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पाठ्यपुस्तक-केन्द्रित शिक्षण से अर्थपूर्ण सीखने-सिखाने की ओर

यह लेख पाठ्यपुस्तक-केंद्रित शिक्षा की सीमाओं पर विचार करते हुए विषयों की प्रकृति और उनके मूल उद्देश्यों को समझने की आवश्यकता पर बल देता है। लेखक के अनुभव दर्शाते हैं कि सार्थक शिक्षण बच्चों की अभिव्यक्ति, तर्क, वर्गीकरण और समझ को विकसित करता है, जिससे सीखना अधिक विवेकपूर्ण, प्रासंगिक और अर्थपूर्ण बनता है।

By Mukesh Malviya
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Published on : अक्टूबर १५, २०२६
Modified On : October 15, 2026
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हमारी औपचारिक शिक्षा व्यवस्था पाठ्यपुस्तक केन्द्रित बन गई है। कक्षाओं में सिर्फ पाठ्यपुस्तकों से पढ़ाने का रिवाज है। विद्यार्थियों को अलग-अलग विषयों की पाठ्यपुस्तकों को पढ़ना-समझना होता है। शिक्षक भी विषयों को ही पढ़ाते हैं। माध्यमिक स्तर तक के स्कूलों में ये विषय हिन्दी, अँग्रेज़ी, संस्कृत, गणित, विज्ञान और सामाजिक अध्ययन जैसे नामों से जाने जाते हैं। ये विषय क्या हैं और ये आपस में एक-दूसरे से किस तरह से अलग हैं और ये ही विषय क्यों पढ़ाए जाते हैं इस बारे में शिक्षकों में किसी तरह का विमर्श नहीं होता है।

इन विषयों के बारे में शिक्षकों की समझ ज़्यादातर पाठ्यपुस्तक के पाठों से ही निर्धारित हुई है। शिक्षकों और बच्चों के पास अपना विवेक इस्तेमाल करके उस विषय को व्यापकता में सोचने-समझने के अवसर हैं ही नहीं या कम हैं। यहाँ विवेक से तात्पर्य है किसी बात या ज्ञान को समझने के लिए स्वयं की सोच और समझ से उसका अर्थ बनाना और आवश्यकता पड़ने पर उस समझ को व्यक्त करने के लिए खुद के शब्दों, अर्थों और तर्कों का इस्तेमाल करना।

मैं विगत 35 वर्षों से सरकारी प्राथमिक शिक्षक की भूमिका में हूँ। मेरे आसपास के ज़्यादातर शिक्षकों का कक्षाओं में बच्चों के साथ संवाद पाठ्यपुस्तकों में लिखी हुई बातों के इर्द-गिर्द या हुबहू उसी पर केन्द्रित होता है। मेरी समझ से, सिर्फ पाठों और प्रश्न-उत्तर के ज़रिए किसी विषय के उद्देश्यों की पूर्ति या बच्चों में उस विषय के कौशलों के विकास का काम नहीं किया जा सकता। मसलन, आठवीं तक हिन्दी विषय पढ़ लेने के बाद भी अधिकांश बच्चों को किसी शीर्षक के इर्द-गिर्द अपने मौलिक विचारों को लिखित या मौखिक रूप में अभिव्यक्त करने में परेशानी होती है। यह उन बच्चों की कमतरी नहीं है, बल्कि यह उस विषय को पढ़ाने के तौर-तरीकों का नतीजा होता है। यही बच्चे संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, एकवचन, बहुवचन, काल आदि की न सिर्फ परिभाषाएँ बता लेते हैं, बल्कि इन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर भी दे पाते हैं।

