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इतिहास कैसे गढ़ा जाता है? क्या कोई मॉडल इस सन्दर्भ में तुरन्त मार्गदर्शन दे सकता है?

यह लेख यह तर्क देता है कि इतिहासकार की कला को इतिहास की कक्षा की पेडागोजी में शामिल किया जाना चाहिए। इस कोशिश में मदद करने के लिए, प्रबंध के लेखक अनिल सेठी छह तत्वों वाला एक मॉडल पेश करते हैं जो इतिहास लेखन और पेडागोजी को एक साथ जोड़ने की कोशिश करता है।

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प्रकाशित तिथि : ६ फ़रवरी २०२६
Modified On : 6 February 2026
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कक्षा आठ के लिए इतिहास की एनसिइआरटि पाठ्यपुस्तक का कवर
कक्षा आठ के लिए इतिहास की एनसिइआरटि पाठ्यपुस्तक का कवर

इस लेख में मेरा उद्देश्य स्कूल और कॉलेज के शिक्षकों सहित इतिहास के और शिक्षा के पेशेवरों को एक ऐसे मॉडल से परिचित कराना है, जो बताता है कि इतिहास कैसे गढ़ा जाता है। ‘गढ़ा’ से मेरा मतलब यह है कि इसकी शोध कैसे की जाती है, (इसकी शोध कैसे की जाती है मोनोग्राफ, विद्वत्तापूर्ण लेखों, पाठ्यपुस्तकों और अन्य सामग्रियों के माध्यम से) इसे कैसे निर्मित किया जाता है, इसे कैसे पढ़ाया और सीखा जाता है और हमें इन सभी गतिविधियों को कैसे करना चाहिए। मॉडल एक तरह से सोचने का एक बौद्धिक ढांचा हैजो अक्सर, सामान्य / आम तौर पर होनेवाली घटनाओं पर ज़ोर देने के लिए वास्तविकता को सरल बनाता है।

इसलिए, मैं यह प्रस्तुत करूँगा कि इतिहास कैसे लिखे जाते हैं, इतिहासकार आम तौर पर क्या करते हैं, और एक शास्त्र के तौर पर इतिहास को कैसे पढ़ाया और सीखा जाना चाहिए। मॉडल की व्याख्या मे यह निहित है की – मॉडल को सामान्य रूप किसी भी संदर्भ में लागू होना चाहिए, इसलिए मेरा मॉडल किसी भी इतिहास की रचना और उसके शिक्षण पर लागू होगा, चाहे उसका समय-काल, स्थान या थीम कुछ भी हो। इसके अलावा, यह मॉडल अव्यक्त रूप से इस विचार को भी रेखांकित करेगा कि इतिहास सीखने-सिखाने की तरीका (पेडगोजी) इतिहासकार के (काम करने के) तरीके से नज़दीकी से जुड़ा होना चाहिए।

मैंने इस मॉडल को अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बेंगलूरु में ‘इतिहास और सामाजिक विज्ञान की शिक्षा’ पर आधारित एक कोर्स पढ़ाने के उद्देश्य से विकसित किया था। उस कोर्स के मेरे विद्यार्थी विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों और विषयों से आए थे। मैं दन्त चिकित्सकों, जीव विज्ञानियों, गणितज्ञों, इंजीनियरों, भूगोलवेत्ताओं, समाजशास्त्रियों, साहित्यिक आलोचकों और इस तरह के अन्य लोगों के इस विषम समूह को सर्वश्रेष्ठ इतिहास-लेखन और इतिहास शिक्षण के बुनियादी सिद्धान्त कैसे समझाता? मुझे ऐसी विषयवस्तु और शिक्षण पद्धति तैयार करनी थी, जो विषय के मूल तक जाए, आसानी से समझ आने वाली मगर गहराई वाली हो, और बहुत अधिक समय न ले। यह मॉडल मेरा जवाब था। इसमें तत्वों या चरणों की एक श्रृंखला शामिल है; हालाँकि, किसी विद्वान या शिक्षक के काम में ये चरण एक क्रम में नहीं शामिल होते। इन चरणों में निम्न बिन्दु शामिल होते हैं:

