पुस्तकालय के संग्रह में विविध किताबों को शामिल करने के कुछ प्रयास — चुनौतियाँ और सम्भावनाएँ
यह लेख पुस्तकालयों में विविध पुस्तकों को शामिल करने की चुनौतियों और संभावनाओं पर केंद्रित है। इसमें लाइब्रेरियन की भूमिका, अभिभावकों की प्रतिक्रियाओं और बच्चों के साथ संवाद की अहमियत पर बात की गई है।

पुस्तकालय एक ऐसा स्थान होता है जहाँ विविध पुस्तकों से जोड़ने और जुड़ने के प्रयास करना सम्भव होता है। पुस्तकालय में बच्चों को किताबों से जोड़ने में लाइब्रेरियन की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। हम कौन-सी किताबों का चयन कर रहे हैं; किन्हें अपने संग्रह से बाहर रख रहे हैं और क्यों; क्या हमारे संग्रह में विविध किताबें हैं; किताबों को बच्चों के साथ किस तरह इस्तेमाल कर रहे हैं; बच्चों को अपने विचार रखने का खुला मंच मिल रहा है या नहीं; इन्हीं सब सवालों के आधार पर बच्चों का किताबों से जुड़ाव सम्भव हो पाता है। लाइब्रेरी स्टाफ की भूमिका के बारे में निकॉल ओवर्टन कहती हैं, “लाइब्रेरी स्टाफ को हमेशा एक ऐसा माहौल बनाना चाहिए, जिसमें वयस्क और बच्चे वैश्विक समझ हासिल कर सकें और विविध पृष्ठभूमि के अन्य लोगों के प्रति सम्मान महसूस कर सकें। अगर बच्चों को खास तौर पर दुनिया भर के अन्य लोगों के जीवन और संस्कृतियों से परिचित कराया जाए, तो उन्हें विविधतापूर्ण दुनिया में खुद को ढालने और काम करने का तरीका सीखने का मौका मिलेगा।” यह बात मैंने तब समझी जब इसे मैंने लाइब्रेरी एजुकेटर कोर्स करते समय खुद महसूस किया और जाना कि लाइब्रेरियन (व्यक्ति / पाठक) जीवन में कितनी अहम भूमिका निभाते हैं।
इस कोर्स के दौरान मैंने उन किताबों को पढ़ना शुरू किया, जिन्होंने मेरी सोच को विस्तार दिया, सवाल खड़े किए और मुझे कहानी को अलग नज़रिए से समझने का मौका दिया। ऐसी कुछ किताबें, जिन्होंने मुझे प्रभावित किया, उन्हें मैंने बच्चों और अपने अन्य साथियों के साथ साझा किया। आप इसी से जुड़े हुए मेरे अनुभवों को इस लेख में पढ़ेंगे।
किरदार के शुद्धिकरण का आग्रह महाश्वेता देवी की किताब दबंग गाय हमारी में कहानी की दबंग गाय ‘न्यदोश’ को खाने का चस्का लगता है और ज़बर्दस्त भूख के कारण वह बहुत सारी चीज़ें खा जाती है, जैसे, धोती, किताबें, बनियान, मछली, केकड़ा, झींगा आदि। इसका चित्रांकन रुचि शाह ने किया है। कहानी के चित्र हास्यास्पद विवरण को और भी मज़ेदार बनाते हैं। पर जब मैंने यह कहानी बच्चों के साथ एक सत्र में साझा की तो अनुभव कुछ और रहे। इस सत्र में सात-आठ बच्चे थे और पीछे दो अभिभावक भी बैठे थे। कहानी को बच्चों ने मज़े से सुना, परन्तु एक अभिभावक ने सत्र के बाद कहानी पर अनेक सवाल खड़े किए। जैसे, गाय के चित्रांकन के लिए मछली, प्याज़, खाली बोतलों का इस्तेमाल क्यों किया गया है? उनका कहना था कि हमारी संस्कृति में गाय को माता समान माना गया है और उसकी पूजा होती है, यहाँ गाय किस तरह पेश आ रही है। उनके नज़रिए में गाय को वैसे ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए, उसकी जैसी छवि राजनैतिक तंत्र ने बनाई है। ऐसे सवालों में अभिभावकों के पूर्वाग्रह छुपे होते हैं और इनका जवाब एक चर्चा में नहीं दिया जा सकता। इसके लिए धीरे-धीरे उनके बच्चों के साथ जुड़कर काम करना होगा, उनका परिचय विविध कहानियों से कराना होगा क्योंकि विविधतापूर्ण किताबें रूढ़िवादिता और पूर्वाग्रह को दूर करने में, सहानुभूति को बढ़ावा देने में और कल्पना का विस्तार करने में मदद करती हैं। यह एक लम्बी यात्रा है, जिससे बदलाव तो आएगा, पर अपनी गति से। बच्चों के साथ ही यह काम सम्भव है!