एक दिन सातवीं कक्षा में संस्कृत विषय के कालखण्ड में मैंने बच्चों से यह सवाल किया कि संस्कृत विषय क्या है? बच्चों ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। तब मैंने उनसे पूछा कि इंग्लिश या अँग्रेज़ी विषय क्या होता है? इस पर कुछ बच्चें इंग्लिश की पाठ्यपुस्तक दिखाने लगे। फिर मैंने उनसे पूछा कि अच्छा बताओ हिन्दी विषय की पुस्तक में क्या-क्या है? इसके जवाब में बच्चों ने बताया कि हिन्दी में कविता-कहानी के पाठ होते हैं, प्रश्न होते हैं, शब्दार्थ, संज्ञा-सर्वनाम क्रिया, काल, एकवचन बहुवचन आदि होते हैं। तब मैंने उन्हें बताया कि यही सब तो अँग्रेज़ी और संस्कृत की पुस्तक में भी है। तो क्या इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि ये तीनों विषय भाषा के हैं? इसके बाद यह प्रश्न उभरा कि भाषा क्या है? इस प्रश्न का जवाब देने के लिए बच्चे बहुत उत्साहित नहीं थे। मैंने उन्हें बोलने के लिए प्रोत्साहित करते हुए उनसे कहा कि हम सबको पता है कि हम एक-दूसरे से भाषा के ज़रिए बात करते हैं। सबके पास अपनी भाषा है, इसलिए आप इस बारे में जो भी कहोगे, सब सही ही होगा। तब बच्चों ने कहा – “बातचीत भाषा है, हम जो बोलते हैं, वह भाषा है, लिखी हुई बात भी भाषा है।” फिर मैंने पूछा — “बोलने और लिखने के अलावा जो हम मन में सोचते हैं वह क्या है? बात तो हम हिन्दी में, गोंडी में, किसी दूसरी भाषा में और इशारे-इशारे में भी करते हैं। तो क्या यह सब भाषा है? उन्होंने इस सबको भाषा बताया। फिर मैंने पूछा कि क्या हम अँग्रेज़ी में या संस्कृत में भी बात कर सकते हैं? बच्चों ने कहा, “नहीं, शायद आगे की कक्षा में पहुँचकर हम ऐसा कर पाएँ?”

कक्षा के बाद में मैं यह सोचने लगा कि संस्कृत और इंग्लिश पढ़ने के बावजूद मैं हिन्दी की तरह इन्हें बोल या लिख क्यों नहीं पाता हूँ? और हिन्दी में भी क्या मैं अपने विचारों को सही शब्दों के साथ व्यक्त कर पाता हूँ ? फिर मैंने यह भी सोचा कि कक्षाओं के लिए निर्मित हिन्दी, इंग्लिश और संस्कृत की पाठ्यपुस्तकों के ज़्यादातर हिस्सों में भाषा का ही विश्लेषण क्यों किया जाता है? जैसे, संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया आदि शब्दों की पहचान करना, वाक्य के प्रकार या काल के अनुसार वाक्य में परिवर्तन करना, एकवचन और बहुवचन में बदलना आदि। इसी तरह, कविता, कहानी आदि पर आधारित प्रश्न उसमें छिपी जानकारी पूछते हैं। संस्कृत और इंग्लिश के मामले में मुझे यह समझ आया कि चूँकि ये भाषाएँ बच्चों की बोलचाल में और परिवेश में मौजूद नहीं होतीं, इसलिए इन भाषाओं के शब्दों और इनके वाक्यों के ढाँचे के नियमों को याद रखना इन भाषाओं को समझने में मददगार होता है। परन्तु हिन्दी बोलने वाले बच्चों के लिए शुरुआती स्तर पर ही हिन्दी व्याकरण और भाषा के नियमों की जानकारी में समय लगाना क्यों ज़रूरी होता है? वे बिना व्याकरण जाने भी तो वाक्यों को सही बोलते और समझते हैं। वाक्यों का विश्लेषण करना या व्याकरण सिखाने से बच्चों की अभिव्यक्ति में कोई बड़ा बदलाव तो आता नहीं है।

इस सन्दर्भ में प्राशिका नाम के एक प्रयोगिक शिक्षा कार्यक्रम, जिसका मैं भागीदार रहा, ने भाषा शिक्षण को लेकर मेरे नज़रिए को व्यापकता देने में मदद की। इसमें भाषा को बच्चे की कल्पनाशीलता और रचनाशीलता बढ़ाने के माध्यम के तौर पर देखा और समझा गया। प्राशिका के लिए बनी भाषा की पाठ्यपुस्तक (खुशी-खुशी) ऐसी भाषा में थी जो बच्चों के साथ संवाद करती थी। इसमें आम बोलचाल के शब्दों का इस्तेमाल किया गया था, जिससे इसे इस्तेमाल करने वाले बच्चों और शिक्षकों को यह अपनी-सी लगती थी। इसके साथ संवाद में भागीदारी करके वे अपने ज्ञान/समझ का विस्तार या निर्माण खुद कर सकने का आत्मविश्वास अर्जित कर सकते थे।