  1. विश्लेषण हेतु समस्या(एँ)।
  2. व्याख्या: तर्क और आख्यान। तर्क और आख्यान एक दूसरे में किस तरह से घुले-मिले होते हैं?
  3. मामले से जुड़े तथ्य।
  4. साक्ष्य और स्रोत।
  5. परिप्रेक्ष्य:
  1. परिप्रेक्ष्य और पूर्वाग्रह; पूर्वाग्रहयुक्त परिप्रेक्ष्य।
  2. किसी खास नज़रिए से, किसी सुविधाजनक नज़रिए से की गई व्याख्याएँ; क्या सभी नज़रिए पक्षपातपूर्ण होते हैं?
  3. किसी पाठ में अनेकों नज़रियों को शामिल करना। अलग-अलग आवाज़ें शामिल करना: साक्ष्यों में, इतिहास में शामिल मुख्य पात्रों के स्तर पर, विद्वानों के बीच, यानी इतिहासकारों/समाजशास्त्रियों के बीच। जहाँ भी सम्भव हो, सभी नज़रियों को शामिल करते हुए एक समग्र समझ बनाना।

विश्लेषण के लिए समस्याएँ: सभी विषयों में शोधकर्ता विश्लेषणात्मक प्रश्नों के साथ काम करते हैं। वास्तव में क्या जाँचा या विश्लेषण किया जा रहा है? मेरे अनुभव में, विश्लेषण के लिए समस्या को स्पष्ट रूप से इंगित करने के लिए इसी तरह से पढ़ाना और अध्ययन करना उपयोगी है, जो इतिहास के शिक्षकों और छात्रों द्वारा शायद ही कभी किया जाता है। विश्लेषण के लिए दिलचस्प समस्याओं की पहचान करना या उन्हें तैयार करना हमारे काम में तुरन्त स्पष्टता और गहराई दोनों लाएगा।

यदि चुनी गई समस्या महत्वपूर्ण है, तो यह हमें दी गई घटना के लिए गहरी, विस्तृत और अर्थपूर्ण व्याख्याएँ खोजने या बनाने के लिए प्रेरित करेगी, ऐसी व्याख्याएँ जो अनेक कारकों के परस्पर प्रभाव को समझने का प्रयास करती हैं। इस बिन्दु को समझाने के लिए, मैं भारतीय इतिहास से विश्लेषण के लिए कुछ दिलचस्प समस्याओं को चुनिन्दा उदाहरणों के तौर पर यहाँ प्रस्तुत करता हूँ।

  1. हम सभी जानते हैं कि 1919-20 से उपनिवेशवाद विरोधी भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन धीरे-धीरे अखिल भारतीय जन आन्दोलन बन गया। ऐसा 1919-20 के आसपास ही क्यों हुआ, उससे पहले या बाद में क्यों नहीं? (एक तरह से यह इतिहास का सबसे अहम सवाल है जिसका सामान्य रूप यह है कि घटनाएँ जब होती है तब क्यों घटित होती हैं?)
  2. सिख धर्म एक अलग धर्म के रूप में कब और कैसे विकसित हुआ?
  3. भारत में बौद्ध धर्म का तेज़ी से उत्थान और पतन क्यों हुआ?
  4. 1964-66 के राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (तथाकथित कोठारी आयोग) की सिफारिशों के बावजूद कि देश में एक समान सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली शुरू की जानी चाहिए, ऐसा कभी नहीं हुआ। क्यों?
  5. किस तरह से अलग-अलग समय अवधियों में और अलग-अलग जगहों पर सामाजिक वर्ग, जाति, धार्मिक पहचान और पितृसत्ता ने एक दूसरे से मिलकर ऐसे समूहों को जन्म दिया जो एक साथ कई तरह की वंचनाओं से जूझ रहे थे? (यह एक बहुत बड़ा सवाल है। ऐतिहासिक सन्दर्भों को ध्यान में रखते हुए, इसे कई विशिष्ट सवालों में विभाजित करना होगा।)