किताबों को लेबल करना
इता मेहरोत्रा की किताब शाहीन बाग एक ऐसे ऐतिहासिक क्षण को दर्शाती है, जब भारत भर में मुस्लिम महिलाएँ साहस के साथ और अनोखे ढंग से विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुईं। इस किताब के चित्र उस ऐतिहासिक दृश्य की पुनः याद दिलाते हैं और यह किताब हक के लिए लड़ने की प्रेरणा देती है। इतिहास में पढ़ाए जा रहे पाठों के सन्दर्भ में और समकालीन सामाजिक सन्दर्भों को समझने के लिए यह एक उपयुक्त किताब है। इसी वजह से बुकवॉर्म संस्था — जिसके साथ मैं काम कर रही थी — ने इसे एक प्रसिद्ध स्कूल की लाइब्रेरी की किताबों की सूची में जोड़ा और इसे प्रदर्शित किया। रीडिंग प्रोग्राम के तहत बच्चों के साथ इस सूची को साझा किया गया। वे इसमें से स्वयं किताबें चुनकर पढ़ सकते थे।
जब बच्चों ने खुद चुनकर किताबों को पढ़ना शुरू किया, खास कर शाहीन बाग जैसी किताब, तो अभिभावकों की तरफ से आक्रोश आया। एक अभिभावक का कहना था, “यह किताब राष्ट्रविरोधी है, साम्प्रदायिक है। नाबालिग बच्चों का मन बहुत कोमल होता है और उन्हें ऐसे विवादास्पद विषयों के सम्पर्क में नहीं लाना चाहिए। इस उम्र में बच्चे सही विकल्प चुनने और सही सामग्री को फ़िल्टर करने के लिए पर्याप्त परिपक्व नहीं होते हैं।”
अभिभावक की इस टिप्पणी के मद्देनज़र मैं कहना चाहूँगी कि स्कूलों में किसी एक विचारधारा से आने वाले परिवारों के ही बच्चे नहीं आते हैं, इसलिए यह और भी महत्वपूर्ण बन जाता है कि हमारे संग्रह में विविध किताबें हो। हमें किताबों के माध्यम से बच्चों को वैश्विक समझ हासिल करने के और विविध पृष्ठभूमियों के लोगों के प्रति सम्मान महसूस करने के अवसर प्रदान करने चाहिए। यह तभी हो पाएगा जब विविध किताबों के संग्रह को सभी तक पहुँचाने में और चर्चा को आगे बढ़ाए रखने में लाइब्रेरियन का विश्वास और तैयारी हो।
सन्तुलित तरीके से किताबों का चुनाव सामुदायिक लाइब्रेरी में कार्य कर रहे साथियों के साथ कार्यशाला में दो किताबों को पढ़ा गया और इन पर चर्चा की गई। पहली किताब थी विद्रोह की छप-छप। इसकी लेखिका रिनचिन हैं और इसके चित्र लोकेश खोड़के ने बनाए हैं। इसे सभी ने मिलकर पढ़ा और अपने आप भी पढ़ा। किताब में बच्चों द्वारा अपने हक की आवाज़ उठाने की सभी ने प्रशंसा की। परन्तु जब इस किताब को बच्चों तक ले जाने की बात आई तो साथियों को लगा शायद हमारी इस पर तैयारी नहीं है। ये सभी साथी सरकारी विद्यालय में सहायक शिक्षक के रूप में और शाम को सामुदायिक लाइब्रेरियन के रूप में काम करते हैं। वे समझ नहीं पा रहे थे कि बच्चों के साथ ऐसी किताब कैसे खोलें जिसमें बच्चे समुदाय और शिक्षिका का सामना कर रहे हैं, अपने सम्मान और हक के लिए लड़ रहे हैं। उन्हें अभी इस किताब को संग्रह में जोड़ना उचित नहीं लगा। उनका मानना था कि किताब को उपयुक्त मानते हुए जोड़ भी देंगे तो शायद किताब के साथ न्याय नहीं होगा, इसलिए सभी ने थोड़े समय की माँग की।
