लर्निंग सेंटर क्या होता है?
दिल को छू लेने वाले इस लेख में, शिक्षाविद के. टी. मारगरेट लर्निंग सेंटर को परिभाषित करती हैं और इन्हें लेकर हमारी समझ को व्यापकता प्रदान करती हैं। इसके लिए वे बच्चों के व्यक्तित्व को हमारे सरोकारों के केन्द्र में रखती हैं। और वे बताती हैं कि बच्चे सीख सकें इसके लिए उनके साथ की हमारी सभी अन्तःक्रियाओं में प्यार और अपनापन होना ज़रूरी है। यह एक कोमल भावना है जिसे लोग गम्भीरता से नहीं लेते।

‘बेहतरीन शिक्षा’ किसे कहा जा सकता है?
सभी माता-पिता, चाहे उनकी हैसियत कुछ भी हो, यही चाहते हैं और यही ख्वाब देखते हैं कि उनके बच्चों को ‘बेहतरीन शिक्षा’ मिले। लेकिन ‘बेहतरीन शिक्षा’ से हमारा मतलब क्या है? इस सवाल पर बात करने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि समय के साथ इस अवधारणा में किस तरह बदलाव आता है और किस तरह से यह अपने मूल अर्थ से भटक जाती है।
‘बेहतरीन शिक्षा’ के मायने हरेक व्यक्ति के लिए अलग होते हैं। यहाँ तक कि इसके मायने अलग-अलग समुदायों और संस्कृतियों में भी भिन्न होते हैं। कई बार यह किसी खास दौर में समाज में प्रचलित सोच, जो कि आम लोगों की भावनाओं के अनुरूप होती है, उस पर भी निर्भर करती है।
शिक्षा की गुणवत्ता में इस गिरावट से सरोकार रखने वाले लोगों ने इस सूरत-ए-हाल का आकलन करने की कोशिश की है। इसके लिए शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए शिक्षा की पद्धतियों में संशोधन किए गए और उन्हें नए नाम दिए गए। कुछ समय तक इनका असर भी दिखाई दिया। लेकिन ‘सबसे अच्छी शिक्षा’ का सवाल आज भी पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है।
हम आज भी इस सवाल का जवाब खोज रहे हैं। सम्भव है कि यह खोज आगे भी जारी रहे। यह किसी बारूदी सुरंग से गुज़रने जैसा है, जिसमें हर कदम पर जोखिम है और जिसमें सही रास्ता खोजने के लिए धैर्य, समय और साहस — तीनों की ज़रूरत होती है।
‘बेहतरीन शिक्षा’ कहाँ मिलती है?
मैं भी कई वर्षों से बेहतरीन शिक्षा क्या होती है इसके सार और इसकी बुनियादी बातों को समझने की कोशिश कर रही हूँ। इस दौरान जो कुछ समझ पाई हूँ, उसे आपके साथ साझा करना चाहती हूँ।
मैं यह नहीं कह रही कि मेरी समझ पूरी है या अंतिम है। लेकिन इससे मुझे सन्तोष ज़रूर मिला है। इससे मुझे इस दिशा में हाड़तोड़ मेहनत करते रहने का हौसला भी मिला है।
हममें से ज़्यादातर लोग यही मानते हैं कि शिक्षा देना स्कूल की ज़िम्मेदारी है। स्कूल ही शिक्षा के लिए आधिकारिक रूप से ज़िम्मेदार संस्था है और इसे ही सीखने का मुख्य केन्द्र माना
जाता है। अलग-अलग स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता और इनमें मिलने वाले सीखने के अवसर अलग होते हैं। यही वजह है कि अक्सर माता-पिता ऐसे स्कूल की तलाश करते हैं जो उनके बच्चों को ‘बेहतरीन शिक्षा’ प्रदान कर सके।
लर्निंग सेंटर आखिर होता क्या है? और उसकी सबसे ज़रूरी विशेषताएँ क्या होती हैं?
