आर्ट ऑफ़ प्ले फाउंडेशन: एक गैर-लाभकारी संस्था के शुरुआती सफर पर आत्मचिन्तन
अपने इस लेख में लेखक एक ऐसी संस्था के बारे में बात कर रहे हैं जिसके वे सह-संस्थापक थे। बाद में इस संगठन को एक मिलते-जुलते लक्ष्य वाले दूसरे नागरिक समाज संगठन में मिलाना पड़ा। वह इस लेख में उस नागरिक समाज संगठन की विकास-यात्रा और उससे उन्हें मिली सीख पर चर्चा कर रहे हैं।

Beach Cricket Mamallapuram Tamil Nadu, India
परिचय
आर्ट ऑफ़ प्ले फाउंडेशन की शुरुआत इस मकसद से की गई थी कि भारत के सभी बच्चों के लिए खेलने का अधिकार एक वास्तविकता बन सके। इसे फरवरी 2016 में गाँधी फेलोशिप के तीन पूर्व छात्रों ने मिलकर शुरू किया था। उतार-चढ़ाव भरे पाँच साल के सफर के बाद, जनवरी 2021 में आर्ट ऑफ़ प्ले का ईएलएमएस नाम की एक दूसरी संस्था में विलय हो गया, जो इसी मकसद से काम करती है। ईएलएमएस स्पोर्ट्स फाउंडेशन ने अब प्रोजेक्ट ‘छलांग’ नाम से एक नई पहल शुरू की है। इसका मकसद ज़मीनी स्तर के खेलों और खेल-कूद की पहलों को बढ़ावा देना है। ‘आर्ट ऑफ़ प्ले’ के सह-संस्थापकों में से एक अभी इस पहल का नेतृत्व कर रहे हैं। प्रोजेक्ट छलांग के तहत अब हम नौ राज्यों के 2500 स्कूलों के लगभग चार लाख विद्यार्थियों के साथ काम कर रहे हैं। हमने स्पोर्ट्स फॉर ट्रांसफॉर्मेशन फेलोशिप नाम से दो साल का पूर्णकालिक (फुलटाइम) कार्यक्रम भी शुरू किया है। इसका पहला बैच अपना पहला वर्ष पूरा भी कर चुका है।
इस सफर में आए उतार-चढ़ाव
मार्च 2020 सभी के लिए एक अहम महीना था। पूरी दुनिया थम-सी गई थी। हमने एक ऐसी महामारी का सामना किया, जैसी पहले कभी न तो देखी थी और न ही अनुभव की थी। इससे बस कुछ ही महीने पहले, जनवरी 2020 में, दिल्ली में स्थित आर्ट ऑफ़ प्ले फाउंडेशन के ऑफिस में मैं और मेरे दो अन्य सह-संस्थापक भविष्य की रणनीतियों पर सोच-विचार कर रहे थे। हम उम्मीद से भरे हुए थे और आने वाले रोमांचक वर्ष के लिए पूरी तरह तैयार थे। उसी समय हमने दो नए और बड़े फंडिंग पार्टनर्स के साथ साझेदारी लगभग पक्की कर ली थी। हमने अपने दो मौजूदा फंडिंग पार्टनर्स के साथ चल रहे दो अन्य कार्यक्रमों को आगे जारी रखने पर सहमति भी बना ली थी।
कम से कम तीन और संभावित फंडर्स के साथ हमारी बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही थी। हम इस पर बातचीत कर रहे थे कि किस तरह से साल 2020 संस्था के लिए बड़ी उपलब्धियों वाला वर्ष साबित होने वाला था। हम अपने काम के दायरे में तीन गुना बढ़ोतरी की उम्मीद कर रहे थे। अगस्त 2020 तक हमने अपनी टीम के 80 फीसदी सदस्यों को हटा दिया था। मैंने पहले फंडिंग की जिन साझेदारियों का ज़िक्र किया था, उन्हें फंडर्स ने अनिश्चितकाल के लिए रोक दिया था। महामारी के दौरान किसी तरह टिके रहने के लिए आपातकालीन फंड जुटाने की हमारी सभी कोशिशें नाकाम हो गई थीं। जब यह सब हो रहा था, तब अचानक ही हमें अपने उत्पाद और कार्यक्रमों में मौजूद उन कमियों का एहसास होने लगा, जो हमें पहले नहीं नज़र आती थीं।