इस पाठ्यपुस्तक में कई प्रकार की गतिविधियाँ दी गई थीं। जैसे, कविताओं, कहानियों व कई अन्य अलग-अलग तरह के लेखन को पढ़ना-सुनना। इनमें आए वाक्यों के ढाँचे को अपनी अभिव्यक्ति में इस्तेमाल करना, नई रचनाएँ बनाना, अधूरी कहानी या कविता को पूरा करना, किसी देखे हुए दृश्य या काल्पनिक दृश्य का विवरण सुनाना या लिखना, किसी पात्र की नकल करना या उसके बोलने के लहज़े को पकड़ना, एक ही वाक्य को उसका अर्थ बनाए रखते हुए अलग-अलग तरीके से कहना या लिखना, नई कल्पनाएँ करना और उनके लिए भाषा गढ़ना, जैसे पेड़ अगर चलते होते तब क्या होता? इन सभी गतिविधियों में सिर्फ अभिव्यक्ति पर ज़ोर होता था और गलत-सही का कोई डर नहीं होता था।

प्राशिका की पाठ्यपुस्तकों के विपरीत, एससीईआरटी और एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में आम बोलचाल वाले वाक्यों का इस्तेमाल कम ही देखने को मिलता है। इनमें एक सरल से वाक्य को कहने के लिए भी दुरूह और अप्रचलित शब्दावलियों का उपयोग देखने को मिलता है। उदाहरण के लिए, इसमें मिट्टी के लिए मृदा और सीखने के लिए अधिगम जैसे कठिन शब्द देखने को मिलते हैं। एक बार मेरे स्कूल की विज्ञान की परीक्षा में कुछ ऐसा प्रश्न पूछा गया – विद्युत से चलने वाले 5 उपकरणों के नाम लिखिए। इसका जवाब अधिकांश बच्चों ने नहीं लिखा। बाद में जब मैंने उनसे पूछा कि तुम्हें बिजली से चलने वाली 5 चीज़ों के नाम नहीं मालूम, तो उन्होंने मुझे 15 ऐसी चीज़ें गिना दीं।

इसी तरह, कक्षा छठवीं में विज्ञान के एक अध्याय ‘पदार्थ की अवस्थाएँ’ को पढ़ने के बाद अगले पाठ तक लगभग सभी बच्चों को यह पता था कि पदार्थ की तीन अवस्थाएँ होती हैं — ठोस, द्रव और गैस। लेकिन मेरे मन में यह सवाल था कि क्या बच्चों ने केवल इस तथ्य को रट लिया है या वास्तव में वे इसे समझते भी हैं। मैंने कक्षा में बच्चों से यही सवाल पूछा — “इस बात का मतलब क्या है कि पदार्थ की तीन अवस्थाएँ होती हैं?” बच्चे चुप रहे। मैंने थोड़ा दोस्ताना माहौल बनाते हुए उनसे कहा, “थोड़ा सोचो और फिर बताओ।”

कुछ देर बाद एक बच्ची ने जवाब दिया, “जैसे पानी है। जब पानी बर्फ के रूप में होता है तो ठोस होता है, पानी रहता है तो द्रव होता है और जब भाप बन जाता है तो गैस हो जाता है।” मैंने उससे पूछा, “तो पानी क्या पदार्थ है?” उसने तुरन्त कहा, “नहीं, पानी द्रव है।” उसके उत्तर ने मुझे सोचने पर मजबूर किया। मैंने सोचा कि किताब में पदार्थों को ठोस, द्रव और गैस के रूप में बाँटने की ज़रूरत क्यों पड़ी होगी? क्या इस बात पर बच्चों के साथ चर्चा की जा सकती है कि हम अनगिनत वस्तुओं और जीवों को कुछ समूहों या वर्गों में क्यों बाँटते हैं?

मैंने बच्चों का ध्यान अपने आसपास की चीजों की ओर ले जाते हुए पूछा, “इस कमरे में या हमारे स्कूल के आसपास तुम्हें क्या–क्या दिखाई दे रहा है?” बच्चे एक के बाद एक चीज़ों के नाम बताते गए — पेड़, घर, पुस्तक, पेन, पेंसिल, बोर्ड, दीवार, नदी, पहाड़ आदि। मैंने उन्हें रोककर पूछा, “अच्छा, अब सोचो हमारे गाँव में ऐसी कितनी चीज़ें होंगी?” बच्चों ने कहा, “हज़ारों, शायद उससे भी ज्यादा।” फिर मैंने पूछा, “और हमारे देश में? और पूरे संसार में?” अब उनका उत्तर था — “गिन नहीं सकते… अनगिनत होंगी।” मैंने अगला सवाल रखा — “अगर हमें इस पूरे संसार की इन अनगिनत वस्तुओं और जीवों को जानना और समझना हो, तो हम क्या करेंगे?” इस प्रश्न का बच्चों के पास तत्काल कोई जवाब नहीं था। तब मैंने अपनी बात को दूसरे ढंग से रखने की कोशिश की। मैंने कहा, “अगर मैं कहूँ कि हमारे आसपास मुख्यतः दो तरह की चीज़ें हैं — एक वे जो जीवित हैं और दूसरी वे जो जीवित नहीं हैं — तो क्या मैं गलत कह रहा हूँ?”