किसी बच्चे के लिए सीखने का पहला केन्द्र उसका घर होता है। यही वह जगह होती है जहाँ वह अपने परिवार के साथ रहता है। घर सीखने की पहली ‘पाठशाला’ होती है। माता-पिता उसके पहले शिक्षक होते हैं। इसलिए जो माता-पिता अपने बच्चों के लिए बेहतरीन शिक्षा की हसरत रखते हैं, उन्हें सबसे पहले अपने घरों में बच्चों के लिए ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ सीखने की अच्छी शुरुआत हो सके।
प्यार और अपनेपन के माहौल में ही कोई व्यक्ति सीख सकता है। प्रेम से भरे माहौल में सीखना और स्वस्थ ढंग से विकसित होना कहीं आसान हो जाता है।
घर में बच्चों को भावनात्मक, शारीरिक, बौद्धिक और आत्मिक स्तर पर जो देखभाल और पोषण मिलता है उसी से उनके विकास की मज़बूत बुनियाद तैयार होती है। इसी बुनियाद से उन्हें आगे आने वाली चुनौतियों का डटकर सामना करने में मदद मिलती है। जब वे घर से निकलकर स्कूल जैसे औपचारिक सीखने के केन्द्र में पहुँचते हैं, तब यही आधार उनके काम आता है। वहाँ वे अपने हमउम्र बच्चों, शिक्षकों और दूसरे लोगों के साथ मिलकर रहना और सीखना शुरू करते हैं।
किसी भी लर्निंग सेंटर की बुनियाद ‘प्रेम’ होता है। कोई व्यक्ति प्रेम भरे माहौल में ही सीख सकता है। सीखना और स्वस्थ तरीके से विकसित होना प्यार भरे माहौल में एक आसान प्रक्रिया बन जाती है। ऐसे माहौल को बनाने के लिए प्रतिबद्धता, धैर्य, ध्यान, देखभाल, समझ, विवेक और रुचि जैसी बातों की ज़रूरत होती है। ये सभी प्रेम से ही निकलती हैं, यही मूलभूत तत्व है।
लेकिन यहाँ प्रेम का मतलब केवल भावनात्मक लगाव नहीं है। ऐसा लगाव स्वार्थ और स्वामित्व की भावना से भरा होता है। इस तरह का प्रेम बच्चे के व्यक्तित्व के विकास में रुकावट बन सकता है। इसकी वजह यह है कि इसमें बच्चे को एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में स्वीकार करने की जगह नहीं होती। उसकी अपनी पहचान और उसकी विशिष्टता का सम्मान नहीं किया जाता। ऐसी स्थिति में बच्चा बड़ों के हाथों की कठपुतली बन जाता है। वह हर बात के लिए उन्हीं पर निर्भर रहता है। धीरे-धीरे उसमें स्वतंत्र रूप से सोचने, अपने फैसले लेने और साहस तथा ईमानदारी के साथ काम करने का आत्मविश्वास कम होने लगता है।
इसलिए यह ज़रूरी है कि बड़े, खासकर माता-पिता, यह समझें कि उन्हें एक अनोखे और विकसित होते हुए इंसान की देखभाल की ज़िम्मेदारी मिली है। जब वे इस ज़िम्मेदारी की अहमियत को समझते हैं, तब वे उसे निस्वार्थ प्रेम और पूरी सावधानी के साथ निभाते हैं। ऐसे में उनका सबसे बड़ा सरोकार बच्चे के विकास का ध्यान से अवलोकन करना और ज़रूरत पड़ने पर उसका मार्गदर्शन करना होता है।
बच्चे का मार्गदर्शन इस तरह किया जाना चाहिए और उसे इस तरह से सहारा दिया जाना चाहिए कि वह वही बन सके जिसकी सम्भावना उसके भीतर पहले से मौजूद है, न कि वह जो बड़े उसे बनाना चाहते हैं। ऐसे में यही माता पिता की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी बन जाती है। उनकी ज़िन्दगी सार्थक हो जाती है और सही दिशा में आगे बढ़ने लगती है। और अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करने के लिए वे जो भी मेहनत करते हैं वह उनके लिए बोझ नहीं, बल्कि खुशी की वजह बन जाती है।
अपने घर में इस तरह के माहौल में पले-बढ़े बच्चे के मन में डर या आशंकाएँ नहीं होंगी। उसकी सोच रचनात्मक और स्पष्ट होगी और उसके कार्य स्वाभाविक, सहज और बिना किसी झिझक के होंगे। यहाँ तक कि वह अपनी मासूमियत भरी शरारतें और नटखट हरकतें भी ईमानदारी के साथ और बिना किसी डर के अपने माता-पिता को बता देगा। तब वह बच्चा एक परिपक्व और भरोसेमन्द इन्सान बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा होता है।