सह-संस्थापक होने के नाते हम खुद भी इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं थे कि पहले से ही डूबती हुई कश्ती को बचाने की कोशिशें जारी रखनी चाहिए या नहीं। हम इस बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकते थे। महामारी के शुरुआती चार-पाँच महीनों तक हम इन्तज़ार करते रहे। हमें उम्मीद थी कि कभी न कभी स्थितियाँ सामान्य हो जाएँगी। हमने राहत कार्य चलाए, राशन पहुँचाने की पहलें चलाईं और डिजिटल मीडिया के ज़रिए अपने कार्यक्रम को बच्चों और माता-पिता तक पहुँचाने की कुछ कोशिशें कीं।
मगर यह सब काफी नहीं था। हम यह सब मौजूदा हालात का सामना करने के लिए तत्काल उठाए गए ज़रूरी कदमों के तौर पर कर रहे थे। हम इस बारे में गहराई से नहीं सोच रहे थे कि हमारे आसपास क्या हो रहा था। हम दीर्घकाल के लिए योजना बनाने की स्थिति में भी नहीं थे, जबकि उस समय इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।
इन्हीं परिस्थितियों के बीच, हमारे सामने दूसरी संस्था के साथ विलय का प्रस्ताव आया। शुरुआत में हम इस बात को लेकर आशंकित थे। हमारे लिए इसका मतलब यह था कि आर्ट ऑफ़ प्ले अब अपने मौजूदा स्वरूप में नहीं रहेगा। हालाँकि, हमने यह भी सोचा कि जिस सोच और दृष्टि के साथ हमने संस्था की शुरुआत की थी, वह आगे भी फलता-फूलता रहेगा। यह हमारे लिए उस काम को आगे बढ़ाने का एक शानदार मौका लग रहा था, जिसे हमने शुरू किया था। कुछ आशंकाओं और गहन विचार-विमर्श के बाद नवम्बर 2020 में हमने आर्ट ऑफ़ प्ले फाउंडेशन का ईएलएमएस स्पोर्ट्स फाउंडेशन के साथ विलय करने का फैसला लिया।
बाद में, अपने पूरे सफर पर नज़र डालने पर हमें एहसास हुआ कि अतीत में हमने जिस तरीके से ऐसे कई फैसले लिए, उनमें एक पैटर्न था। दिल्ली एनसीआर में एक बड़ी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ी एक संस्था के साथ साझेदारी में चलाया गया एक प्रोजेक्ट इसका एक और उदाहरण है। हम एक छोटा, लेकिन अच्छी गुणवत्ता का प्रोजेक्ट चला रहे थे। हमें लगा कि हम उन बच्चों की ज़िन्दगी में कुछ बदलाव ला पा रहे, जो इस कार्यक्रम का हिस्सा थे। यह साझेदारी तीन साल से ज़्यादा समय तक चली।
फंडिंग पार्टनर्स के साथ लगातार बातचीत चल रही थी। उनकी तरफ से यह फीडबैक आया था कि यह बहुत ज़्यादा लागत वाला कार्यक्रम था। उन्हें लगता था कि उतने ही बजट में हम कार्यक्रम में शामिल बच्चों से तीन गुना ज़्यादा बच्चों तक पहुँच सकते थे। हमें कार्यक्रम के मॉडल पर पूरा भरोसा था। हमने फंडिंग पार्टनर्स के साथ बातचीत करने की कोशिश की। हम थोड़े बदलावों के साथ कार्यक्रम को जारी रखना चाहते थे। मगर फंडर ने कार्यक्रम को बन्द करने का फैसला लिया। उन्हें इतनी ज़्यादा लागत वाले कार्यक्रम में इतना पैसा लगाने का कोई फायदा नहीं दिख रहा