इन सवालों के जवाब चाहे जो भी हों, स्पष्टीकरण में अनिवार्य रूप से तर्कों या आख्यानों की एक शृंखला शामिल होगी। समय-समय पर, घटनाओं का केवल वर्णन करने या कहानियाँ सुनाने के विचार की कड़ी आलोचना की गई है और विद्वानों ने इन घटनाओं के पीछे छिपे असल कारणों की खोज करने की आवश्यकता के बारे में बात की है। फिर भी, कहानी-आधारित व्याख्या, अपने गहरे ठोस अर्थ में, इतिहास में कई बार वापसी कर चुकी है।

सबसे अच्छे इतिहास में, तर्कपूर्ण विचार अक्सर कहानी और विवरण के साथ मिलाकर प्रस्तुत किए जाते हैं। लेकिन इतिहासकार के तर्क और आख्यान किस पर आधारित होते हैं? पत्रकार और वकील की तरह, इतिहासकार को ‘मामले के तथ्यों’ के साथ काम करना चाहिए और ये तथ्य साक्ष्यों से चुने जाते हैं, और साक्ष्य कई अलग-अलग स्रोतों से एकत्र किए जाते हैं। इतिहासकार आम तौर पर ‘प्राथमिक’ और ‘द्वितीयक’ स्रोतों में फर्क करते हैं। प्राथमिक स्रोत वे होते हैं जो उसी समय के होते हैं जिस समय वह घटना हुई थी। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि तथ्यों, साक्ष्यों और स्रोतों की आलोचनात्मक जाँच हमेशा ही की जानी चाहिए।

‘तथ्यों’, ‘साक्ष्यों’ और ‘स्रोतों’ के बारे में काफी बातें की जा सकती हैं। लेकिन जगह की कमी को देखते हुए, मैं यहाँ केवल इस बारे में कुछ बुनियादी टिप्पणियाँ करूँगा कि इतिहासकार अपने साक्ष्यों की व्याख्या करने के लिए किस तरह का प्रशिक्षण ले सकते हैं। सभी शोधकर्ताओं को यह पूछना चाहिए कि किसी दिए गए साक्ष्य को वास्तव में कैसे बनाया गया था। इसे किसने बनाया? वास्तव में क्या बनाया गया था? कैसे, कब, कहाँ, क्यों?

रुडयार्ड किपलिंग के ‘छह ईमानदार सेवक’ याद हैं? [“मैंने छह ईमानदार सेवक रखे हैं, (उन्होंने मुझे वह सब सिखाया जो मैं जानता था) …”] किपलिंग का सातवाँ ‘सेवक’ शायद ‘किसके लिए’ रहा होगा; यानी, किसके लिए यह साक्ष्य बनाया गया था? क्या अभिलेखकर्ता ने व्यक्तिगत उपयोग के लिए, एक से अधिक व्यक्तियों के लिए या बड़े पाठक वर्ग के लिए दस्तावेज़ तैयार किया था? क्या यह प्रत्यक्ष प्रमाण है या सुनी-सुनाई बात है? क्या यह निजी इस्तेमाल के लिए था या सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए? क्या यह जानकारी या तर्क या परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है? संक्षेप में, इतिहासकार को किपलिंग के ‘ईमानदार सेवकों’ के कई अलग-अलग स्वरूपों के बारे में हज़ारों सवाल उठाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है — यदि आप चाहें तो इन सवालों का क्रम परिवर्तन कर सकते हैं — और ये सवाल ही साक्ष्य की सत्यता का आकलन करने में हमारी मदद करते हैं।

साक्ष्य के सवाल पर गहराई से विचार करने या इतिहास को गढ़ने में तथ्यों की भूमिका के बारे में लिखने के लिए बहुत सारे शब्दों की आवश्यकता होगी। हमें इसे किसी और अवसर के लिए छोड़ना होगा।

उपलब्ध स्रोतों का आलोचनात्मक अध्ययन करके, उन पर सवाल उठाकर, तथा साक्ष्य, तथ्य और तर्क को एक साथ जोड़कर आर्गुमेंट तैयार किए जाते हैं। आर्गुमेंट की ताकत इस पर निर्भर करती है कि उसे कितने प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। लेकिन निश्चित तौर पर कोई भी आर्गुमेंट या कहानी परिप्रेक्ष्य के बिना नहीं होती। यहाँ तक कि साक्ष्य व तथ्य किसी विशेष नज़रिए से पेश किए जाते हैं।