दो लर्निंग सेंटर्स के बीच का सफर: घर से स्कूल तक
जब बच्चे को घर में ऐसा माहौल मिलता है, तब वह अपने विकास के अगले पड़ाव के लिए तैयार होता है। इसके बाद वह सीखने के औपचारिक केन्द्र, यानी स्कूल, में प्रवेश करता है। यहाँ उसके बौद्धिक और सामाजिक विकास की नई शुरुआत होती है। स्कूल में उसके आसपास का संसार बदल जाता है। अब माता-पिता की जगह शिक्षक होते हैं। उसके साथ उसकी उम्र के दूसरे बच्चे होते हैं। इसके अलावा, और भी कई वयस्क उसके जीवन का हिस्सा बनते हैं। यह बदलाव बच्चे के जीवन का एक अहम दौर होता है। इसलिए ज़रूरी है कि शिक्षा की इस प्रक्रिया में माता-पिता और शिक्षक एक ही सोच और एक ही उद्देश्य के साथ एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करें।
शिक्षक होना केवल एक पेशा नहीं है। यह एक ज़िम्मेदारी भी है। एक शिक्षक को किसी बच्चे के विकास की अहम ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है। इसलिए घर जैसे सीखने के केंद्र में जिन बातों की ज़रूरत होती है, वही बातें स्कूल में भी उतनी ही ज़रूरी होती हैं। हाँ, इस उम्र के बच्चों के साथ काम करने के लिए कुछ और बातों की भी ज़रूरत पड़ती है।
इस दौर में बच्चे की समझ बहुत तेज़ी से विकसित होती है। वह नई बातों को ग्रहण कर सकता है। उनके बारे में सोच सकता है। उनका विश्लेषण कर सकता है और उन्हें अपनी ज़िन्दगी में इस्तेमाल भी कर सकता है। इसलिए शिक्षक का काम बच्चे के भीतर जानकारी भरना नहीं है। सीखने की क्षमता तो उसके भीतर पहले से ही मौजूद होती है। शिक्षक का काम ऐसा माहौल तैयार करना है जहाँ बच्चा विकसित हो सके।
इसे एक उदाहरण की मदद से समझा जा सकता है। एक माली जिन पौधों की देखभाल कर रही होती है, वह उनकी वृद्धि के लिए हर आवश्यक चीज़ उपलब्ध कराती है। वह इस काम को प्यार, सब्र, देखभाल और ध्यान से करती है। वह उन्हें सबसे अच्छा माहौल देने में अपना समय और ऊर्जा लगाती है। उसकी अच्छी देखभाल से पौधे खूब बढ़ते हैं, फलते-फूलते हैं और खूब फल देते हैं। फिर भी उन्हें किसी खास तरह का पेड़ बना पाना उसके वश में नहीं होता। वह गुण तो उस पौधे के भीतर पहले से मौजूद होता है। माली का काम केवल इतना होता है कि वह उसके बढ़ने के लिए सबसे उपयुक्त परिस्थितियाँ तैयार करे।
ऐसा प्यार जिसमें अधिकार का भाव हो, बच्चे के विकास में बाधा डालता है, क्योंकि इसमें बच्चे के व्यक्तित्व और उसकी विशिष्टता का सम्मान नहीं किया जाता।
शिक्षक भी सीखने के केंद्र का ऐसा ही माली है। उसे यह समझना होगा कि उसके पास आने वाला हर बच्चा अपने साथ जन्मजात बुद्धिमत्ता, कई क्षमताएँ, रुचियाँ और सम्भावनाएँ लेकर आता है। ये गुण उसे वह बनने में मदद करते हैं, जो बनने की उसमें क्षमता है। बच्चे को ज़रूरत केवल ऐसे माहौल की होती है जहाँ ये क्षमताएँ विकसित हो सकें।
इसलिए शिक्षक को भी माली की तरह अपना समय और अपनी ऊर्जा इस बात को समझने में लगानी चाहिए कि उसकी कक्षा के हर बच्चे के भीतर कौन-कौन-सी सम्भावनाएँ मौजूद हैं। उसे लगातार सजग रहना होगा। उसे यह देखना होगा कि बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए किस तरह का माहौल ज़रूरी है। जब ऐसा माहौल बनता है, तब बच्चे अपनी पूरी क्षमता के साथ आगे बढ़ पाते हैं। इसके लिए शिक्षक और सीखने वाले बच्चे दोनों को ही बहुत ज़्यादा मानसिक और शारीरिक अनुशासन का पालन करने की ज़रूरत होती है।
“क्या हवा में भी हमारी तरह जीवन होता है?”