था। फंड की कमी के चलते, हमें भी इस कार्यक्रम को आगे न जारी रखने का फैसला करना पड़ा। हमने उन बच्चों के साथ काम करना बन्द कर दिया, जिनके साथ हम लम्बे समय से जुड़े हुए थे। हरियाणा के अम्बाला में चल रहे हमारे सबसे प्रमुख कार्यक्रम के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। हमने वहाँ अप्रैल 2017 से लेकर मार्च 2019 तक लगभग 40 स्कूलों में काम किया। आखिरकार हमारे प्रयासों की बदौलत हमें स्कूलों में कुछ सकारात्मक असर दिखने लगा था। शिक्षकों ने कार्यक्रम में खुद आगे बढ़कर ज़िम्मेदारी लेना शुरू कर दिया था। विद्यार्थी भी दिलचस्पी दिखाने लगे थे।
इस कार्यक्रम की बदौलत बड़ी संख्या में लड़कियाँ आगे बढ़ रही थीं। हमारे कार्यक्रम से जुड़े कुछ विद्यार्थियों ने आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हरियाणा का प्रतिनिधित्व किया। इन सबके बीच, इस प्रोजेक्ट के एकमात्र फंडर ने अचानक सिर्फ 15 दिन का नोटिस देकर अपना वित्तीय सहयोग वापस ले लिया। ऐसा सीएसआर नेतृत्व और फंडिंग की रणनीति में आए बदलाव की वजह से हुआ। इस निर्णय तक पहुँचने से पहले के पूरे वर्ष हम कार्यक्रम के कम से कम डेढ़ से दो गुणा विस्तार की उम्मीद कर रहे थे। यह अपेक्षा दो वर्षों तक सफलतापूर्वक चलाई गई प्रायोगिक परियोजना (पायलट प्रोजेक्ट) से मिले अनुभवों पर आधारित थी। एक बार फिर, यहाँ भी हमने कार्यक्रम बन्द करने और अपनी टीम को उस जगह से वापस बुलाने का निर्णय लिया।
हमने अपनी टीम को दूसरी जगह पर शुरू किए जा रहे अपने नए प्रोजेक्ट में लगा दिया। एक अन्य कार्यक्रम के तहत, हमने वाराणसी में 12 स्कूलों के साथ काम शुरू किया। यह कार्यक्रम लगभग एक साल तक बहुत ही अच्छी तरह चला। शिक्षकों में काम का सकारात्मक असर दिखने लगा था। वाराणसी ज़िला शिक्षा कार्यालय की भी इस प्रोजेक्ट को जारी रखने में दिलचस्पी थी। हालाँकि, एक बार फिर वित्तीय सहयोग जारी रखने के लिए हम फंडर्स को मनाने में नाकाम रहे। हमें प्रोजेक्ट समय से पहले बन्द करना पड़ा। उस प्रोजेक्ट की खास बात यह थी कि वह कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों के साथ था। ये लड़कियों के लिए सरकारी आवासीय विद्यालय हैं। यहाँ की लड़कियों के लिए स्कूल के बाद खेल का एक कार्यक्रम शुरू करने का हमारे पास एक शानदार अवसर था। इस प्रोजेक्ट में हम कुछ बेहतरीन शिक्षकों से भी मिले थे।
दिल्ली एनसीआर और उसके आसपास हमारे शुरुआती कुछ प्रोजेक्ट्स में हमने दो-तीन ऐसी छोटी संस्थाओं के साथ काम किया जो अपने काम करने के तरीके की वजह से एक अलग पहचान रखती थीं और असम के ग्रामीण क्षेत्र की एक संस्था के साथ काम किया। इन प्रोजेक्ट्स के माध्यम से हमें अपने द्वारा संचालित सबसे बेहतरीन और प्रतिभागियों के साथ गहरे जुड़ाव वाले कार्यक्रमों का अनुभव मिला। भले ही ये प्रोजेक्ट्स दिसम्बर 2017 या उससे पहले बन्द हो गए थे, फिर भी साझेदारों और विद्यार्थियों के साथ रिश्ते आज भी कायम हैं। उस समय, हमने मुख्य तौर पर दो वजहों से इन प्रोजेक्ट्स को आगे न जारी रखने का निर्णय लिया था। पहली वजह दोनों पार्टनर्स के पास फंड की कमी थी। आर्ट ऑफ़ प्ले इन कार्यक्रमों के लिए फंड नहीं जुटा सका। हमारे साझेदार संगठन भी कार्यक्रमों को जारी रखने के लिए अपने स्तर पर वित्तीय सहयोग नहीं जुटा पा रहे थे।
