित होता है। हालाँकि, अनुभव यह बताता है कि किताबों को बच्चों के साथ साझा करना सबसे कारगर तब होता है जब पाठक की बच्चों के साथ किताब साझा करने में सच्ची दिलचस्पी होती है। विषय से जुड़े व्यक्तिगत अनुभव साझा करना बातचीत शुरू करने और बच्चों की झिझक तोड़ने का एक प्रभावी तरीका है। पाठक द्वारा अपनी नाज़ुक भावनाओं को साझा करने से बच्चे भी उस संवेदनशील विषय के दायरे में प्रवेश करने में सुरक्षित महसूस कर पाते हैं।
यह बच्चों की प्रतिक्रियाओं को अलग अलग तरीकों से बहार लाने में मदद करता है कभी हम चित्र बनाते हैं। कभी हम बात करते हैं। कभी हम नई कहानियाँ गढ़ते हैं। कभी हम अभिनय करते हैं। अगर हम कुछ न करने का भी फैसला करें, तब भी कहानी हमारे भीतर चुपचाप अपना काम करती रहती है।
किताब पढ़ने के बाद एक नियोजित गतिविधि करना उपयोगी होता है। हालाँकि, पढ़ने (की प्रक्रिया) से उत्पन्न होने वाले विचार/प्रतिक्रिया प्रति हमें लचीला और खुला होना चाहिए। बच्चे अक्सर अलग-अलग तरीकों से प्रतिक्रिया देते हैं, कुछ दिखाई देते हैं, कुछ नहीं। इसलिए, बच्चों को हमेशा एक ही तरह की प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर करना सभी बच्चों के लिए कारगर नहीं हो सकता। यहाँ तक कि पहले से सोची-समझी गतिविधियों के साथ भी, बच्चों को हमेशा यह आज़ादी होती है कि वे उसमें भाग न लें और अभिव्यक्ति का अपना तरीका चुनें।
कठिन विषयों को क्यों शामिल करें?
हमारी मौजूदा शिक्षा प्रणाली अक्सर जाति, जेंडर और श्रम की गरिमा जैसे जटिल सामाजिक विषयों को स्कूली शिक्षा में बहुत बाद में शामिल करती है। हालाँकि, संवेदनशीलता, खुले विचार रखने की क्षमता और नैतिकता से जुड़े सवालों पर सोच सकने जैसे गुण बच्चों में प्रारंभिक वर्षों में ही विकसित होने लगते हैं। अगर हम समता से जुड़े मुद्दों के प्रति जागरूक एक सामाजिक रूप से जागरूक पीढ़ी का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें बच्चों के विकास के शुरुआती सालों से ही उनसे इन विषयों पर बातचीत करनी चाहिए।
कमला भसीन द्वारा लिखी गई और मुकुन्द टकसाले द्वारा अनुवाद की गई किताब मुलींनाही हवी आझादी’ (लड़कियाँ भी आज़ादी चाहती हैं) में लिखा था, “झाडावर चढण्याची आझादी” (पेड़ों पर चढ़ने की आज़ादी)। इसे पढ़ते समय, इस वाक्य पर कुछ लड़कों ने टिप्पणी की, “उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। उन्हें नहीं पता कि पेड़ पर कैसे चढ़ा जाता है। वे सिर्फ रोएँगी।” एक लड़के ने स्वीकार किया, “मुझे भी पेड़ों पर चढ़ने से डर लगता है। लेकिन मेरी छोटी बहन को नहीं लगता।” और फिर एक लड़की ने कुछ ऐसा कहा जिसने बातचीत का रुख बदल दिया – “अगर हमें नहीं पता, तो क्या तुम हमारी मदद नहीं कर सकते?” इस सवाल ने लड़कों को रुककर सोचने पर मजबूर कर दिया। यहाँ पर बातचीत को रोकना बिल्कुल सहज और स्वाभाविक लगा।
खुशकिस्मती से, आज मुस्कान, तूलिका और प्रथम जैसे बच्चों के कई प्रकाशक जानबूझकर ऐसी किताबें लिख रहे हैं जो इन कठिन सच्चाइयों पर ईमानदारी और सावधानी से बात करती हैं। जो प्रस्तुत किया जा रहा है और जैसे प्रस्तुत किया जा रहा है – यह दोनों ही महत्वपूर्ण है । इन कहानियों को ऐसे प्रैक्टिशनर द्वारा प्रस्तुत किया जाना चाहिए जो इन विषयों या चुनौतियों की जानकारी रखते हों और इन्हें लेकर अपने नज़रिए और पूर्वाग्रहों से अवगत हों। यही सजग जुड़ाव किसी किताब को कहानी से सोचने-विचारने और परिवर्तन के एक मंच में बदल देता है।
हमें ऐसी कहानियों को अपनी कक्षाओं में शामिल करना चाहिए — बच्चों पर जवाब थोपने के लिए नहीं, बल्कि ऐसे सवाल उठाने के लिए जो लम्बे तक बने रहें और बढ़ते रहें।



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