शिक्षक के रूप में काम करते हुए मुझे यह समझ में आया कि छोटे बच्चे ऐसे अनुशासन के लिए पूरी तरह तैयार होते हैं। असल बदलाव की ज़रूरत बड़ों में है। हमारी पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम, पाठ योजनाएँ और समय-सारिणियाँ — ये सब बड़ों द्वारा बनाई जाती हैं। इन्हें इस तरह तैयार किया जाता है कि बच्चे उसी साँचे में ढल जाएँ जो बड़े उनके लिए तय करते हैं। लेकिन इस
सोच को बदलने की ज़रूरत है। इन सबकी योजना बच्चों की ज़रूरतों और उनके सीखने के तरीकों को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए, न कि केवल बड़ों की सुविधा के हिसाब से।
एक लर्निंग सेंटर में एक युवा शिक्षिका ने पूरे उत्साह के साथ चार वर्ष के एक बच्चे को अंग्रेज़ी वर्णमाला के अक्षर, चीज़ों के नाम और रंग वगैरह सिखाने के लिए सामग्री तैयार की।
लेकिन बच्चा उस तरीके से सीखने के लिए तैयार नहीं था, जिस तरह शिक्षिका उसे सिखाना चाहती थी। जब बच्चा कक्षा में था तभी बाहर तेज़ हवा चलने लगी। उसने हवा के चलने की आवाज़ सुनी और पेड़ों की टहनियों को हिलते हुए और पत्तों को गिरते हुए देखा।
उसने शिक्षिका से पूछा, “क्या हवा में भी हमारी तरह जीवन होता है?” शिक्षिका उस समय वर्णमाला सिखाने में व्यस्त थी। उसने जवाब दिया, “मुझे नहीं पता।” यह सुनकर बच्चे ने कहा, “तो आप इसकी वजह पता कीजिए और फिर मुझे बताइए।” बाद में उस बच्चे ने अपने-आप ही अंग्रेज़ी के सभी अक्षरों को सही-सही पढ़ा। उसने रंगों और चीज़ों के नाम भी सही-सही बता दिए और उनका मिलान भी कर दिया। यह देखकर शिक्षिका हैरान रह गई।
इस स्थिति में यह साफ है कि सीखने की प्रक्रिया में हमेशा शिक्षक ही यह तय नहीं करता कि बच्चे को क्या सीखना चाहिए। कई बार बच्चा अपने सवालों के ज़रिए शिक्षक को खुद यह बताता है कि वह क्या सीखना चाहता है।
इसलिए सीखने के केंद्र की बुनियाद ‘प्रेम’ ही है। लेकिन केवल इतना काफ़ी नहीं है। शिक्षक को अपने सोचने के तरीके, अपने नज़रिए और अपने व्यवहार पर भी नए सिरे से विचार करना होगा। उसे सबसे पहले यह समझने की कोशिश करनी होगी कि बच्चा कौन है, कैसा है और उसके भीतर किस तरह की सम्भावनाएँ मौजूद हैं।
इसके लिए शिक्षक को अपने भीतर के बच्चे से भी दोबारा जुड़ना होगा। उसे खुद से यह पूछना होगा — “मैं कौन हूँ?” “मैं क्या हूँ?” इन सवालों के ईमानदार जवाब ही किसी शिक्षक को यह समझने में मदद कर सकते हैं कि लर्निंग सेंटर वास्तव में क्या होता है और उसे किस तरह का होना चाहिए।


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