ऐसी ही एक बेहतरीन किताब बस्ते में सवाल है, जिसे लोकेश मालती प्रकाश ने लिखा है और जिसके चित्र बनाए हैं कनक शशि ने। इसमें शहर के और दूसरे शहरों के बच्चे, चिड़ियाँ, बिल्लियाँ, मधुमक्खियाँ बीमार सवाल के इलाज के लिए और सवाल ढूँढ रहे हैं। जब हमने मिलकर पहली बार इसे पढ़ा तो कुछ साथियों को यह समझ नहीं आया कि किताब में क्या कहा गया है। कुछ साथियों को लगा यह किताब बहुत सवाल उठाने की बात कर रही है, क्या बच्चे इसे समझ पाएँगे। ऐसी स्थिति में यह निर्णय लिया गया कि जब लाइब्रेरियन की किताब पर पकड़ ना हो तो उसे बच्चों के साथ कुछ समय बाद खोलना ही उचित होगा। क्योंकि संस्था एक लम्बे समय से सरकारी तंत्र के साथ मिलकर काम कर रही है और सरकारी तंत्र शायद इस तरह की किताबों को संग्रह में नहीं शामिल करना चाहता, जो एक अलग दृष्टिकोण पेश करती हैं।
विविध किताबें यानी मज़बूत संग्रह
अगर हम विश्वास रखते हैं कि विविध किताबों से संग्रह मज़बूत होता है और सभी बच्चों को विविध किताबें पढ़ने के अवसर मिलने चाहिए तो हमें संग्रह को रणनीतिक रूप से बच्चों के सामने पेश करने की तैयारी करनी होगी। अपनी समझ को बेहतर करने के लिए हम लाइब्रेरी एडुकेटर कोर्स और लाइब्रेरी विषय पर आधारित ऐसी अन्य कार्यशालाओं में भाग ले सकते हैं, जो दृष्टिकोण विकास में मदद करती हैं और विविध किताबों के प्रति चेतना जागृत करती हैं। साथी ही, पुस्तकालय के संग्रह में शामिल करने से पहले कहानियों को खुद समझना और उन पर साथियों के साथ चर्चा ज़रूरी है। इससे एक ही कहानी को अलग-अलग दृष्टिकोण से देख पाने और आलोचनात्मक सोच के विकास की क्षमता बढ़ती है। और यह भी समझना होगा की हमें कब महसूस होता है कि हम बच्चों के साथ विविध पुस्तकें खोलने और उन पर चर्चा करने के लिए तैयार हैं? क्या हममें आन्तरिक दृढ़ विश्वास है; क्या हम समुदाय को विश्वास में ले पाए हैं और उनसे बातचीत कर पाए हैं? इसके बाद भी, अगर तैयारी को लेकर मन में संकोच है कि बच्चे चर्चा में कैसे जुड़ेंगे, चर्चा सम्भल पाएगी कि नहीं तो इस तरह के भावों को पार करने के लिए शायद एक बार किताब को बच्चों के साथ खोलकर देखना ठीक होगा। हो सकता है कि चर्चा आपको आश्चर्यचकित कर दे और आपमें एक नई ऊर्जा और विश्वास पैदा हो।
विविध किताबों को खोलना थोड़ा गम्भीर विषय है पर कार्य करते हैं तो ये रोचक भी बन जाता है क्योंकि इससे किताब को विभिन्न दृष्टिकोण से गहराई से समझने में मदद मिलती है। ऐसी किताबों पर काम करके अपनी विचारधारा और पूर्वाग्रह पर सवाल करने, उन्हें टटोलने और उन्हें बदलने का मौका भी लगातार मिलता है, जिससे हम ‘वैश्विक समझ’ बनाने की दिशा में कुछ कदम आगे बढ़ पाते हैं।
उम्मीद है कि इस लेख को पढ़कर आपको पुस्तकालय के अपने संग्रह में विविध किताबों को शामिल करने का मौका और प्रेरणा मिलेगी। कृपया अपने अनुभव और विचार हमसे साझा करें।
सन्दर्भ
ओवर्टन, निकॉल, २०१६, “लाइब्रेरीज़ नीड डाइवर्स बुक़्स”, पब्लिक लाइब्रेरीज़
(Libraries need diverse books)
किताबें
महाश्वेता देवी, रुचि शाह (चित्र) और सुषमा रोशन (अनुवाद), दबंग गाय हमारी, तूलिका पब्लिशर, चेन्नई, २०१५
इता मेहरोत्रा, शाहीन बाग ए ग्राफ़िक रिकलेक्शन, योड़ा प्रेस, नई दिल्ली, २०२१
रिनचिन और लोकेश खोड़के (चित्र), विद्रोह की छपछप, मुस्कान, भोपाल, २०२१
लोकेश मालती प्रकाश और कनक शशि (चित्र), बस्ते में सवाल, एकलव्य, भोपाल, २०२४


No approved comments yet. Be the first to comment!