वास्तव में, हर तथ्य या साक्ष्य में परिप्रेक्ष्य शामिल होता है। इसी तरह से, साक्ष्य और तथ्य को अलग-अलग नज़रियों से देखा जा सकता है। मैं परिप्रेक्ष्य के चुनौतीपूर्ण मुद्दे और इतिहास या समाज विज्ञान को गढ़ने में इसकी भूमिका पर कुछ विस्तार से बात करना चाहूँगा।

सबसे पहले, मैं इस बात पर ज़ोर देना चाहता हूँ कि सभी नज़रिया पूर्वाग्रहयुक्त नहीं होते। पूर्वाग्रह (या पक्षपात) और परिप्रेक्ष्य दोनों में अन्तर होता है। पूर्वाग्रह के विषय पर, मैं बर्नार्ड लुईस (हिस्ट्री: रिमेम्बर्ड, रिकवर्ड, इन्वेंटेड, न्यूयॉर्क, टचस्टोन, 1975, पृष्ठ 54) को उद्धृत करने से बेहतर कुछ नहीं कर सकता: विद्वत्तापूर्ण शोध की आवश्यक और विशिष्ट लक्षण यह है, या होनी चाहिए, कि यह पहले से निर्धारित परिणामों के साथ नहीं किया जाता। इतिहासकार किसी थीसिस को सिद्ध करने या किसी दलील को स्थापित करने के लिए सामग्री का चयन करने के लिए काम करता, बल्कि साक्ष्य जिस दिशा में ले जाता है उसका अनुसरण करता है। कोई भी इन्सान ऐसा नहीं होता जिसमें कमियाँ न हों। इन कमियों में वफादारियाँ और पूर्वाग्रह भी शामिल हैं, जो इतिहास को लेकर उसकी धारणा और इतिहास को प्रस्तुत करने के उसके तरीके को प्रभावित कर सकते हैं। आलोचनात्मक व विद्वत्तापूर्ण इतिहासकार [इस पर ज़ोर मैंने दिया है] की मुख्य विशेषता यह होती है कि वह इस सच्चाई से अवगत होता है, और अपने पूर्वाग्रहों को बढ़ावा देने के बजाय उन्हें पहचानने और उन्हें सुधारने का प्रयास करता है।

यहाँ लुईस हमारे लिए पूर्वाग्रह को परिभाषित करते हैं और सुझाव देते हैं कि पेशेवर इस पर कैसे काम कर सकते हैं। भले ही कुछ नज़रिए पूर्वाग्रहयुक्त होते हैं, लेकिन सभी नहीं। नज़रिया किसी चीज़ को देखने का अलग-अलग तरीका होता है। कई नज़रिए एक दूसरे से अलग हो सकते हैं, इसका यह मतलब नहीं कि वे पूर्वाग्रहयुक्त हैं।

उदाहरण के लिए, ब्रिटिश भारत के विभाजन के मुद्दे को ही लें। इस विषय पर विस्तार से लिखते समय, बहुत से नज़रियों को ध्यान में रखना पड़ता है: बेशक प्रमुख राजनीतिक दलों और राष्ट्रों के, लेकिन अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों के भी, उस युवक के, जो अपनी जान बचाने के जम्मू से सियालकोट तक लिए भागने से पहले ही मृतकों के बीच छिप गया था; पूर्वी भारत के एक राजमार्ग पर सड़क की मरम्मत करने वाली महिला के; खुदरा बाजार में थोक मूल्य पर गेहूँ बेचने वाले व्यापारी के, जो गेहूँ की बोरियों को बेचकर कुछ पैसे कमाकर अपना गुज़ारा करता था; उन महिलाओं के, जिन्हें उनके परिवार के पुरुषों ने ‘समुदाय के सम्मान’ की ‘रक्षा’ करने के लिए सामूहिक आत्महत्या करने के लिए कुओं में कूदने को राज़ी किया; और, मिश्रित पृष्ठभूमि के जोड़ों के नज़रियों को भी, जो अपने बच्चों को जन्म देने के लिए अस्पतालों से भागकर उजाड़ खाइयों में चले गए।