हम इन प्रोजेक्ट्स पर काम जारी रख सकते थे। लेकिन, हमने उन प्रोजेक्ट्स पर ध्यान केन्द्रित करने का फैसला किया जिनके लिए हम फंड जुटा पाए थे। आज भी मुझे लगता है कि अगर हमने इनमें से कम से कम दो प्रोजेक्ट्स को भी जारी रखा होता, तो एक संगठन के तौर पर हमें वह ज़रूरी आधार मिल पाता, जिसे हम अपने पूरे सफर के दौरान बार-बार खोते रहे थे। कोविड-19 महामारी के बाद दो सबसे बड़े झटके लगे। एक सीएसआर पार्टनरशिप थी जो लगभग चार साल चली और साल-दर-साल धीरे-धीरे बढ़ती गई। यह एक ऐसी साझेदारी थी जिससे हमने सीखा कि कानूनी और वित्तीय प्रक्रियाओं का पालन और उनकी जाँच-पड़ताल कैसे की जाती है।
यह हमारी अब तक की सबसे स्थिर और भरोसेमन्द साझेदारियों में से एक रही। यह प्रोजेक्ट दिल्ली एनसीआर के सिर्फ दो स्कूलों के साथ किए गए हमारे काम में बहुत मददगार साबित हुआ। एक संस्था के तौर पर हमें इससे बहुत कुछ सीखने को मिला। असफलता तब सामने आई जब महामारी के बाद 2020 के अन्त में प्रोजेक्ट बन्द हो गया और हम इस साझेदारी को आगे जारी नहीं रख पाए।

दूसरा एक हाल ही में शुरू किया गया बड़ा प्रोजेक्ट था, जिसे हमने एक बड़ी सीएसआर पहल के तौर पर सफलतापूर्वक शुरू किया था। हमें उनके साथ एक लम्बे सफर की उम्मीद थी। हालाँकि, वे पीछे हट गए। उन्होंने कोविड-19 महामारी का हवाला देते हुए फंडिंग रोक दी।
मैंने यहाँ भारत के पाँच अलग-अलग राज्यों में मिली नाकामियों की नौ कहानियाँ साझा की हैं। पाँच साल के इस लम्बे सफर में यकीनन नाकामी की बहुत-सी कहानियाँ मुझे याद नहीं रह गई होंगी। फिर भी, एक ऐसे संगठन के सह-संस्थापक के तौर पर जिसका हमारे काम को जारी रखने के लिए बाद में दूसरे संगठन के साथ विलय कर दिया गया, ये घटनाएँ मुझे आज भी साफ-साफ याद हैं।
नाकामियों से सीखना
इन कहानियों से मिली सीख के आधार पर, मैं कुछ महत्वपूर्ण सीखों के साथ अपनी बात खत्म करता हूँ। ये सीखें उन संगठनों के सफर में उपयोगी साबित हो सकती हैं, जो अपने उद्देश्य को पूरा करने की दिशा में काम कर रहे हैं।
हमेशा केवल अचानक आने वाली समस्याओं को सुलझाने में लगे रहना और भविष्य के लिए कोई दिशा या योजना न तय करना एक संस्था के तौर पर सबसे बड़ी गलती होती है: एक शुरुआती स्तर की गैर-लाभकारी संस्था होने के नाते, जो हमेशा अपने अस्तित्व को बचाए रहने की जद्दोजहद में लगी रही, हमें हर छह महीने में ऑक्सीजन (संसाधन) तलाशनी पड़ती थी। हालाँकि काम चलता रहे और लोग संस्था छोड़कर न जाएँ इसके लिए यह करना ज़रूरी था। मगर इसका असर हमारे रोज़मर्रा के कामकाज में लगातार झलकता रहा।