हमने अपने आसपास दिखाई देने वाली कुछ वस्तुओं और जीवों के उदाहरण लिए और उन्हें सजीव और निर्जीव के दो समूहों में बाँटा। इस गतिविधि के माध्यम से बच्चों ने देखा कि संसार में मौजूद अनगिनत वस्तुओं और जीवों को किसी एक आधार पर केवल दो समूहों में रखा जा सकता है। इसके बाद मैंने पूछा, “क्या संसार की इन अनगिनत चीज़ों को किसी और आधार पर भी बाँटा जा सकता है?” अब मैंने उनका ध्यान ठोस, द्रव और गैस की ओर दिलाया। हमने अलग-अलग वस्तुओं और पदार्थों के उदाहरण लेकर विचार किया कि क्या इन्हें इनकी अवस्था के आधार पर ठोस, द्रव और गैस के समूहों में बाँटा जा सकता है।

इस प्रक्रिया में बच्चों के सामने धीरे-धीरे यह बात स्पष्ट होने लगी कि किसी विशेष आधार या गुण के आधार पर चीज़ों को एक साथ रखा जाता है। अर्थात, किसी भी वर्गीकरण के पीछे एक आधार होता है और उस आधार को समझना आवश्यक है।

इस अनुभव के बाद मैंने ‘समूहीकरण’ और ‘वर्गीकरण’ को केवल ‘पदार्थ की अवस्थाएँ’ पढ़ाने तक सीमित नहीं रखा। मैंने इन्हें विज्ञान विषय के दूसरे पाठों को समझने का भी एक आधार बनाया। उदाहरण के लिए, धातु-अधातु, विलेय-अविलेय आदि विषयों में भी बच्चों के साथ यह समझने की कोशिश की कि अलग-अलग वस्तुओं या पदार्थों को किन गुणों या विशेषताओं के आधार पर अलग-अलग समूहों में रखा गया है।

इस तरह मेरे लिए ‘समूहीकरण’ और ‘वर्गीकरण’ केवल पाठ्यपुस्तक में दिए गए विषय नहीं रहे, बल्कि देखने, तुलना करने, समानता और भिन्नता पहचानने का आधार तय करने, तर्क करने और अपने निष्कर्ष को व्यक्त करने की प्रक्रिया में बच्चों को शामिल करने का माध्यम बन गए।

इस प्रकार, बच्चों को पढ़ाने से पहले मैं पहले पाठ्यपुस्तक में दिए गए पाठ को खुद समझता हूँ। यह समझने की कोशिश करता हूँ कि उस पाठ को उस विषय के किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनाया गया होगा। इसके लिए मुझे यह जानना-समझना पड़ता है कि विषय की प्रकृति क्या है और विषय में निहित कौशल कौन-से हैं? इन्हें जानना-समझना मेरे शिक्षण को प्रभावी और बच्चों की समझ के दायरे में रखता है। जैसे, जब मुझे यह पता होगा कि पर्यावरण अध्ययन विषय का उद्देश्य जानकारी एकत्र करना, उसे व्यवस्थित करना, उसका रिकार्ड रखना और उससे निष्कर्ष निकालना है, तब मैं इसमें दिए गए किसी पाठ ‘जल के स्रोत’ को यह ध्यान में रखते हुए बच्चों को पढ़ा पाऊँगा कि इन उद्देश्यों की पूर्ति हो। शायद इसी बदलाव से पाठ्यपुस्तक-केंद्रित शिक्षण में सीखने की अधिक अर्थपूर्ण और विवेकपूर्ण प्रक्रिया की ओर बढ़ने की सम्भावना है।

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Mukesh Malviya
Mukesh Malviya
Mukesh Malviya is a primary school teacher in a government school in Madhya Pradesh. Associated with Eklavya since the beginning of his teaching career, he has written extensively about classroom experiences and children's learning over the past 35 years. He has contributed to the development of NCERT and state-level textbooks and educational materials, and has authored more than 20 books of stories and poems for children.
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