इतनी सारी कहानियाँ, इतने सारे नायक, इतनी सारी आवाज़ें। क्या 1947 के हमारे विवरण और उसमें हम जिन नामों का इस्तेमाल करते हैं, इन सभी आवाज़ों पर ध्यान देते हैं? क्या यह वास्तव में एक ‘विभाजन’ था, या परिसम्पत्तियों और क्षेत्रों का सहमतिपूर्ण ‘विभाजन’ था; या यह एक ‘अशान्ति’, ‘कोलाहल’ और नरसंहार था? या फिर एक ऐसा गृहयुद्ध था जो कि सोलह महीनों तक चला? हम इसे ‘पाकिस्तान का निर्माण’ क्यों नहीं कहते? इतिहासकारों के इतिहास ने 1990 के दशक के मध्य तक विभाजन की अनकही क्रूरता और हिंसा का ज़िक्र क्यों नहीं किया? विभाजन कब शुरू हुआ और कब खत्म हुआ? इतने सारे सवाल! किसी घटना को देखने के अलग-अलग तरीके न सिर्फ अलग-अलग सवालों को, बल्कि अलग-अलग जवाबों को पैदा करते हैं।

इससे हमें पता चलता है घटनाओं और सामाजिक प्रक्रियाओं, ऐतिहासिक और समकालीन दोनों, के कई परत वाले और एक दूसरे से घुले-मिले हुए इतिहास होते हैं। उन्हें समझने का केवल एक ही तरीका नहीं हो सकता। वे उन्हें देखने के अलग-अलग नज़रियों से निर्मित अलग-अलग आख्यानों के अनुकूल हो सकते हैं। इतिहासकार का यह दायित्व है कि वह विभिन्न नज़रियों के बीच संवाद बनाने की कोशिश करे, ताकि परस्पर विरोधी आवाज़ों को प्रस्तुत किया जा सके।

इस तरह के अभ्यास से किसी दिए गए इतिहास, कई अलग-अलग अतीत, की बहुलता को उजागर करने में मदद मिलेगी, जो हमारी वास्तविकताओं को प्रभावित करते हैं क्योंकि वे बीते हुए युगों की सुरंग से निकलकर वर्तमान पर असर डालते हैं। यही कारण है कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने कक्षा 6, 7 और 8 के लिए इतिहास की अपनी पाठ्यपुस्तकों का नाम — जो वर्तमान में उपयोग में है — हमारे अतीत चुना है। बहुलता पर ज़ोर को नजरअन्दाज़ नहीं किया जाना चाहिए।

और यही कारण है कि हमारे समय के एक प्रमुख इतिहासकार, पीटर बर्क अपने साथियों से संघर्षों की व्याख्या व्याख्याओं के संघर्ष के माध्यम से करने का आग्रह करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इतिहास कोई निश्चित, वस्तुनिष्ठ, केवल तथ्यों पर आधारित चीज़ नहीं है। बीसवीं सदी की शुरुआत में, इतिहासकार ‘इतिहास की आवाज़’ की बात करते थे, जैसा कि मुम्बई फिल्म उद्योग की लोकप्रिय फ़िल्में कभी-कभी करती हैं। क्या ‘इतिहास की कोई आवाज़’ है और क्या इसे उजागर करना इतिहासकार का आदर्श लक्ष्य होना चाहिए? या फिर क्या इतिहास में कई अलग-अलग, यहाँ तक कि विरोधी आवाज़ें शामिल हैं? तो क्या इतिहास में शामिल विविध आवाजों — यानी, इसकी अलग-अलग और कभी-कभी विरोधी आवाज़ों — को समझना हमारा आदर्श लक्ष्य नहीं होना चाहिए?