ऐसे में हमारे लिए संगठन के भविष्य और उसके व्यापक उद्देश्य को ध्यान में रखकर फैसले लेना मुश्किल हो जाता था। हमारे हर फैसले के पीछे यही सोच होती थी कि किसी तरह संगठन चलता रहे। अब पीछे मुड़कर देखने पर यही लगता है कि किसी संस्था को, भले ही वह मुश्किल दौर से गुज़र रहा हो, भविष्य को ध्यान में रखते हुए मुश्किल फैसले लेने चाहिए।
समय के अगर संस्था का विकास हो रहा हो, तो उसमें नेतृत्व सम्भालने वाले लोगों की संख्या भी बढ़नी चाहिए: हम तीन सह-संस्थापक थे और शुरू के दो-तीन सालों में यह वरदान साबित हुआ। हमें लगता था कि हम अच्छी प्रगति कर रहे हैं और काम भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। हालाँकि, मुझे लगता है कि बाद के सालों में संस्था का दायरा, काम और बजट इतना नहीं बढ़ा कि वह इतनी बड़ी लीडरशिप टीम को सम्भाल सके।
संस्थागत अनुभवों और सीखों को दर्ज करना बहुत ज़रूरी है क्योंकि इससे उस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की सामूहिक समझ समृद्ध होती है: आज पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि हम अपने सभी प्रोजेक्ट्स से मिले अनुभवों, सीखों और ज्ञान को दर्ज करने के लिए और भी बहुत कुछ कर सकते थे।
उस समय शायद यह बात हमें मामूली लगी होगी। हालाँकि, जब हम इस क्षेत्र में उपलब्ध संसाधन और जानकारी खोजने की कोशिश करते हैं, तो वहाँ एक बड़ी कमी नज़र आती है। हम शायद इन कमियों को दूर करने में मदद कर सकते थे।
भले ही उस समय यह बात कितनी भी मामूली क्यों न लगे, किसी भी संस्था के लिए अपने काम का रिकॉर्ड रखना बहुत ज़रूरी है। यह संस्था और गैर-लाभकारी संस्थाओं के कार्यक्षेत्र के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकता है।
समर्पित बोर्ड सदस्यों और सलाहकारों का न होना संस्था की प्रगति में एक बड़ी रुकावट होता है: हमने अपनी आज़ादी का भरपूर आनन्द लिया। हमने अपने हरेक फैसले में इसका इस्तेमाल किया। हालाँकि, हमारे पास ऐसा कोई नहीं था जिससे हम सलाह-मशविरा कर सकें। एक तरह से अपने कार्यक्रम के साझेदारों को छोड़कर हम किसी के प्रति जवाबदेह नहीं थे।
एक संस्था के तौर पर, तीन सह-संस्थापकों के अलावा ऐसा कोई भी नहीं था जो संस्था की तरक्की के बारे में सोच रहा हो। बेशक, कभी-कभी हमें शाबासी की ज़रूरत होती थी। मगर उससे भी बढ़कर हमें किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो किसी उलझन की स्थिति में हमें सही दिशा दिखा सके।
आखिर में, इतना कहना चाहूँगा कि कुछ करने का जुनून आपको केवल एक हद तक ही आगे ले जा सकता है। किसी संस्था को खड़ा करने के लिए धैर्य, अनुशासन और निरन्तर प्रयास की ज़रूरत होती है। यह 100 मीटर की दौड़ और मैराथन दौड़ने के फर्क जैसा है।
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