इतिहासकार या शिक्षक का काम इतिहास (या समाज विज्ञान से सम्बन्धित) किसी प्रश्न को सभी दृष्टिकोणों से देखना और यह स्थापित करना है कि ये दृष्टिकोण किस हद तक साक्ष्य और तथ्य पर आधारित हैं। इससे हमें प्रत्येक दृष्टिकोण से उत्पन्न होने वाले तर्कों की वैधता का आकलन करने में मदद मिलेगी। आखिर में, कई मामलों के सम्बन्ध में, तर्कों और दृष्टिकोणों को संश्लेषित करने की गुंजाइश हो सकती है; जहाँ भी सम्भव हो, ऐसा किया जाना चाहिए।

अन्तिम लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि मानविकी और सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में काम करनेवाले लोग वास्तविकता को क्रमबद्ध करने, प्रासंगिक या अप्रासंगिक घटनाओं के बीच फर्क करने और उन्हें समझने योग्य बनाने के लिए विविध प्रकार की अवधारणाओं और श्रेणियों का उपयोग और निर्माण करते हैं। उन्हें इन अवधारणाओं और श्रेणियों को सही ढंग से समझना चाहिए। उदाहरण के लिए, मैं किसी के साथ पूँजीवाद के गुण-दोषों पर बहस कैसे कर सकता हूँ जब तक कि मैं और जिससे मैं बात कर रहा हूँ वह पूँजीवाद की तकनीकी रूप से सही और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समझ पर न पहुँच जाएँ? मैं 1857 के आन्दोलन के चरित्र का निर्धारण कैसे कर सकता हूँ, जब तक कि मैं और मेरे साथी वाद-विवादकर्ता ‘गदर’, ‘विद्रोह’, ‘स्वतंत्रता संग्राम’ या यहाँ तक कि ‘क्रान्ति’ जैसी श्रेणियों के अर्थ न जानते हों?

ये मिलती-जुलती अवधारणाएँ ही हैं जो सबसे अधिक भ्रमित करने वाली हैं। क्या ‘देशभक्ति’ और ‘राष्ट्रवाद’, ‘मातृभूमि’ और ‘राष्ट्र’ को एक दूसरे से अलग किया जाना चाहिए, और अगर हाँ, तो कैसे? क्या ‘फ्रंटिअर’ और ‘बॉर्डर’ लगभग एक ही चीज़ हैं? क्या हम उलझन में नहीं पड़ जाएँगे अगर हम ‘बीमारी के मामले’ और इसके ‘प्रसार’ दोनों को एक ही समझें? क्या ‘लोकप्रिय विद्रोह’ या ‘लोकप्रिय नेता’ या ‘नेता जो इतने लोकप्रिय नहीं हैं लेकिन लोकलुभावन हैं’ के बारे में बात करने से पहले हमें ‘लोकप्रिय’ और ‘लोकलुभावन’ जैसे शब्दों के अर्थों की पूरी शृंखला से परिचित नहीं होना चाहिए? दूसरे शब्दों में, इतिहास के वर्णन, विश्लेषण और उसे कहानी के रूप में प्रस्तुत करने के लिए प्रासंगिक अवधारणाओं और श्रेणियों की अच्छी समझ आवश्यक हो जाती है।

इस मॉडल के जिन छह तत्वों को मैंने यहाँ आपके लिए रेखांकित किया है, वे अनिवार्य रूप से इतिहास-लेखन और इतिहास-शिक्षण के हरेक तरीके में मौजूद होते हैं। इसके बारे में सक्रियता से जागरूक होना मददगार होगा। इस मॉडल का उपयोग हमारे काम की जाँच करने और उस पर विचार करने के लिए किया जा सकता है। ये छह तत्व हमारे प्रयासों की बुनियाद हैं।

मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि ये बुनियादी तत्व केवल छह ही हो सकते हैं — न इससे कम, न इससे ज़्यादा। इतिहास और समाज विज्ञान को गढ़ने में हम बाकी जिन पुरावेषों, विचारों और कारकों को शामिल करते हैं उन्हें इन बुनियादी तत्वों का उपसमूह होना चाहिए। फलस्वरूप, उन्हें इनमें से एक या एक से अधिक तत्व में शामिल कर लिया जाएगा।

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Anil Sethi
Anil Sethi is a historian. Currently he works with Pokhrama Foundation in Hyderabad and Pokhrama.
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